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katha vachak kaise bane कथा वाचक कैसे बने

On: September 30, 2026 3:54 AM
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श्रीमद्भागवत महापुराण कथा – Part 15

देवर्षि नारद जी का अलौकिक दर्शन, पुनर्जन्म, श्रीमद्भागवत की रचना एवं श्रीशुकदेव जी का आकर्षण

🙏 श्री राम देशिक प्रशिक्षण संस्थान में आपका स्वागत है 🙏

परम भगवद्भक्तों एवं कथा अनुरागियों! ‘श्री राम देशिक प्रशिक्षण संस्थान’ की ओर से श्रीमद्भागवत कथा रसामृत के पंचदश भाग (Part 15) में आप सभी का हार्दिक अभिनंदन है। यदि आप व्यास पीठ से कथा वाचन की शास्त्रीय शैली सीखना चाहते हैं, श्लोकों की प्रामाणिक व्याख्या समझना चाहते हैं तथा ‘कथा नोट्स’ (Katha Notes) प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमारे संस्थान से अवश्य जुड़ें। आइए, प्रथम स्कंध के पंचम व षष्ठ अध्याय में वर्णित देवर्षि नारद जी के अलौकिक भगवद्-दर्शन, श्रीमद्भागवत ग्रंथ की रचना एवं परमवीतराग श्रीशुकदेव जी महाराज के कथा-आकर्षण के पावन प्रसंग का रसास्वादन करते हैं।

🌸 भगवद्-दर्शन, आकाशवाणी एवं देवर्षि पद की प्राप्ति 🌸

पीपल के वृक्ष के नीचे ध्यानमग्न बालक नारद के हृदय में भगवत्-प्राप्ति की उत्कट अभिलाषा जागृत हुई। प्रेमलक्षण भक्ति के कारण उनके नेत्रों से अश्रुओं की धारा बहने लगी। उसी क्षण सर्वेश्वर भगवान श्रीहरि का परम सुंदर विग्रह उनके हृदयकमल में प्रकट हो गया।

प्रभु के दिव्य दर्शन पाकर बालक आनंद-सागर में निमग्न हो गया, किंतु क्षणभर में ही वह रूप अंतर्ध्यान हो गया। छवि अदृश्य होते ही बालक व्याकुल हो उठा। उसने पुनः ध्यान लगाने का प्रयास किया, किंतु रूप प्रकट न हुआ। तभी आकाश से गंभीर आकाशवाणी हुई:

अविपक्वकषायाणां दुर्दर्शोऽहं कुयोगिनाम्।

भावार्थ: “हे बालक! जिनकी विषय-वासनाएँ अभी पूर्णतः निवृत्त नहीं हुई हैं, ऐसे अपरिपक्व साधकों को मेरा दर्शन सुलभ नहीं होता। तुम्हें जो एक बार मेरा यह दिव्य रूप दिखाई दिया है, वह केवल तुम्हारे हृदय में मेरे प्रति अनन्य अनुराग उत्पन्न करने तथा ऋषियों के आशीर्वाद को सत्य सिद्ध करने के लिए था। अब इस भौतिक जन्म में तुम्हें मेरा दर्शन नहीं होगा। आगामी कल्प में तुम मेरे नित्य पार्षद बनोगे।”

आकाशवाणी सुनकर बालक नारद निष्काम भाव से भगवान की नाम-लीला का गान करते हुए समय की प्रतीक्षा करने लगे। कल्प का अंत होने पर प्रलय जल में जब सर्वेश्वर श्रीहरि योगनिद्रा में लीन होने लगे, तब बालक नारद ब्रह्मा जी के साथ भगवान के श्वास के माध्यम से उनके हृदय में प्रविष्ट हो गए।

हज़ार चतुर्युगी बीतने के पश्चात् जब पुनः नूतन सृष्टि का प्रारंभ हुआ, तब वे ब्रह्मा जी के मानस पुत्र होकर प्रकट हुए। सर्वेश्वर श्रीहरि ने उन्हें स्वयं ‘देवर्षि’ पद प्रदान कर यह दिव्य ‘वीणा’ सौंपी, जिसकी स्वर-लहरी पर वे त्रिलोक में निरंतर प्रभु-नाम का संकीर्तन करते रहते हैं।

🌸 🎵 संकीर्तन: जिसको जीवन में मिला सतसंग है 🎵 🌸

जिसको जीवन में मिला सतसंग है, उसे हर घड़ी आनंद ही आनंद है।

जिसका हरि से जुड़ा सम्बन्ध है, उसे हर घड़ी आनंद ही आनंद है॥

तुलसी, मीरा, कबीरा ने गाया, सूरदास ने दर्शन पाया।

जिसके हृदय में राम नाम बंद है, उसे हर घड़ी आनंद ही आनंद है…

जिसका जीवन सच्चाई में ढल गया, उसके पापों का पर्वत भी टल गया।

रोम-रोम में बसे गोविंद हैं, उसे हर घड़ी आनंद ही आनंद है…

संत-ऋषियों की वाणी को मानो, तत्त्व क्या है जगत् का यह जानो।

उसका चौरासी कट जाए फंद है, उसे हर घड़ी आनंद ही आनंद है…

स्वर्ग जाने की इच्छा नहीं है, मुक्ति पाने की इच्छा नहीं है।

स्वयं किशोरी ही परमानंद हैं, उसे हर घड़ी आनंद ही आनंद है…

🌸 श्रीमद्भागवत महापुराण की रचना एवं शौनकादि ऋषियों का प्रश्न 🌸

देवर्षि नारद जी ने व्यास जी से कहा— “हे मुने! कहाँ तो मैं एक दासी का साधारण पुत्र था और कहाँ आज भगवान की कृपा से देवर्षि नारद बन गया! यह सब केवल भगवद्-गुणानुवाद और सत्संग का ही प्रभाव है।” ऐसा कहकर नारद जी स्वच्छंद भाव से प्रभु-कीर्तन करते हुए प्रस्थान कर गए।

तदुपरांत महर्षि वेदव्यास जी ने सरस्वती नदी के तट पर ‘शम्याप्रास’ आश्रम में समाधिस्थ होकर परम परमहंसों की संहिता ‘श्रीमद्भागवत महापुराण’ (१८,००० श्लोक) की रचना की।

यहाँ नैमिषारण्य में शौनक जी ने सूत जी से प्रश्न किया:

प्रश्न: “हे सूत जी! श्रीशुकदेव जी महाराज तो जन्म लेते ही संसार का त्याग कर वन में चले गए थे। वे तो पूर्ण निवृत्तिपरायण एवं ब्रह्मज्ञानी थे। फिर उन्होंने किस कारण से इस श्रीमद्भागवत महापुराण का अध्ययन किया?”

🌸 श्रीशुकदेव जी को आकर्षित करने वाले दो दिव्य श्लोक 🌸

सूत जी कहते हैं— “हे ऋषियों! श्रीमद्भागवत की रचना के पश्चात् महर्षि वेदव्यास जी विचार करने लगे कि इस ग्रंथ का सबसे उत्तम और योग्य अधिकारी कौन हो सकता है? तब उन्हें अपने परम वीतराग पुत्र श्रीशुकदेव जी का ध्यान आया।”

व्यास जी ने अपने शिष्यों को भागवत के दो दिव्य श्लोक कंठस्थ कराए और उन्हें वन में भेज दिया। जब शिष्य उसी वन में पहुँचे जहाँ श्रीशुकदेव जी समाधिस्थ बैठे थे, तो एक शिष्य ने भगवान के सुंदर रूप-सौंदर्य का वर्णन करने वाला प्रथम श्लोक गाया:

बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं

बिभ्रद् वासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम्।

रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन् गोपवृन्दै-

र्वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद् गीतकीर्तिः।। (भा•1-7-5)

भावार्थ: भगवान श्रीकृष्ण ने मस्तक पर मयूर-पिच्छ धारण किया है। नटवर के समान सुंदर वेश है, कानों में पीले कनेर का पुष्प, अंगों पर स्वर्ण समान पीतांबर और गले में पंचरंगी वैजयंती माला सुशोभित है। अपने अधरामृत से वंशी के छिद्रों को पूरित करते हुए और ग्वाल-बालों के साथ अपनी कीर्तन-महिमा गाते हुए प्रभु वृंदावन में प्रवेश कर रहे हैं।

इस श्लोक को सुनते ही शुकदेव जी का ब्रह्म-ध्यान टूट गया। वे उठने ही वाले थे कि उनके मन में विचार आया— “जो रूपवान होते हैं, उनमें रूप का अभिमान हो सकता है।”

तभी दूसरे शिष्य ने भगवान के परम दयालु स्वभाव को प्रकट करने वाला द्वितीय श्लोक सुनाया:

अहो बकी यं स्तनकालकूटं जिघांसयापाययदप्यसाध्वी।

लेभे गतिं धात्र्युचितां ततोऽन्यं कं वा दयालुं शरणं व्रजेम।। (भा•1-7-9)

भावार्थ: अहा! वह दुष्टा राक्षसी पूतना—जो बाल-कृष्ण को मारने की नीच भावना से अपने स्तनों में कालकूट विष लगाकर आई थी, उस परम कृपालु भगवान ने उसे भी माता की (धाय-माता की) परम गति प्रदान कर दी! ऐसे परम दयालु श्रीहरि को छोड़कर हम और किसकी शरण में जाएँ?

इस श्लोक को सुनते ही श्रीशुकदेव जी भावविभोर होकर खड़े हो गए और शिष्यों से बोले— “आप लोग अत्यंत मधुर श्लोक गा रहे हैं, मुझे और सुनाइए!”

शिष्यों ने कहा— “हमें तो इतना ही आता है। यदि आप और सुनना चाहते हैं, तो हमारे गुरुदेव महर्षि वेदव्यास जी के पास चलिए। उनके पास ऐसे १८,००० श्लोक हैं।”

पिता का नाम सुनते ही श्रीशुकदेव जी अत्यंत प्रसन्न हुए और अविलंब अपने पिता वेदव्यास जी के आश्रम पहुँचकर श्रीमद्भागवत महापुराण का पूर्ण अध्ययन किया।

[क्रमशः… अगले भाग (Part 16) में हम राजा परीक्षित का जन्म, पांडवों का महाप्रस्थान एवं श्रृंगी ऋषि के शाप का पावन प्रसंग सुनेंगे।]

🙏 श्री राम देशिक प्रशिक्षण संस्थान से जुड़ें 🙏

हे कथा रसिकों! श्रीमद्भागवत का यह प्रसंग सिद्ध करता है कि भगवान का सौंदर्य और उनकी अहैतुकी दया इतनी अद्भुत है कि जीवनमुक्त आत्माराम ज्ञानी भी प्रभु की भक्ति की ओर आकर्षित हो जाते हैं। यदि आप भी व्यास पीठ से प्रामाणिक कथा वाचन की शैली सीखना चाहते हैं, श्लोकों की विशुद्ध व्याख्या तथा ‘हस्तलिखित कथा नोट्स’ (Katha Notes) प्राप्त करना चाहते हैं, तो ‘श्री राम देशिक प्रशिक्षण संस्थान’ आपके उज्ज्वल भविष्य के लिए सदैव तत्पर है।

  • 🚩 व्यास पीठ एवं कथा वाचन प्रशिक्षण (Katha Training)

  • 🚩 श्रीमद्भागवत महापुराण के सरल, प्रामाणिक एवं क्रमबद्ध नोट्स

  • 🚩 वैदिक श्लोक, मंगलाचरण एवं संकीर्तन गायन प्रशिक्षण

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॥ जय श्री राधे! जय श्री कृष्ण! ॥

 
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