भागवत के प्रमुख श्लोक और चौपाई नोट्स bhagwat pramukh shlok
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श्रीमद्भागवत महापुराण कथा – Part 18
पितामह भीष्म का धर्मोपदेश, बुद्धि-रूपी पुत्री का समर्पण, भीष्म की भीष्म-प्रतिज्ञा एवं श्रीकृष्ण का भक्तवत्सल स्वरूप
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परम भगवद्भक्तों एवं कथा अनुरागियों! ‘श्री राम देशिक प्रशिक्षण संस्थान’ की ओर से श्रीमद्भागवत कथा रसामृत के अष्टादश भाग (Part 18) में आप सभी का हार्दिक अभिनंदन है। यदि आप व्यास पीठ से कथा वाचन की प्रामाणिक एवं मधुर शैली सीखना चाहते हैं, श्लोकों के गूढ़ शास्त्रीय रहस्य समझना चाहते हैं तथा ‘कथा नोट्स’ (Katha Notes) प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमारे संस्थान से अवश्य जुड़ें। आइए, प्रथम स्कंध के नवम अध्याय में वर्णित पितामह भीष्म के उपदेश, उनकी अलौकिक स्तुति और भगवान श्रीकृष्ण के भक्तवत्सल चरित्र का रसास्वादन करते हैं।
🌸 पितामह भीष्म द्वारा विविध धर्मों का उपदेश एवं उत्तरायण काल 🌸
कुरुक्षेत्र की पवित्र भूमि में शरशय्या पर विराजमान पितामह भीष्म ने धर्मराज युधिष्ठिर के शोक और शंकाओं के निवारण हेतु संक्षेप तथा विस्तार से अनेक धर्मों का मर्म समझाया:
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दान धर्म: पात्र-अपात्र का विचार कर निःस्वार्थ भाव से किया जाने वाला दान।
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राज धर्म: प्रजा के पालन, न्याय, धर्म-रक्षा और दंड-नीति का विधान।
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मोक्ष धर्म: संसार के बंधनों से मुक्त होकर परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग।
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स्त्री धर्म: पतिव्रत धर्म, परिवार-संरक्षण और गृहिणी के पवित्र कर्तव्य।
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भगवद् धर्म: सर्वस्व प्रभु चरणों में समर्पित कर निष्काम भक्ति का आचरण।
पितामह भीष्म अभी यह उपदेश दे ही रहे थे कि सूर्यदेव का परम पवित्र उत्तरायण काल उपस्थित हो गया, जिसकी प्रतीक्षा योगी पुरुष अपने प्राण त्यागने हेतु करते हैं। भीष्म जी ने अपनी समस्त वृत्तियों एवं इंद्रियों को बाह्य संसार से समेटकर साक्षात सम्मुख विराजमान भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में एकाग्र कर दिया।
🌸 भीष्म-स्तुति एवं ‘बुद्धि रूपी पुत्री’ का समर्पण 🌸
पितामह भीष्म ने हाथ जोड़कर पुष्पिताग्रा छंद में एकादश (11) श्लोकों के द्वारा अपनी ग्यारह इंद्रिय रूपी पुष्पों को प्रभु के श्रीचरणों में अर्पित करते हुए स्तुति प्रारंभ की:
इति मतिरुपकल्पिता वितृष्णा भगवति सात्वतपुङ्गवे विभूम्नि।
स्वसुखमुपगते क्वचिद्विहर्तुं प्रकृतिमुपेयुषि यद्भवप्रवाहः।। (भा•1-9-32)
त्रिभुवनकमनं तमालवर्णं रविकरगौरवराम्बरं दधाने।
वपुरलककुलावृताननाब्जं विजयसखे रतिरस्तु मेऽनवद्या।। (भा•1-9-33)
भावार्थ: “हे प्रभु! त्रिभुवन में आपके समान सुंदर कोई दूसरा नहीं है। श्याम तमाल के समान सांवले श्रीविग्रह पर सूर्य की किरणों के समान दीप्तिमान पीतांबर शोभायमान है। आपके मुखारविंद पर घुंघराली अलकावलियाँ लटक रही हैं। ऐसे अर्जुन-सखा श्रीकृष्ण से मैं अपनी पुत्री का विवाह करना चाहता हूँ।”
भगवान एवं भीष्म जी का मधुर संवाद:
भगवान श्रीकृष्ण: “पितामह! आप तो आजन्म नैष्ठिक ब्रह्मचारी हैं, आपकी पुत्री कहाँ से आई?”
पितामह भीष्म: “प्रभो! मेरी यह बुद्धि (मति) ही मेरी पुत्री है। यह सर्वथा निष्काम और तृष्णा-रहित है। इस कामना-रहित बुद्धि रूपी पुत्री को मैं आपके श्रीचरणों में समर्पित करता हूँ।”
🌸 युद्ध-भूमि का अलौकिक दृश्य एवं भीष्म की भीष्म-प्रतिज्ञा 🌸
पितामह भीष्म महाभारत युद्ध के संस्मरणों को याद करते हुए कहते हैं— “हे नाथ! जब आप अर्जुन के सारथी बने थे और दोनों सेनाओं के मध्य रथ खड़ा किया था, उस समय युद्ध देखते सैनिकों की आयु को आप अपने दिव्य रूप के आकर्षण से स्वतः ही हरण कर रहे थे।”
तत्पश्चात् भीष्म जी उस घटना को याद करते हैं जब युद्ध के शुरुआती दिनों में पांडवों का बाल भी बाँका न होने पर दुर्योधन ने शकुनि के बहकावे में आकर भीष्म जी को ताना मारा था— “पितामह! आप पक्षपाती हैं, आपके हृदय में पांडवों का मोह है; अन्यथा परशुराम के शिष्य के सामने कौन टिक सकता है?”
तब पितामह भीष्म ने क्रोधित होकर अपनी भयंकर प्रतिज्ञा ली थी:
“जो पे वीर पारथ को रथ ना मिलाऊं धूरि, तो पे कुरु वंशिन को अंश ही न जानिये।
जो पे मेरे बांण पाण्डवन के ना भेदें प्राण, तो पे कहि कायर प्रमाण ही बखानिये॥”
🌸 भक्त की प्रतिज्ञा हेतु प्रभु द्वारा अपनी प्रतिज्ञा का त्याग 🌸
पितामह भीष्म ने अपनी प्रतिज्ञा से भगवान श्रीकृष्ण को विवश कर दिया कि वे शस्त्र उठाएँ। तब भक्तवत्सल श्रीकृष्ण ने अपनी प्रतिज्ञा (“मैं युद्ध में अस्त्र-शस्त्र नहीं उठाऊँगा”) को तोड़कर अपने भक्त की प्रतिज्ञा सत्य सिद्ध की:
स्वनिगममपहाय मत्प्रतिज्ञा मृतमधिकर्तुमवप्लुतो रथस्थः।
धृतरथचरणोऽभ्ययाच्चलद्गुर्हरिरिव हन्तुमिभं गतोत्तरीयः।। (भा•1-9-37)
भावार्थ: “हे प्रभु! अपनी प्रतिज्ञा (शस्त्र न उठाने की) को भूलकर, मेरी प्रतिज्ञा (शस्त्र उठवाने की) को सत्य करने के लिए आप रथ से कूद पड़े। अपने पीतांबर को गिरते हुए भी न सँभालकर, टूटे हुए रथ का पहिया हाथ में लेकर आप मेरी ओर इस प्रकार दौड़े जैसे कोई सिंह हाथी पर आक्रमण करने झपटता है।”
यह दृश्य दर्शाता है कि भगवान स्वयं अपने नियम तोड़ सकते हैं, किंतु अपने भक्त के वचनों को कभी झूठा नहीं होने देते। “मैं तो भक्तन हाथ बिकानो!”
[क्रमशः… अगले भाग (Part 19) में हम पितामह भीष्म का परमधाम गमन, पांडवों का हस्तिनापुर आगमन, राजा युधिष्ठिर का राज्याभिषेक एवं भगवान श्रीकृष्ण के द्वारका गमन का पावन प्रसंग सुनेंगे।]
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हे कथा रसिकों! श्रीमद्भागवत का यह प्रसंग सिखाता है कि अपनी शुद्ध बुद्धि को भगवान के चरणों में समर्पित कर देना ही जीव का परम कल्याण है। यदि आप भी व्यास पीठ से प्रामाणिक कथा वाचन की शैली सीखना चाहते हैं, श्लोकों की विशुद्ध व्याख्या तथा ‘हस्तलिखित कथा नोट्स’ (Katha Notes) प्राप्त करना चाहते हैं, तो ‘श्री राम देशिक प्रशिक्षण संस्थान’ आपके उज्ज्वल भविष्य के लिए सदैव तत्पर है।
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🚩 व्यास पीठ एवं कथा वाचन प्रशिक्षण (Katha Training)
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॥ जय श्री राधे! जय श्री कृष्ण! ॥
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