भागवत कथा बोलना कैसे सीखें bhagwat katha kaise bolna sikhe
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श्रीमद्भागवत महापुराण कथा – Part 17
उत्तरा के गर्भ की रक्षा, कुंती की अद्भुत विपद्-स्तुति, युधिष्ठिर का मोह एवं भीष्म पितामह का शरशय्या पर प्राकट्य
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परम भगवद्भक्तों एवं कथा अनुरागियों! ‘श्री राम देशिक प्रशिक्षण संस्थान’ की ओर से श्रीमद्भागवत कथा रसामृत के सप्तदश भाग (Part 17) में आप सभी का हार्दिक अभिनंदन है। यदि आप व्यास पीठ से कथा वाचन की प्रामाणिक एवं मधुर शैली सीखना चाहते हैं, श्लोकों के गूढ़ शास्त्रीय रहस्य समझना चाहते हैं तथा ‘कथा नोट्स’ (Katha Notes) प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमारे संस्थान से अवश्य जुड़ें। आइए, प्रथम स्कंध के अष्टम एवं नवम अध्याय में वर्णित उत्तरा की रक्षा, कुंती की अनन्य विपद्-स्तुति, युधिष्ठिर का शोक और पितामह भीष्म के परम पावन दर्शन का रसास्वादन करते हैं।
🌸 उत्तरा की कातर पुकार एवं भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गर्भ-रक्षा 🌸
अश्वत्थामा द्वारा छोड़े गए प्रलयकारी ब्रह्मास्त्र की अग्नि से बचने के लिए अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा भयभीत होकर दौड़ती हुई भगवान श्रीकृष्ण की शरण में आईं और करुण स्वर में प्रार्थना करने लगीं:
पाहि पाहि महायोगिन् देवदेव जगत्पते।
नान्यं त्वदभयं पश्ये यत्र मृत्युःपरस्परम्।। (भा•1-8-9)
भावार्थ: “हे देवाधिदेव, जगदीश्वर, महायोगी! मेरी रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए। इस संसार में जहाँ चारों ओर मृत्यु का तांडव है, आपके अतिरिक्त मुझे कोई दूसरा अभयदाता दिखाई नहीं देता। यह जलता हुआ बाण मेरी ओर आ रहा है। मुझे अपने प्राणों का भय नहीं है, किंतु मेरे गर्भ में पल रहे इस एकमात्र शिशु की रक्षा कीजिए। यदि इस वंश का दीपक बुझ गया, तो लोग कहेंगे कि पांडव-कुल के रक्षक स्वयं श्रीकृष्ण थे, फिर भी उनका वंश नष्ट हो गया।”
भक्तवत्सल भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तरा की कातर पुकार सुनकर अपनी योगमाया के माध्यम से सूक्ष्म शरीर धारण किया और उत्तरा के गर्भ में प्रवेश कर अपने सुदर्शन चक्र से उस दिव्य अस्त्र के तेज को रोकते हुए गर्भस्थ शिशु की रक्षा की।
🌸 कुंती की अनन्य स्तुति एवं ‘विपद्-वरदान’ प्रसंग 🌸
जब उत्तरा पूरी तरह स्वस्थ हो गईं और भगवान श्रीकृष्ण द्वारका लौटने की अनुमति लेने लगे, तब पांडवों की माता कुंती ने हाथ जोड़कर भगवान की अलौकिक स्तुति की:
नमस्ये पुरुषं त्वाऽऽद्यमीश्वरं प्रकृतेः परम्।
अलक्ष्यं सर्वभूतानामन्तर्बहिरवस्थितम्।। (भा•1-8-18)
भावार्थ: “हे प्रभु! मैं आपको बारंबार नमस्कार करती हूँ, जो प्रकृति से परे, समस्त चराचर जगत के आदि कारण और भीतर-बाहर सर्वत्र विराजमान हैं।”
भगवान श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए कहा— “बुआ जी! आप पूज्यनीय हैं, आपको मुझे प्रणाम करना चाहिए, आप उल्टी गंगा क्यों बहा रही हैं?”
कुंती जी ने गद्गद स्वर में उत्तर दिया— “प्रभु! इसी नाते-रिश्ते के छल से आप हमें अब तक भ्रमित करते आए हैं, किंतु आज मैं जान गई हूँ कि आप साक्षात परब्रह्म हैं। आपने माया का पर्दा डालकर अपने वास्तविक स्वरूप को छिपा रखा है।” कुंती जी अपने पूर्व संस्मरण सुनाते हुए कहती हैं कि आपने कंस के कारागार से लेकर लाक्षागृह, वनवास और महाभारत युद्ध के प्रत्येक चरण में हमारी रक्षा की है। इसलिए मैं आपसे केवल एक ही वरदान माँगती हूँ:
विपदः सन्तु नः शश्वत्तत्र तत्र जगद्गुरो।
भवतो दर्शनं यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम्।। (भा•1-8-25)
भावार्थ: “हे जगद्गुरु! हमारे जीवन में पग-पग पर विपत्तियाँ आएँ! क्योंकि विपत्ति आने पर ही आपका स्मरण और आपके दिव्य दर्शन प्राप्त होते हैं, और आपका एक बार दर्शन भी संसार-बंधन (जन्म-मृत्यु के फेरे) से मुक्त कराने वाला है।”
विपत्ति और संपत्ति का रहस्य:
“विपत्ति, विपत्ति नहीं है और संपत्ति, संपत्ति नहीं है; भगवान का विस्मरण होना ही सबसे बड़ी विपत्ति है और विपत्ति में भी भगवान का स्मरण होना ही संसार की सबसे बड़ी संपत्ति है।”
कह हनुमंत विपति प्रभु सोई।
जब तक सुमिरन भजन न होई॥
भगवान श्रीकृष्ण कुंती जी की इस अनन्य भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्हें अविचल भक्ति का आशीर्वाद देकर कुछ और दिन हस्तिनापुर में निवास किया।
🌸 🎵 संकीर्तन: सुख भी मुझे प्यारे है, दुःख भी मुझे प्यारे है 🎵 🌸
सुख भी मुझे प्यारे हैं, दुःख भी मुझे प्यारे हैं, छोड़ूँ मैं किस भगवान, दोनों ही तुम्हारे हैं।
सुख-दुःख ही तो दुनिया की गाड़ी को चलाते हैं, सुख-दुःख ही हम सबको इंसान बनाते हैं॥
दुःख चाहे ना कोई, सब सुख को तरसते हैं, सुख में सब हँसते हैं, दुःख में सब रोते हैं।
सुख मिले उसे जिसमें दुःख ही तो सहारे हैं, छोड़ूँ…
मैं कैसे कहूँ मुझको सुख दो या दुःख दो, जो भी तेरी मर्जी हो, मर्जी से मुझे दे दो।
मैंने तो तेरे आगे बस हाथ पसारे हैं, छोड़ूँ…
सुख में तेरा शुक्र करूँ, दुःख में फरियाद करूँ, जिस हाल में तू रखे, उस हाल में याद रखूँ।
यादों में वियोगी ने ये गीत सवारे हैं, छोड़ूँ…
🌸 राजा युधिष्ठिर का विषाद एवं कुरुक्षेत्र गमन 🌸
एक दिन भगवान श्रीकृष्ण ने एकांत में सम्राट युधिष्ठिर को असीम दुःख में डूबे और रोते हुए देखा। श्रीकृष्ण ने पूछा— “महाराज, आप संपूर्ण पृथ्वी के सम्राट हैं, फिर भी आपका यह विलाप किसलिए?”
युधिष्ठिर ने हाथ जोड़कर कहा— “प्रभु! इस चक्रवर्ती राज्य का मैं क्या करूँ? जब मैं सिंहासन पर बैठता हूँ, तो मुझे अपनों के वध का पाप कचोटता है। युद्ध में मारे गए स्वजनों और विधवाओं के आँसू मेरी आँखों से ओझल नहीं होते।”
धर्मराज युधिष्ठिर के इस आंतरिक संताप और विषाद को दूर करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण पांडवों को साथ लेकर कुरुक्षेत्र की उस पावन भूमि पर ले गए, जहाँ इच्छा मृत्यु के वरदान से युक्त पितामह भीष्म बाणों की शय्या (शरशय्या) पर लेटे हुए थे।
🌸 भीष्म पितामह द्वारा श्रीकृष्ण के परम स्वरूप की पहचान 🌸
जब देवता, ऋषि और महर्षि भीष्म पितामह के दर्शन के लिए पहुँचे, तो पांडवों ने भी सप्रेम पितामह को प्रणाम किया। भीष्म जी ने सबका यथोचित सत्कार करने के पश्चात् पूछा— “क्या श्रीकृष्ण नहीं आए?”
पांडवों ने कहा— “पितामह, वे सामने खड़े हैं।”
सहदेव ने कहा— “यह हमारे ममेरे भाई हैं।”
नकुल ने कहा— “यह हमारे मित्र हैं।”
भीम ने कहा— “यह हमारे परम हितैषी हैं।”
युधिष्ठिर ने कहा— “यह हमारे मंत्री हैं।”
और अर्जुन ने कहा— “यह मेरे सारथी हैं।”
पांडवों के इन सामान्य वचनों को सुनकर भीष्म पितामह ने प्रेम से गद्गद होकर कहा— “अरे मूर्खों! तुम इन्हें अपना साधारण भाई या सारथी समझ रहे हो, किंतु सत्य यह है—”
यं मन्यसे मातुलेयं प्रियं मित्रं सुह्रत्तमम्।
अकरोः सचिवं दूतं सौह्रदादथ सारथिम्।। (भा•1-9-20)
एष वै भगवान साक्षादाद्यो नारायणः पुमान्।
भावार्थ: “जिन्हें तुम अपना ममेरा भाई, परम मित्र, हितैषी, मंत्री और सारथी मान रहे हो, वे और कोई नहीं, अपितु साक्षात आदि पुरुष, संपूर्ण जगत के कारण भगवान नारायण हैं!”
भीष्म पितामह ने अपनी अंतिम इच्छा व्यक्त करते हुए कहा—
स देवदेवो भगवान् प्रतीक्षतां कलेवरं यावदिदं हिनोम्यहम्।
प्रसन्नहासारुणलोचनोल्लसन्मुखाम्बुजो ध्यानपथश्चतुर्भुजः।। (भा•1-9-24)
भावार्थ: “जब तक मैं अपने इस भौतिक शरीर का त्याग करूँ, तब तक वे देवाधिदेव भगवान श्रीकृष्ण अपने प्रसन्न मुखकमल, मंद-हसमुख और लाल कमलों जैसे नेत्रों वाले चतुर्भुज रूप में मेरे सामने खड़े रहें!”
पितामह की इस अनन्य भावना का सम्मान करते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने तत्काल अपने चतुर्भुज रूप का प्राकट्य किया और पितामह भीष्म के सम्मुख खड़े हो गए। (क्योंकि भगवान का तो अटल नियम है— “मैं तो भक्तन हाथ बिकानो!”)
[क्रमशः… अगले भाग (Part 18) में हम भीष्म पितामह की दिव्य स्तुति, उनके शरीर त्याग, युधिष्ठिर को राजधर्म उपदेश और भगवान श्रीकृष्ण के द्वारका गमन का पावन प्रसंग सुनेंगे।]
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हे कथा रसिकों! श्रीमद्भागवत का यह प्रसंग सिखाता है कि विपत्तियाँ भगवान के स्मरण का मार्ग प्रशस्त करती हैं और प्रभु अपने शरणागत भक्तों के लिए सदैव सुलभ रहते हैं। यदि आप भी व्यास पीठ से प्रामाणिक कथा वाचन की शैली सीखना चाहते हैं, श्लोकों की विशुद्ध व्याख्या तथा ‘हस्तलिखित कथा नोट्स’ (Katha Notes) प्राप्त करना चाहते हैं, तो ‘श्री राम देशिक प्रशिक्षण संस्थान’ आपके उज्ज्वल भविष्य के लिए सदैव तत्पर है।
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॥ जय श्री राधे! जय श्री कृष्ण! ॥
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