
श्रीमद्भागवत महापुराण कथा – Part 2
अमर कथा का पावन प्रसंग एवं श्री शुकदेव जी का प्राकट्य
🙏 श्री राम देशिक प्रशिक्षण संस्थान में आपका स्वागत है 🙏 परम भगवद्भक्तों एवं कथा अनुरागियों! ‘श्री राम देशिक प्रशिक्षण संस्थान’ की ओर से श्रीमद्भागवत कथा रसामृत के द्वितीय भाग (Part 2) में आप सभी का हार्दिक अभिनंदन है। यदि आप भी व्यास पीठ से कथा वाचन की शैली सीखना चाहते हैं, कथा के रहस्यों को समझना चाहते हैं अथवा प्रामाणिक ‘कथा नोट्स’ (Katha Notes) प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमारे संस्थान से अवश्य जुड़ें। आइए, अमर कथा के इस दिव्य प्रसंग में गोता लगाते हैं।
🌸 अमर कथा की कथा: कैलाश पर्वत का पावन प्रसंग 🌸
एक बार भगवती जगदम्बा माँ पार्वती जी के मन में यह जिज्ञासा उत्पन्न हुई कि भगवान शिव के गले में जो मुंडमाला (मुंडों की माला) है, वह किसकी है? उन्होंने परम भोलेनाथ श्री शिवजी से बड़े सहज भाव से पूछा— “हे प्राणनाथ! आपके गले में यह जो नरमुंडों की माला है, यह किसकी है और आप बार-बार किन्हें धारण करते हैं?”
भगवान शिव ने मुस्कराकर उत्तर दिया— “देवि! ये मुंड किसी और के नहीं, अपितु तुम्हारे ही हैं। जब-जब तुम्हारा पुनर्जन्म होता है और तुम देह त्यागती हो, तब-तब मैं तुम्हारे मस्तक को प्रेमवश इस माला में पिरो लेता हूँ।”
यह सुनकर माँ पार्वती आश्चर्यचकित हो गईं और बोलीं— “हे प्रभु! मैं बार-बार जन्म लेती हूँ और मरती हूँ, परंतु आप अजर-अमर हैं। ऐसा क्यों? मुझे भी वह गूढ़ ज्ञान प्रदान कीजिए, जिससे मैं भी मृत्यु के भय से मुक्त हो जाऊँ।”
भगवान शिव ने कहा— “देवि! वह परम गोपनीय ज्ञान ‘अमर कथा’ है, जो श्रीमद्भागवत का ही दिव्य रूप है। इसे सुनने वाला अमर हो जाता है।”
🌸 अमर कथा का श्रवण और शुक-शिशु का प्राकट्य 🌸
भगवान शिव ने पार्वती जी को अमर कथा सुनाने का निश्चय किया। उन्होंने एकांत स्थान (कैलाश / अमरनाथ गुफा) चुना और अपने डमरू की ध्वनि से समस्त जीव-जंतुओं, पशुपक्षियों को वहाँ से दूर कर दिया, ताकि कोई अनधिकारी इस परम गोपनीय कथा को न सुन सके।
परंतु, उस वृक्ष/गुफा के एक कोटर में एक तोते का अंडा (शुक-अंडा) शेष रह गया था, जिस पर किसी की दृष्टि नहीं पड़ी थी। भगवान शिव ने अमर कथा सुनाना प्रारंभ किया और माँ पार्वती ‘हाँ-हाँ’ (हुँकार) भरकर कथा सुनने लगीं।
कथा सुनते-सुनते मध्याह्न में माँ पार्वती को निद्रा (नींद) आ गई। परंतु उस अंडे से प्रकट हुए छोटे से तोते के बच्चे (शुक-शिशु) ने माँ पार्वती की जगह ‘हाँ-हाँ’ कहना शुरू कर दिया, ताकि कथा का प्रवाह न रुके। जब कथा पूर्ण हुई, तो भगवान शिव ने देखा कि पार्वती जी तो सो रही हैं!
तब शिवजी को बोध हुआ कि ‘हाँ-हाँ’ की ध्वनि कोई और कर रहा था। उन्होंने दृष्टि घुमाई तो उस छोटे से शुक-शिशु को देखा। बिना अधिकार और छुपकर अमर कथा सुनने के कारण भगवान शिव क्रुद्ध हो गए और त्रिशूल लेकर उस शुक-शिशु के पीछे दौड़े।
🌸 महर्षि वेदव्यास जी के आश्रम में आगमन 🌸
वह शुक-शिशु प्राण रक्षा हेतु तीनों लोकों में उड़ता हुआ महर्षि वेदव्यास जी के आश्रम पहुँचा। उस समय व्यास जी की धर्मपत्नी (माता वाटिका/पिंजला) जम्हाई (उबासी) ले रही थीं। वह शुक-शिशु सूक्ष्म रूप बनाकर उनके मुख के मार्ग से उनके गर्भ में प्रविष्ट हो गया।
जब भगवान शिव वहाँ पहुँचे, तो व्यास जी ने उनका स्वागत किया और शांत करते हुए कहा— “हे देवों के देव महादेव! अब यह जीव आपकी अमर कथा सुन चुका है, इसलिए यह अमर हो चुका है। अब इस पर आपका त्रिशूल प्रभाव नहीं कर सकता।” भगवान शिव शांत होकर अपने धाम लौट गए।
वह दिव्य बालक माता के गर्भ में १२ वर्षों तक रहा। जब व्यास जी ने बाहर आने का आग्रह किया, तो बालक ने कहा— “भगवान की माया बाहर व्याप्त है, जो जीव को सांसारिक मोह-बंधन में बाँध लेती है। जब तक मुझे माया से अभय दान नहीं मिलेगा, मैं बाहर नहीं आऊँगा।”
तब स्वयं अखिल ब्रह्मांड नायक भगवान श्रीकृष्ण ने प्रकट होकर उस गर्भस्थ बालक को आश्वासन दिया कि “मेरी माया तुम्हें स्पर्श भी नहीं कर पाएगी।”
🌸 श्री शुकदेव जी का प्राकट्य एवं वैराग्य 🌸
भगवान श्रीकृष्ण का आश्वासन मिलते ही महर्षि वेदव्यास जी के यहाँ एक अलौकिक, परम ज्ञानी बालक का जन्म हुआ, जो ‘श्री शुकदेव जी’ कहलाए। जन्म लेते ही श्री शुकदेव जी का कोई उपनयन या संन्यास संस्कार भी नहीं हुआ था कि वे संसार के समस्त मोह-माया को त्यागकर सीधे वन की ओर चले दिए।
पुत्र को जाते देख महर्षि वेदव्यास जी पुत्र-मोह में व्याकुल होकर उनके पीछे दौड़ने लगे और “हे पुत्र! हे बेटा! रुक जाओ!” कहकर पुकारने लगे।
तभी वृक्षों ने श्री शुकदेव जी की तन्मयता के कारण व्यास जी को उत्तर दिया— “हे महर्षि! आप परम ज्ञानी हैं, फिर भी पुत्र-मोह में व्याकुल हो रहे हैं। हम वृक्षों को देखिए, हममें प्रतिवर्ष कितने फल आते हैं और नष्ट होते हैं, पर हम शोक नहीं करते। शुकदेव जी तो सर्वभूतहृदय (सबके हृदय में विराजमान आत्मा) हैं।”
🌸 परम पावन श्लोक एवं भावार्थ 🌸
इसी पावन प्रसंग को श्रीमद्भागवत महात्म्य में इस प्रकार वर्णित किया गया है:
यं प्रव्रजन्तमनुपेतमपेतकृत्यं द्वैपायनो विरहकातर आजुहाव।
पुत्रेति तन्मयतया तरवोऽभिनेदुस्तं सर्वभूतह्रदयं मुनिमानतोऽस्मि।। (मा•1-2)
भावार्थ: जिस समय श्री शुकदेव जी का उपनयन आदि संस्कार भी नहीं हुआ था, उस समय वे विरक्त होकर वन की ओर चल पड़े। उन्हें वन की ओर जाते देख उनके पिता वेदव्यास जी पुत्र-मोह से व्यथित होकर उन्हें पुकारने लगे— “हे बेटा! हे पुत्र! मत जाओ, रुक जाओ।”
उस समय वृक्षों ने तन्मय होकर श्री शुकदेव जी की तरफ से उत्तर दिया— “हे वेदव्यास जी! आप अत्यंत ज्ञानी हैं और इस प्रकार पुत्र-मोह से दुखी हो रहे हैं। हम अज्ञानी हैं, परंतु हमें देखिए— प्रतिवर्ष हममें न जाने कितने फल लगते हैं, उत्पन्न होते हैं और नष्ट हो जाते हैं, परंतु हम दुखी नहीं होते। इसलिए आप भी दुख त्याग दीजिए क्योंकि आत्मरूप से श्री शुकदेव जी हम सबके हृदय में विराजमान हैं।” ऐसे सर्वभूतहृदय श्री शुकदेव जी महाराज को हम बारंबार नमस्कार करते हैं।
[क्रमशः… अगले भाग (Part 3) में हम श्रीमद्भागवत के आगे के अलौकिक प्रसंगों का रसास्वादन करेंगे।]
🙏 श्री राम देशिक प्रशिक्षण संस्थान से जुड़ें 🙏 हे भगवद्भक्तों! यदि आपको श्रीमद्भागवत कथा का यह पावन प्रसंग आनंददायक लगा और आप भी व्यास पीठ से कथा वाचन का प्रामाणिक ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं, तो ‘श्री राम देशिक प्रशिक्षण संस्थान’ से अवश्य जुड़ें।
-
🚩 कथा वाचन प्रशिक्षण (Katha Training)
-
🚩 श्रीमद्भागवत कथा के हस्तलिखित/प्रामाणिक नोट्स (Katha Notes)
-
🚩 श्लोक गायन एवं व्याख्या की विशेष विधियाँ
आज ही हमारे संस्थान ‘श्री राम देशिक प्रशिक्षण संस्थान’ से संपर्क करें और धर्म-प्रचार के इस पवित्र कार्य में सहभागी बनें।
॥ जय श्री राधे! जय श्री कृष्ण! ॥






