भागवत के प्रमुख श्लोक और चौपाई नोट्स bhagwat katha ke notes
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श्रीमद्भागवत महापुराण कथा – Part 10
भागवत श्रवण-विधि, भव्य संकीर्तन उत्सव, श्रीहरि का प्राकट्य एवं परम वरदान
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परम भगवद्भक्तों एवं कथा अनुरागियों! ‘श्री राम देशिक प्रशिक्षण संस्थान’ की ओर से श्रीमद्भागवत कथा रसामृत के दशम भाग (Part 10) में आप सभी का हार्दिक अभिनंदन है। यदि आप व्यास पीठ से कथा वाचन की शैली सीखना चाहते हैं, श्लोक-चौपाई गायन की कला समझना चाहते हैं तथा प्रामाणिक ‘कथा नोट्स’ (Katha Notes) प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमारे संस्थान से अवश्य जुड़ें। आइए, श्रीमद्भागवत महापुराण के माहात्म्य के छठे अध्याय में वर्णित ‘भागवत श्रवण विधि’ तथा भगवत्-प्राकट्य के परम अलौकिक प्रसंग का रसास्वादन करते हैं।
🌸 भागवत कथा आयोजन एवं वक्ता चयन की विधि 🌸
सनकादि मुनिश्वर श्रीमद्भागवत माहात्म्य के षष्ठ अध्याय में कथा श्रवण एवं अनुष्ठान की विधि का वर्णन करते हुए कहते हैं:
दैवज्ञं तु समाहूय मुहूर्तं पृच्छय यत्नतः।
विवाहे यादृशं वित्तं तादृशं परिकल्पयेत्।। (मा•6-2)
भावार्थ: जो भक्त भागवत कथा का आयोजन करना चाहते हैं, वे सर्वप्रथम किसी योग्य ज्योतिषी (दैवज्ञ) को बुलाकर यत्नपूर्वक उत्तम शुभ मुहूर्त निकलवाएँ। जिस प्रकार व्यक्ति अपने घर में विवाह आदि मांगलिक उत्सवों में प्रसन्नतापूर्वक बिना कंजूसी के धन व्यय करता है, उसी प्रकार भागवत सप्ताह ज्ञानयज्ञ में भी उदारतापूर्वक धन का नियोजन करना चाहिए।
कथा के लिए वक्ता के लक्षण का वर्णन करते हुए सनकादि मुनि कहते हैं:
विरक्तो वैष्णवो विप्रो वेदशास्त्रविशुद्धिकृत्।
दृष्टान्तकुशलो धीरो वक्ता कार्योऽतिनिःस्पृहः।। (मा•6-20)
भावार्थ: कथा वाचन हेतु किसी ऐसे ब्राह्मण को ‘वक्ता’ (व्यास) वरण करना चाहिए जो भगवद्भक्त (वैष्णव), विरक्त, वेद और शास्त्रों का विशुद्ध ज्ञान रखने वाला, दृष्टांत देने में अत्यंत कुशल, धीर और निष्काम (तृष्णा/लोभ से रहित) हो।
🌸 मण्डप निर्माण, जप-ब्राह्मण एवं आहार नियम 🌸
- मण्डल पूजन: कथा स्थल पर श्रीगणपति मण्डल, नवग्रह मण्डल और सर्वतोभद्र मण्डल का सुंदर निर्माण करवाकर प्रतिदिन उनका विधि-विधान से पूजन करना चाहिए।
- परायण एवं जपकर्ता: कथा अनुष्ठान में पाँच निष्ठावान ब्राह्मणों को वरण करना चाहिए, जो निरंतर गणपति मंत्र, गायत्री मंत्र, श्रीद्वादशाक्षर मंत्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) का जप करें तथा श्रीमद्भागवत एवं श्रीविष्णुसहस्रनाम का पाठ करें।
- आहार नियम: कथा के सात दिनों तक यदि निराहार रहकर कथा सुनी जा सके तो सर्वोत्तम है, अन्यथा फलाहार करके कथा श्रवण करें। परंतु यदि उपवास से शरीर में शिथिलता या कथा श्रवण में विघ्न आए, तो उपवास की अपेक्षा सुपाच्य भोजन करना श्रेष्ठ बतलाया गया है:
भोजनं तु वरं मन्ये कथाश्रवणकारकम्।
नोपवासो वरः प्रोक्तः कथाविघ्नकरो यदि।। (मा•6-43)
भावार्थ: भोजन करके कथा सुनना अधिक श्रेयस्कर है यदि वह कथा श्रवण में सहायक हो। ऐसा उपवास श्रेष्ठ नहीं माना जाता जो कथा श्रवण में आलस्य या विघ्न उत्पन्न करे। अतः उतना ही सीमित आहार लें जिससे कथा में आलस्य और निद्रा न आए।
- पूर्णाहुति व ब्राह्मण भोजन: सातवें दिन कथा विश्राम के पश्चात् हवन-पूर्णाहुति करें। तदुपरांत व्यास जी एवं ब्राह्मणों को यथायोग्य दक्षिणा दें और कम से कम १२ (बारह) ब्राह्मणों को भोजन कराकर आशीर्वाद प्राप्त करें। कथा की पूर्णाहूति पर भव्य हरि-कीर्तन करना चाहिए।
🌸 कथा मण्डप में अलौकिक संकीर्तन एवं श्रीहरि का प्राकट्य 🌸
जैसे ही सनकादि मुनियों ने बतलाया कि कथा की समाप्ति पर संकीर्तन करना चाहिए, वैसे ही कथा मण्डप में अलौकिक और दिव्य दृश्य उपस्थित हो गया:
- प्रह्लाद जी ने हाथों में करताल संभाल ली।
- उद्धव जी मंजीरा (झांझ) बजाने लगे।
- देवर्षि नारद जी अपनी महती वीणा की मधुर झंकार छेड़ने लगे।
- महाबाहु अर्जुन सुंदर राग अलापने लगे।
- देवराज इंद्र मृदंग बजाने लगे।
- सनकादि कुमार ज़ोर-ज़ोर से जय-जयकार करने लगे।
- श्रीशुकदेव जी महाराज अपने नयनों और मुद्राओं से दिव्य भाव प्रकट करने लगे।
- भक्ति, ज्ञान और वैराग्य तीनों तरुण रूप धारण कर परम आनंद में मग्न होकर नृत्य करने लगे।
इस अनुपम और दिव्य संकीर्तन के प्रभाव से स्वयं साक्षात भगवान श्रीहरि कथा मण्डप में प्रकट हो गए! प्रभु ने प्रसन्न होकर कहा— “हे सनकादि मुनियों! मैं तुम्हारी इस निष्काम कथा और अलौकिक कीर्तन से अत्यंत प्रसन्न हूँ। तुम जो चाहो वरदान माँग लो।”
सनकादि मुनियों ने करबद्ध प्रार्थना की— “हे प्रभो! यदि आप प्रसन्न हैं तो हमें यह वरदान दीजिए कि जहाँ कहीं भी पृथ्वी पर श्रीमद्भागवत की कथा और संकीर्तन हो, वहाँ आप अपने नित्य पार्षदों और भक्तों के साथ सदैव पधारें।”
भगवान श्रीहरि ने “तथास्तु” कहा और सनकादि मुनियों की मनोकामना पूर्ण कर अंतर्ध्यान हो गए।
🌸 🎵 संकीर्तन: हम हो गए भव से पार लेकर नाम तेरा 🎵 🌸
हम हो गए भव से पार लेकर नाम तेरा।
हम हो गए भव से पार लेकर नाम तेरा॥
वाल्मीकि अति दीन दुखी था, बुरे कर्म में सदा लीन था।
करी रामायण तैयार लेकर नाम तेरा! लेकर नाम तेरा…
थे नल-नील जाति के वानर, राम नाम लिख दिया शिला पर।
हो गयी सेना पार लेकर नाम तेरा! लेकर नाम तेरा…
गज ने आधा नाम पुकारा, गरुड़ छोड़ प्रभु दिया सहारा।
किया ग्राह संहार लेकर नाम तेरा! लेकर नाम तेरा…
भरी सभा में द्रुपद दुलारी, कृष्ण द्वारिकानाथ पुकारी।
बढ़ गया चीर अपार लेकर नाम तेरा! लेकर नाम तेरा…
[श्रीमद्भागवत महापुराण का ‘माहात्म्य’ प्रसंग यहाँ पूर्ण हुआ। अगले भाग (Part 11) से हम प्रथम स्कंध – ‘मंगलाचरण एवं नैमिषारण्य ऋषियों के छह प्रश्न’ का रसास्वादन करेंगे।]
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हे भगवद्भक्तों! श्रीमद्भागवत कथा माहात्म्य का यह पावन प्रसंग सिद्ध करता है कि अनुष्ठान की शुद्ध विधि और निष्काम भक्ति से साक्षात श्रीहरि प्रकट हो जाते हैं। यदि आप भी व्यास पीठ से प्रामाणिक कथा वाचन की शैली सीखना चाहते हैं, श्लोक-चौपाई गायन की कला समझना चाहते हैं तथा श्रीमद्भागवत महापुराण के संपूर्ण ‘हस्तलिखित नोट्स’ (Katha Notes) प्राप्त करना चाहते हैं, तो ‘श्री राम देशिक प्रशिक्षण संस्थान’ से अवश्य जुड़ें।
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॥ जय श्री राधे! जय श्री कृष्ण! ॥
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