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भागवत कथा बोलना कैसे सीखें नोट्स bhagwat katha bolna sikhe

On: October 3, 2026 9:31 AM
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भागवत कथा बोलना कैसे सीखें नोट्स bhagwat katha bolna sikhe

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श्रीमद्भागवत महापुराण कथा – Part 20

परीक्षित का अद्भुत जन्म एवं नामाकरण, विदुर जी द्वारा धृतराष्ट्र को वैराग्य उपदेश, धृतराष्ट्र-गांधारी का महाप्रस्थान एवं युधिष्ठिर को घोर अपशकुन

🙏 श्री राम देशिक प्रशिक्षण संस्थान में आपका स्वागत है 🙏

परम भगवद्भक्तों एवं कथा अनुरागियों! ‘श्री राम देशिक प्रशिक्षण संस्थान’ की ओर से श्रीमद्भागवत कथा रसामृत के विशति भाग (Part 20) में आप सभी का हार्दिक अभिनंदन है। यदि आप व्यास पीठ से कथा वाचन की प्रामाणिक एवं मधुर शैली सीखना चाहते हैं, श्लोकों के गूढ़ शास्त्रीय रहस्य समझना चाहते हैं तथा ‘कथा नोट्स’ (Katha Notes) प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमारे संस्थान से अवश्य जुड़ें। आइए, प्रथम स्कंध के द्वादश एवं त्रयोदश अध्याय में वर्णित महाराज परीक्षित के जन्म, महात्मा विदुर के कड़े वैराग्य-उपदेश, धृतराष्ट्र के मोक्ष तथा युधिष्ठिर को दिखाई देने वाले भावी अनिष्ट के लक्षणों का रसास्वादन करते हैं।

🌸 महाराज परीक्षित का अलौकिक जन्म एवं नामाकरण (विष्णुरात) 🌸

पितामह भीष्म की अंत्येष्टि के उपरांत पांडवों से आज्ञा लेकर भगवान श्रीकृष्ण द्वारका पहुँचे। उन्होंने सर्वप्रथम अपने माता-पिता के चरणों में प्रणाम किया। शौनक जी सूत जी से प्रश्न करते हैं:

अश्वत्थाम्नोपसृष्टेन ब्रह्मशीर्ष्णोरुतेजसा।

उत्तराया हतो गर्भ ईशेनाजीवितः पुनः।। (भा•1-12-1)

तस्य जन्म महाबुद्धेः कर्माणि च महात्मनः।

निधनं च यथैवासीत्स प्रेत्य गतवान् यथा।। (भा•1-12-2)

भावार्थ: “हे सौम्य सूत जी! अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से उत्तरा का जो गर्भ नष्ट हो गया था, जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने पुनः जीवनदान दिया, उन महाबुद्धिमान महाराज परीक्षित के जन्म, कर्म, उनकी मृत्यु और उनकी परम गति का वर्णन कीजिए।”

सूत जी कहते हैं— उत्तरा के गर्भ में दस मास के बालक ने देखा कि एक अंगुष्ठ मात्र (अंगूठे के बराबर) सुंदर पुरुष चतुर्भुज रूप में पीतांबर धारण किए, हाथ में प्रज्वलित गदा लेकर गर्भ में घूम रहा है। जैसे सूर्य कोहरे को नष्ट कर देता है, वैसे ही श्रीकृष्ण ने अपनी गदा से ब्रह्मास्त्र के तेज को शांत कर दिया और अंतर्ध्यान हो गए।

शुभ नक्षत्रों और अनुकूल ग्रहों के योग में जब बालक का जन्म हुआ, तो वह जन्म लेते ही जिसकी भी गोद में जाता, उसका परीक्षण करता— “क्या गर्भ में मुझे बचाए रखने वाला चतुर्भुज पुरुष यही है?” सर्वत्र परीक्षण करने के कारण बालक का नाम ‘परीक्षित’ पड़ा।

महाराज युधिष्ठिर ने बालक का जातकर्म-संस्कार और नामकरण कराया। भगवान विष्णु द्वारा रक्षित होने के कारण ब्राह्मणों ने बालक का नाम ‘विष्णुरात’ रखा।

🌸 ज्योतिषियों द्वारा भावी जीवन की भविष्यवाणी 🌸

ब्राह्मणों और दैवज्ञों ने बालक के उज्ज्वल भविष्य का वर्णन करते हुए युधिष्ठिर से कहा:

  • गुण एवं चरित्र: यह बालक मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के समान सत्यप्रतिज्ञ एवं ब्राह्मणभक्त होगा।

  • दान एवं शरणागति: राजा शिवि के समान महान दाता और शरणागत-वत्सल होगा।

  • शौर्य एवं पराक्रम: दुष्यंत के समान यशस्वी, सहस्त्रार्जुन और अर्जुन के समान अद्वितीय धनुर्धर होगा।

  • धार्मिकता एवं उदारता: रंतिदेव के समान परम उदार, ययाति के समान धार्मिक और लक्ष्मीपति भगवान विष्णु के समान सबको आश्रय देने वाला होगा।

  • कलियुग निग्रह: यह बालक धर्म की रक्षा के लिए धरित्री पर कलयुग का निग्रह (दमन) करेगा।

  • मोक्ष-प्राप्ति: एक ब्राह्मण बालक के शापवश तक्षक नाग के डसने से इसकी मृत्यु होगी। किंतु अंत समय में यह अपना राज्य त्यागकर गंगा तट पर श्रीशुकदेव जी महाराज से आत्मज्ञान प्राप्त कर परम मोक्ष को प्राप्त करेगा।

यह सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने ब्राह्मणों को भरपूर दान-दक्षिणा दी।

🌸 महात्मा विदुर का आगमन एवं धृतराष्ट्र को वैराग्य उपदेश 🌸

विदुरस्तीर्थयात्रायां मैत्रेयादात्मनो गतिम्।

ज्ञात्वागाद्धास्तिनपुरं तयावाप्तविवित्सितः।। (भा•1-13-1)

तीर्थयात्रा के दौरान महर्षि मैत्रेय जी से परम आत्मज्ञान प्राप्त कर महात्मा विदुर हस्तिनापुर लौटे। पांडवों ने उनका भावपूर्ण स्वागत किया।

एक दिन एकांत में महात्मा विदुर ने वृद्ध धृतराष्ट्र के पास जाकर अत्यंत कठोर किंतु हितकारी सत्य कहा—

“महाराज! आपके पुत्र, भाई, बंधु-बांधव सब युद्ध में मारे जा चुके हैं। आपका शरीर जर्जर हो चुका है, फिर भी आप जिसके पुत्रों को आपने जलाकर मारने का प्रयास किया, विष दिया, भरी सभा में जिनकी पत्नी का अपमान किया, उन्हीं भीमसेन के दिए हुए अन्न के टुकड़ों को कुत्ते की भाँति खा रहे हैं! ऐसे अपमानजनक जीवन को धिक्कार है! यदि हृदय में प्रभु के प्रति आस्था हो, तो बंद द्वार में भी मार्ग निकल आता है। अतः मोह-ममता त्यागिए और तुरंत उत्तर दिशा (उत्तराखंड) की ओर महाप्रस्थान कीजिए।”

विदुर जी की इस वैराग्यमयी वाणी ने धृतराष्ट्र की सोई हुई चेतना को जगा दिया। रात्रि में ही बिना किसी को बताए धृतराष्ट्र और माता गांधारी विदुर जी के साथ उत्तराखंड (हिमालय) की ओर निकल पड़े।

🌸 युधिष्ठिर का शोक एवं देवर्षि नारद का सांत्वना-संदेश 🌸

प्रातःकाल जब धर्मराज युधिष्ठिर नित्य कर्म से निवृत्त होकर धृतराष्ट्र को प्रणाम करने पहुँचे, तो उन्हें न पाकर व्याकुल हो गए। वे संजय से बोले— “संजय! मुझसे ऐसा कौन-सा अपराध हो गया कि पूज्य चाचाजी मुझे छोड़कर चले गए?”

उसी समय तुम्बरु के साथ देवर्षि नारद वहाँ पधारे। नारद जी ने युधिष्ठिर को सांत्वना देते हुए कहा—

“हे धर्मराज! शोकाकुल न हों। महाराज धृतराष्ट्र हिमालय के दक्षिण भाग में गंगा तट (सप्तश्रोत क्षेत्र) पर हैं। वे प्राणायाम और ध्यान द्वारा अपनी समस्त भोग-इच्छाओं को भस्म कर चुके हैं। आज से पाँचवें दिन वे योगग्नि द्वारा अपने शरीर का त्याग करेंगे। उनकी सती पत्नी गांधारी भी उसी अग्नि में समाहित हो जाएँगी। महात्मा विदुर यह देखकर पुनः तीर्थयात्रा पर निकल जाएँगे।”

नारद जी के इन वचनों से युधिष्ठिर का शोक दूर हुआ और उन्होंने देवर्षि का पूजन किया।

🌸 अर्जुन का द्वारका गमन एवं युधिष्ठिर को घोर अपशकुन 🌸

सम्प्रस्थिते द्वारकायां जिष्णौ बन्धुदिदृक्षया।

भगवान श्रीकृष्ण की इच्छा और द्वारकावासियों का कुशल-क्षेम जानने के लिए अर्जुन द्वारका गए हुए थे। जब ७ महीने बीत जाने पर भी अर्जुन नहीं लौटे, तब हस्तिनापुर में भयंकर अपशकुन होने लगे:

युधिष्ठिर द्वारा देखे गए अनिष्टकारी लक्षण:

  1. बायाँ अंग (जाँघ और आँख) बारंबार फड़कना।

  2. प्रातःकाल सूर्य की ओर मुँह करके सियार (गीदड़) का करुण क्रंदन करना।

  3. गाय आदि शुभ पशु का मार्ग में बाएँ ओर से निकल जाना।

  4. दसों दिशाओं में धुआँ छा जाना और पृथ्वी में कंपन होना।

  5. मंदिर में देवताओं की मूर्तियों की आँखों से अश्रु बहना।

युधिष्ठिर ने भीमसेन से चिंतित होकर कहा— “भैया भीम! अर्जुन अभी तक नहीं लौटे और ये घोर अपशकुन बता रहे हैं कि साक्षात भगवान श्रीकृष्ण इस धरा धाम से अपनी लीला संवरण कर चुके हैं!”

[क्रमशः… अगले भाग (Part 21) में हम अर्जुन का द्वारका से आगमन, श्रीकृष्ण के स्वधाम गमन का दुखद समाचार, पांडवों का महाप्रस्थान, परीक्षित का राज्याभिषेक एवं कलियुग के आगमन का प्रसंग सुनेंगे।]

🙏 श्री राम देशिक प्रशिक्षण संस्थान से जुड़ें 🙏

हे कथा रसिकों! श्रीमद्भागवत का यह प्रसंग सिखाता है कि जीवन के अंतिम समय में मोह-ममता छोड़कर प्रभु-भजन में लीन होना ही वास्तविक विवेक है। यदि आप भी व्यास पीठ से प्रामाणिक कथा वाचन की शैली सीखना चाहते हैं, श्लोकों की विशुद्ध व्याख्या तथा ‘हस्तलिखित कथा नोट्स’ (Katha Notes) प्राप्त करना चाहते हैं, तो ‘श्री राम देशिक प्रशिक्षण संस्थान’ आपके उज्ज्वल भविष्य के लिए सदैव तत्पर है।

  • 🚩 व्यास पीठ एवं कथा वाचन प्रशिक्षण (Katha Training)

  • 🚩 श्रीमद्भागवत महापुराण के सरल, प्रामाणिक एवं क्रमबद्ध नोट्स

  • 🚩 वैदिक श्लोक, मंगलाचरण एवं संकीर्तन गायन प्रशिक्षण

आज ही ‘श्री राम देशिक प्रशिक्षण संस्थान’ से संपर्क करें और सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार में अपना योगदान दें।

॥ जय श्री राधे! जय श्री कृष्ण! ॥

 
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