bhagwat katha notes pdf भागवत सप्ताह कथा पुस्तक
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श्रीमद्भागवत महापुराण कथा – Part 16
आत्माराम श्लोक, अश्वत्थामा का क्रूर कृत्य, द्रौपदी की करुणा एवं उत्तरा की करुण पुकार
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परम भगवद्भक्तों एवं कथा अनुरागियों! ‘श्री राम देशिक प्रशिक्षण संस्थान’ की ओर से श्रीमद्भागवत कथा रसामृत के षोडश भाग (Part 16) में आप सभी का हार्दिक अभिनंदन है। यदि आप व्यास पीठ से कथा वाचन की प्रामाणिक एवं मधुर शैली सीखना चाहते हैं, श्लोकों के गूढ़ शास्त्रीय रहस्य समझना चाहते हैं तथा ‘कथा नोट्स’ (Katha Notes) प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमारे संस्थान से अवश्य जुड़ें। आइए, प्रथम स्कंध के सप्तम अध्याय में वर्णित आत्माराम श्लोक, अश्वत्थामा के दंभ, द्रौपदी की अद्भुत क्षमाशीलता और उत्तरा की रक्षा-कातर पुकार का रसास्वादन करते हैं।
🌸 प्रसिद्ध ‘आत्माराम श्लोक’ एवं राजा परीक्षित कथा की पृष्ठभूमि 🌸
महर्षि वेदव्यास जी के शिष्यों से श्रीहरि के रूप और स्वभाव का वर्णन सुनकर परमहंस श्रीशुकदेव जी महाराज अपने पिता के पास लौटे और संपूर्ण श्रीमद्भागवत महापुराण का अध्ययन किया। सूत जी शौनकादि ऋषियों को बतलाते हैं:
आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे।
कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः।। (भा•1-7-10)
भावार्थ: हे ऋषियों! भगवान श्रीहरि के दिव्य गुण ही ऐसे अलौकिक हैं कि जो ज्ञानी मुनि स्वयं में रमण करने वाले (आत्माराम) हैं और जिनकी अविद्या रूपी हृदय-ग्रंथि पूर्णतः खुल चुकी है, वे भी भगवान श्रीहरि की अहैतुकी (निष्काम) भक्ति करने लगते हैं। ऐसे अहैतुक कल्याणकारी गुणों से युक्त हमारे प्रभु श्रीहरि हैं।
तदुपरांत शौनक जी ने पूछा— “हे सूत जी! श्रीशुकदेव जी ने इस परम पवित्र भागवत संहिता का वाचन राजा परीक्षित को किस स्थान पर और किस कारण से सुनाया?” ऋषियों की इस जिज्ञासा को शांत करने के लिए सूत जी राजा परीक्षित के जन्म और उनके पूर्व महाभारत युद्ध के अंत की पावन कथा प्रारंभ करते हैं।
🌸 पांडव-पुत्रों का वध एवं दुर्योधन का अंत 🌸
महाभारत का भीषण युद्ध समाप्त हो चुका था। कौरव और पांडव पक्ष के अधिकांश वीर गति को प्राप्त हो चुके थे। भीमसेन के प्रचंड गदा-प्रहार से दुर्योधन की जंघा टूट चुकी थी और वह कुरुक्षेत्र के समरांगण में अधमरा पड़ा कराह रहा था।
अश्वत्थामा ने दुर्योधन के पास आकर पांडवों के नाश की प्रतिज्ञा की। दुर्योधन ने अपने ही रक्त से अश्वत्थामा का सेनापति के रूप में तिलक किया। रात्रि में एक वटवृक्ष के नीचे बैठे अश्वत्थामा ने देखा कि कैसे एक उल्लू सोते हुए कौओं पर आक्रमण करके उनका वध कर रहा है। इसी कूटनीति से प्रेरणा लेकर अश्वत्थामा रात्रि के अंधकार में पांडवों के शिविर में घुसा।
भगवान की सीख: विजय की रात्रि में विश्राम या असावधानी नहीं, अपितु प्रभु-भजन और सत्संग-जागरण करना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण पांडवों को शिविर से बाहर ले गए थे, किंतु शिविर में द्रौपदी के पाँचों पुत्र (प्रतिविंध्य, श्रुतसेन, श्रुतकीर्ति, शतानीक और श्रुतकर्मा) सो रहे थे। अश्वत्थामा ने उन्हें पांडव समझकर सोते में ही उनके सिर काट दिए।
जब दुर्योधन ने चंद्र-प्रकाश में कटे सिरों को देखा, तो उसे बोध हुआ कि ये पांडव नहीं, उनके निर्दोष बालक हैं। पुत्र-हीन पांडव वंश के नाश का दुख और पश्चाताप सहते हुए दुर्योधन ने अत्यंत शोक में प्राण त्याग दिए।
🌸 द्रौपदी का विलाप, अर्जुन की प्रतिज्ञा एवं ब्रह्मास्त्र संधान 🌸
प्रातःकाल जब माता द्रौपदी को अपने पाँचों पुत्रों के वध का समाचार मिला, तो वे शोकाकुल होकर रोने लगीं:
माता शिशूनां निधनं सुतानां निशम्य घोरं परितप्यमाना।
तदारूदद्वाष्पकलाकुलाक्षी तां सान्त्वयन्नाह किरीटमाली।। (भा•1-7-14)
भावार्थ: अपने छोटे-छोटे बालकों का घोर वध सुनकर माता द्रौपदी अत्यंत संतप्त होकर अश्रु-पूरित नेत्रों से रोने लगीं। तब अर्जुन ने उन्हें सांत्वना देते हुए दृढ़ प्रतिज्ञा की— “हे देवि! जिस नीच आततायी ने तुम्हारे पुत्रों का वध किया है, मैं उसका मस्तक काटकर तुम्हारे चरणों में लाऊँगा, तभी तुम उसके मस्तक पर पैर रखकर स्नान करना।”
अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण को सारथी बनाया और अश्वत्थामा का पीछा किया। भयभीत अश्वत्थामा जब भाग न सका, तो उसने अपनी रक्षा के लिए प्राणघाती ब्रह्मास्त्र का संधान कर दिया। ब्रह्मास्त्र की प्रचंड ज्वाला दसों दिशाओं को जलाने लगी। अर्जुन ने भगवान की शरण ली। प्रभु के निर्देशानुसार अर्जुन ने भी ब्रह्मास्त्र छोड़ा। दोनों ब्रह्मास्त्रों के टकराने से प्रलयकारी अग्नि प्रकट हो गई।
लोक-कल्याण हेतु श्रीकृष्ण की आज्ञा से अर्जुन ने दोनों ब्रह्मास्त्रों को वापस लौटा लिया और अश्वत्थामा को पशु की भाँति रस्सियों से बाँधकर शिविर में ले आए।
🌸 द्रौपदी की अद्भुत क्षमाशीलता एवं गुरु-भक्ति 🌸
अश्वत्थामा को बंदी बनाकर लाने पर भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के धर्म और हृदय की परीक्षा लेने हेतु कहा:
मत्तं प्रमत्तमुन्मत्तं सुप्तं बालं स्त्रियं जडम्।
प्रपन्नं विरथं भीतं न रिपुं हन्ति धर्मवित्।। (भा•1-7-36)
भावार्थ: धर्मशास्त्रों के ज्ञाता पुरुष कभी भी असावधान, मत्त, पागल, सोए हुए, बालक, स्त्री, मूर्ख, शरण में आए, रथहीन और भयभीत शत्रु पर प्रहार नहीं करते। किंतु इस आततायी ने सोते हुए बालकों की हत्या की है, अतः इसका वध करना ही उचित है।
किंतु अर्जुन का हृदय उदार था। जब वे अश्वत्थामा को द्रौपदी के सम्मुख लाए, तो अपने पुत्रों के हत्यारे को पशु की भाँति बँधा देखकर भी महान सती द्रौपदी का हृदय करुणा से भर आया। द्रौपदी ने हाथ जोड़कर कहा:
मुच्यतां मुच्यतामेष ब्राह्मणो नितरां गुरुः।
भावार्थ: “इन्हें छोड़ दीजिए! इन्हें अविलंब मुक्त कर दीजिए! ये ब्राह्मण हैं और हमारे परम पूज्य गुरुदेव द्रोणाचार्य के पुत्र हैं। जिस प्रकार अपने पुत्रों के शोक में मैं आज रो रही हूँ, उसी प्रकार इनकी माता कृपी (गौतमी) अपने पुत्र के शोक में न रोए। गुरु-पुत्र का वध धर्मसंगत नहीं है।”
🌸 श्रीकृष्ण का धर्म-संकट एवं अर्जुन का अद्भुत न्याय 🌸
द्रौपदी के धर्मयुक्त वचनों का धर्मराज युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव और श्रीकृष्ण ने समर्थन किया, किंतु अत्यंत क्रोधित भीमसेन गदा उठाकर अश्वत्थामा को मारने दौड़े। तब भगवान श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए अर्जुन से कहा:
ब्रह्मबन्धुर्न हन्तव्य आततायी वधार्हण:।
मयैवोभयमाम्नातं परिपाह्यनुशासनम्।। (भा•1-7-53)
भावार्थ: “हे अर्जुन! अधम ब्राह्मण का वध नहीं करना चाहिए और आततायी को जीवित छोड़ना भी नहीं चाहिए। ये दोनों ही नीतिशास्त्र के नियम मैंने बनाए हैं। अतः तुम मेरी दोनों आज्ञाओं का संतुलन बनाते हुए द्रौपदी की प्रतिज्ञा भी पूरी करो और भीम तथा मेरी प्रसन्नता भी सिद्ध करो।”
भगवान के संकेत को समझकर अर्जुन ने अपनी तीक्ष्ण तलवार से अश्वत्थामा के मस्तक पर स्थित दिव्य मणि को काट लिया, उसके बाल मुँडकर उसे कुरूप बना दिया, उसकी सारी धन-संपदा छीन ली और अपमानित करके शिविर से निकाल दिया।
वपनं द्रविणादानं स्थानान्निर्यापणं तथा।
एष हि ब्रह्मबन्धूनां वधो नान्योऽस्ति दैहिकः।। (भा•1-7-57)
भावार्थ: सिर के केश मुँड देना, धन-संपत्ति छीन लेना और स्थान से अपमानित करके निकाल देना—शास्त्रों में अधम ब्राह्मणों के लिए यही मृत्यु-तुल्य वध माना गया है; उनके लिए शारीरिक प्राण-दंड का विधान नहीं है।
🌸 उत्तरा के गर्भ पर ब्रह्मास्त्र एवं रक्षा की कातर पुकार 🌸
इस भयंकर अपमान से तिलमिलाए अश्वत्थामा ने पांडवों के अंतिम वंशज को समाप्त करने के उद्देश्य से अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रहे शिशु को लक्ष्य करके पुनः अमोघ ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर दिया।
गर्भ में जलती हुई अग्नि का अनुभव करके भीत-कातर होकर राजकन्या उत्तरा भागती हुई सर्वेश्वर श्रीकृष्ण के श्रीचरणों में गिर पड़ी और करुण स्वर में रक्षा की गुहार लगाने लगी…
[क्रमशः… अगले भाग (Part 17) में हम उत्तरा-कृत श्रीकृष्ण स्तुति (“पाहि पाहि महायोगिन्”), भगवान द्वारा गर्भ-रक्षा, परम पावन कुंती-स्तुति एवं राजा परीक्षित के जन्म का प्रसंग सुनेंगे।]
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हे कथा रसिकों! श्रीमद्भागवत का यह प्रसंग सिखाता है कि भीषण धर्म-संकट के समय भी क्षमा, करुणा और विवेक ही वास्तविक धर्म है। यदि आप भी व्यास पीठ से प्रामाणिक कथा वाचन की शैली सीखना चाहते हैं, श्लोकों की व्याख्या तथा ‘हस्तलिखित कथा नोट्स’ (Katha Notes) प्राप्त करना चाहते हैं, तो ‘श्री राम देशिक प्रशिक्षण संस्थान’ आपके उज्ज्वल भविष्य के लिए सदैव तत्पर है।
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॥ जय श्री राधे! जय श्री कृष्ण! ॥
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