bhagwat puran katha hindi pdf भागवत महापुराण के कथा नोट्स
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श्रीमद्भागवत महापुराण कथा – Part 14
वेदों का विभाजन, महर्षि वेदव्यास जी का असंतोष, देवर्षि नारद जी का आगमन एवं पूर्वजन्म चरित्र
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परम भगवद्भक्तों एवं कथा अनुरागियों! ‘श्री राम देशिक प्रशिक्षण संस्थान’ की ओर से श्रीमद्भागवत कथा रसामृत के चतुर्दश भाग (Part 14) में आप सभी का हार्दिक अभिनंदन है। यदि आप व्यास पीठ पर बैठकर कथा वाचन की प्रामाणिक शैली सीखना चाहते हैं, श्लोकों के गूढ़ शास्त्रीय अर्थ समझना चाहते हैं तथा ‘कथा नोट्स’ (Katha Notes) प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमारे संस्थान से अवश्य जुड़ें। आइए, प्रथम स्कंध के चतुर्थ एवं पंचम अध्याय में वर्णित वेदव्यास जी के असंतोष तथा देवर्षि नारद जी के पूर्वजन्म चरित्र का रसास्वादन करते हैं।
🌸 शौनकादि ऋषियों का प्रश्न एवं वेदव्यास जी का प्राकट्य 🌸
शौनक जी सूत जी से श्रीमद्भागवत महापुराण की रचना की पृष्ठभूमि के विषय में पूछते हैं:
कस्मिन् युगे प्रवृत्तेयं स्थाने वा केन हेतुना।
कुतः सञ्चोदितः कृष्णः कृतवान् संहितां मुनिः।। (भा•1-4-3)
भावार्थ: “हे सूत जी! इस श्रीमद्भागवत महापुराण का निर्माण महर्षि वेदव्यास जी ने किस युग में किया, किस पवित्र स्थान पर किया और किस उद्देश्य से किया? किस प्रेरणा से प्रेरित होकर उन्होंने इस परम संहिता की रचना की?”
श्री सूत जी उत्तर देते हुए कहते हैं:
द्वापरे समनुप्राप्ते तृतीये युगपर्यये।
जातः पराशराद्योगी वासव्यां कलया हरेः।। (भा•1-4-14)
भावार्थ: तीसरे युग (द्वापर) के अंत में, महर्षि पराशर के द्वारा वसुकन्या सत्यवती के गर्भ से भगवान श्रीहरि के ‘कला अवतार’ के रूप में महर्षि वेदव्यास जी का प्राकट्य हुआ।
त्रिकालदर्शी व्यास जी ने अपनी दिव्य दृष्टि से देखा कि कलिकाल में जीवों की आयु, बुद्धि और भाग्य क्षीण हो जाएँगे तथा वे आलसी एवं मंदबुद्धि हो जाएँगे। सर्वसाधारण की सुगमता के लिए उन्होंने एकाकी वेद के चार विभाग किए:
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ऋग्वेद: महर्षि पैल को प्रदान किया।
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सामवेद: महर्षि जैमिनी को प्रदान किया।
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यजुर्वेद: महर्षि वैशम्पायन को प्रदान किया।
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अथर्ववेद: महर्षि सुमन्तु को प्रदान किया।
🌸 महाभारत ग्रंथ की रचना एवं वेदव्यास जी का असंतोष 🌸
वेदों के विभाग करने के पश्चात् भी व्यास जी ने विचार किया:
स्त्रीशूद्रद्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा।
भावार्थ: स्त्री, शूद्र और पतित ब्राह्मणों (द्विजबंधुओं) का वेदों के गूढ़ मंत्रों में सीधा अधिकार नहीं है। उनके कल्याण हेतु व्यास जी ने अत्यंत करुणा करके १ लाख श्लोकों वाले ‘महाभारत’ नामक महाइतिहास ग्रंथ की रचना की।
वेदों का विभाजन, पुराणों की रचना तथा महाभारत जैसा विशाल ग्रंथ लिखने के पश्चात् भी महर्षि वेदव्यास जी का चित्त शांत नहीं हुआ। वे सरस्वती नदी के तट पर ‘शम्याप्रास’ आश्रम में उदास होकर सोचने लगे— “सब कुछ रचने के पश्चात् भी मेरे हृदय में अपूर्णता और असंतोष क्यों है?”
🌸 देवर्षि नारद जी का आगमन एवं असंतोष का कारण 🌸
व्यास जी के चिंताकुल होने पर अचानक वहाँ ब्रह्मर्षि देवर्षि नारद जी का शुभ आगमन हुआ। व्यास जी ने नारद जी का विधिवत् पूजन कर उन्हें श्रेष्ठ आसन प्रदान किया।
देवर्षि नारद जी ने पूछा— “हे पाराशरनंदन! आपने वेदों का विभाग किया, महाभारत जैसा इतिहास रचा, फिर भी आप इतने उदास क्यों हैं?”
व्यास जी ने नम्रतापूर्वक कहा— “हे देवर्षि! आपका कथन सर्वथा सत्य है, किंतु मेरी अप्रसन्नता का वास्तविक कारण क्या है, यह मैं स्वयं नहीं समझ पा रहा हूँ। आप ही इसका समाधान बतलाएँ।”
नारद जी ने असंतोष का मूल कारण बतलाते हुए कहा:
यथा धर्मादयश्चार्था मुनिवर्यानुकीर्तिताः।
न तथा वासुदेवस्य महिमा ह्यनुवर्णितः।। (भा•1-5-9)
भावार्थ: “हे व्यास जी! आपने अपने ग्रंथों में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे पुरुषार्थों का तो विस्तृत वर्णन किया, किंतु भगवान वासुदेव की परम पावन अनन्य महिमा और उनकी विशुद्ध भक्ति का वैसा वर्णन नहीं किया जैसा किया जाना चाहिए था।”
नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम्।
भावार्थ: यदि कोई ज्ञान अथवा निष्काम कर्म भी भगवान अच्युत की भक्ति से रहित हो, तो वह निर्मल ज्ञान भी शोभित नहीं होता। इसलिए आप समाधिस्थ होकर केवल भगवान की अलौकिक एवं मधुर लीलाओं का गान करने वाले ग्रंथ की रचना कीजिए। प्रभु की कृपा से आपका असंतोष तत्क्षण दूर हो जाएगा।
🌸 देवर्षि नारद जी का पूर्वजन्म चरित्र (दासी-पुत्र प्रसंग) 🌸
व्यास जी की जिज्ञासा पर देवर्षि नारद जी ने अपने पूर्वजन्म की दिव्य कथा सुनाई:
अहं पुरातीतभवेऽभवं मुने दास्यास्तु कस्याश्चन वेदवादिनाम्।
निरूपितो बालक एव योगिनां शुश्रूषणे प्रावृषि निर्विविक्षताम्।। (भा•1-5-23)
भावार्थ: “हे मुने! पूर्वकल्प में मैं एक दासी का पुत्र था। बाल्यावस्था में ही मेरे पिता का देहांत हो गया। मेरी माता एक गाँव में सेवा-कार्य करके मेरा पालन करती थी। एक बार वर्षा ऋतु (चातुर्मास) में कुछ ज्ञानी वेदपाठी संत-महात्मा वहाँ पधारे। दासी-पुत्र होने पर भी मुझे उनकी सेवा में लगा दिया गया।”
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संंत-सेवा व उच्छिष्ट (प्रसाद) प्रभाव: “मैं मन, वचन, कर्म से निष्काम होकर उन महापुरुषों की सेवा करता। उनके भोजनोपरांत उनकी आज्ञा से जो पावन उच्छिष्ट (झूठा प्रसाद) बचता, उसे ग्रहण करता। उस भगवत्-प्रसाद के प्रभाव से मेरे अंतःकरण के समस्त पाप भस्म हो गए।”
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सत्संग से भक्ति प्रादुर्भाव: “वे महात्मा प्रतिदिन भगवान श्रीकृष्ण के गुण-अनुवाद और लीलाओं का कीर्तन करते थे। निरंतर कथा सुनने से मेरे हृदय में रजोगुण और तमोगुण का नाश होकर अनन्य ‘भगवद्-भक्ति’ का प्रादुर्भाव हो गया।”
चातुर्मास की समाप्ति पर जब वे संत जाने लगे, तो बालक नारद भी उनके पीछे चलने लगे। ऋषियों ने बालक की माता की असहाय स्थिति को देखकर उसे माता की सेवा करने का उपदेश दिया और जाते समय एक परम कल्याणकारी ‘चतुर्व्यूह मंत्र’ प्रदान किया:
नमो भगवते तुभ्यं वासुदेवाय धीमहि।
प्रद्युम्नायानिरुद्धाय नमः सङ्कर्षणाय च।। (भा•1-5-37)
🌸 माता का देहावसान एवं उत्तर दिशा की ओर गमन 🌸
संतों के चले जाने पर नारद जी प्रतिदिन उस द्वादशाक्षर मंत्र का जप करने लगे। एक दिन सायंकाल उनकी माता गाय दुहने के लिए निकलीं। अँधेरे में उनका पैर एक जहरीले सर्प पर पड़ गया, जिसके डसने से माता का देहांत हो गया।
अनाथ बालक ने इसे भगवान की विशेष कृपा माना:
अनुग्रहं मन्यमानः प्रातिष्ठं दिशमुत्तराम्।
भावार्थ: “मैंने माता के वियोग को भगवान का अनुग्रह (कृपा) माना कि प्रभु ने मेरा लौकिक बंधन भी काट दिया। मैं अंतिम संस्कार करके प्रभु-प्राप्ति की उत्कट लालसा लेकर उत्तर दिशा की ओर निकल पड़ा।”
अनेकों पर्वतों, घने वनों और नदियों को पार करते हुए बालक एक शांत सरोवर के तट पर पहुँचा। वहाँ स्नान करके और जल पीकर वह एक पीपल के वृक्ष के नीचे ध्यानमुद्रा में बैठ गया और ऋषियों के बताए अनुसार भगवान श्रीहरि के रूप का ध्यान करने लगा।
[क्रमशः… अगले भाग (Part 15) में हम पीपल के वृक्ष के नीचे नारद जी को भगवान के प्रथम दिव्य दर्शन, आकाशवाणी, पुनर्जन्म में ‘देवर्षि’ पद की प्राप्ति तथा व्यास जी द्वारा श्रीमद्भागवत रचना के पावन प्रसंग का रसास्वादन करेंगे।]
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हे कथा रसिकों! श्रीमद्भागवत का यह प्रसंग सिखाता है कि सांसारिक ज्ञान कितना भी विशाल क्यों न हो, जब तक जीवन में ‘भगवद्-भक्ति’ और ‘संत-कृपा’ का समावेश नहीं होता, तब तक शांति प्राप्त नहीं हो सकती। यदि आप भी व्यास पीठ से प्रामाणिक कथा वाचन की शैली सीखना चाहते हैं, श्लोकों की व्याख्या तथा ‘हस्तलिखित कथा नोट्स’ (Katha Notes) प्राप्त करना चाहते हैं, तो ‘श्री राम देशिक प्रशिक्षण संस्थान’ आपके उज्ज्वल भविष्य के लिए सदैव तत्पर है।
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॥ जय श्री राधे! जय श्री कृष्ण! ॥
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