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श्रीमद्भागवत महापुराण कथा – Part 21
श्रीकृष्ण का स्वधाम गमन, पांडवों का महाप्रस्थान, महाराज परीक्षित का दिग्विजय एवं कलियुग के ५ निवास स्थान
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परम भगवद्भक्तों एवं कथा अनुरागियों! ‘श्री राम देशिक प्रशिक्षण संस्थान’ की ओर से श्रीमद्भागवत कथा रसामृत के एकविंशति भाग (Part 21) में आप सभी का हार्दिक अभिनंदन है। यदि आप व्यास पीठ से कथा वाचन की प्रामाणिक एवं मधुर शैली सीखना चाहते हैं, श्लोकों के गूढ़ शास्त्रीय रहस्य समझना चाहते हैं तथा ‘कथा नोट्स’ (Katha Notes) प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमारे संस्थान से अवश्य जुड़ें। आइए, प्रथम स्कंध के चतुर्दश से सप्तदश अध्याय में वर्णित अर्जुन का विलाप, श्रीकृष्ण का स्वधाम गमन, पांडवों का स्वर्गारोहण, महाराज परीक्षित का कलि-निग्रह एवं कलियुग के निवास स्थानों का भावपूर्ण रसास्वादन करते हैं।
🌸 अर्जुन का द्वारका से आगमन एवं युधिष्ठिर की आशंका 🌸
भगवान श्रीकृष्ण की मनःस्थिति एवं द्वारकावासियों की कुशल-क्षेम जानने गए अर्जुन जब कई महीनों तक नहीं लौटे, तो हस्तिनापुर में महाराज युधिष्ठिर को अनेक अनिष्टकारी अपशकुन दिखाई देने लगे। युधिष्ठिर की बायीं जाँघ और आँख फड़कने लगी, सियार सूर्य की ओर मुख करके रोने लगे और मूर्तियों से अश्रु बहने लगे।
तभी सामने से अर्जुन आते दिखाई दिए। अर्जुन का मुख कांतिहीन था, आँखें अश्रुपूरित थीं और वे अत्यंत उदास थे। युधिष्ठिर ने व्यग्र होकर पूछा— “हे अर्जुन! द्वारका में हमारे स्वजन-संबंधी (उग्रसेन, वसुदेव, प्रद्युम्न, सांब आदि) सब कुशल से तो हैं? तुम्हारा यह कांतिहीन मुख क्यों है? क्या तुमने किसी वृद्ध, स्त्री, रोगी या शरणार्थी का अनादर तो नहीं कर दिया?”
जब अर्जुन केवल रोते रहे, तब युधिष्ठिर ने मर्मस्पर्शी श्लोक कहा:
कच्चित् प्रेष्ठतमेनाथ हृदयेनात्मबन्धुना।
शून्योऽस्मि रहितो नित्यं मन्यसे तेऽन्यथा न रुक्।। (भा•1-14-44)
भावार्थ: “हे अर्जुन! हो न हो, तुम्हारे इस असीम दुःख का केवल एक ही कारण है—जिस प्राणप्रिय, परम हितैषी श्रीकृष्ण के बल पर तुम इतराते थे, तुम उन्हीं श्रीकृष्ण से सदा-सदा के लिए रहित (वंचित) हो गए हो!”
🌸 श्रीकृष्ण स्वधाम गमन का समाचार एवं अर्जुन का विलाप 🌸
युधिष्ठिर की बात सुनकर अर्जुन का गला रुँध गया और वे फफक-फफक कर रो पड़े:
वञ्चितोऽहं महाराज हरिणा बन्धुरूपिणा।
येन मेऽपहृतं तेजो देवविस्मापनं महत्।। (भा•1-15-5)
तद्वै धनुस्त इषवः स रथो हयास्ते सोऽहं रथी नृपतयो यत आनमन्ति।
सर्वं क्षणेन तदभूदसदीशरिक्तं भस्मन् हुतं कुहकराद्धमिवोप्तमूष्याम्।। (भा•1-15-21)
भावार्थ: “हे महाराज! मित्र का रूप धारण करने वाले श्रीकृष्ण ने मुझे ठग लिया। जिनकी कृपा से मैंने द्रौपदी-स्वयंवर में मत्स्यभेद किया, खांडव वन का दहन किया, महादेव को प्रसन्न कर पाशुपतास्त्र पाया—उन्हीं प्रभु के चले जाने से मेरा सारा तेज नष्ट हो गया। द्वारका से लौटते समय साधारण भीलों ने मुझे एक अबला की भाँति हरा दिया और गोपियों को लूट लिया। यह वही मेरा गांडीव धनुष है, वही बाण, वही रथ और वही अर्जुन है, किंतु श्रीकृष्ण के बिना सब छार (व्यर्थ) हो गया।”
समय की बलवत्ता पर अमर दोहा:
“मनुज बली नहीं होत है, समय होत बलवान।
भीलन लूटी गोपिका, वही अर्जुन वही बाण॥”
अर्जुन ने आगे बताया कि विप्र-शाप से विमोहित होकर समस्त यदुवंशी मदिरा के नशे में आपस में लड़कर काल-कवलित हो गए। माता कुंती ने जैसे ही श्रीकृष्ण के स्वधाम गमन का समाचार सुना, उन्होंने भी अपने प्राणों को त्याग दिया।
🌸 पांडवों का महाप्रस्थान एवं परीक्षित का राज्याभिषेक 🌸
श्रीकृष्ण के स्वधाम गमन के पश्चात् पांडवों का संसार से मोह भंग हो गया। महाराज युधिष्ठिर ने अपने योग्य पौत्र परीक्षित को सम्पूर्ण भारतवर्ष का सम्राट बनाया और अनिरुद्ध के पुत्र वज्र को मथुरा का राजा नियुक्त किया। तत्पश्चात् पाँचों पांडव तथा द्रौपदी वल्कल (चीर-वस्त्र) धारण कर उत्तर दिशा की ओर हिमालय के माध्यम से स्वर्गारोहण (महाप्रस्थान) कर प्रभु-धाम को प्राप्त हुए।
🌸 धर्म-गो-संवाद एवं शूद्र-वेशी कलियुग का तांडव 🌸
महाराज परीक्षित ब्राह्मणों के उपदेशानुसार प्रजा का पालन करने लगे। उन्होंने उत्तरा की पुत्री इरावती से विवाह किया, जिनसे जनमेजय आदि चार पुत्र हुए।
दिग्विजय के समय सम्राट परीक्षित ने देखा कि धर्म (वृषभ रूप में, एक पैर पर टिके हुए) और पृथ्वी (गाय के रूप में, अश्रुपूरित) आपस में संवाद कर रहे हैं। धर्म ने पूछा— “देवि! आप क्यों रो रही हैं? क्या मेरे तीन चरण टूटने से दुःखी हैं या नराधम शूद्र राजाओं के आने से? अथवा श्रीकृष्ण के स्वधाम प्रस्थान से अनाथ होने के कारण व्यथित हैं?”
पृथ्वी देवी ने कहा— “हे धर्म! सर्वेश्वर श्रीकृष्ण के जाने के पश्चात् यह संसार दुष्ट कलियुग की कुदृष्टि का शिकार हो गया है, इसलिए मैं रो रही हूँ।”
इसी बीच राजा के वेश में एक दुष्ट शूद्र (कलियुग) वहाँ आया और गदा व डंडे से उस असहाय गाय और बैल को निर्ममता से पीटने लगा।
🌸 सुख-दुःख का वास्तविक चिंतन एवं धर्म के चार चरण 🌸
राजा परीक्षित ने तुरंत अपनी चमचमाती तलवार निकाली और कड़ककर कहा:
“जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृप अवस नरक अधिकारी॥”
जब परीक्षित ने वृषभ-रूपी धर्म से पूछा कि “आपके तीन पैर किसने काटे हैं?” तो धर्म ने अद्भुत दार्शनिक उत्तर दिया— “राजन्! कोई प्रारब्ध को, कोई कर्म को, कोई स्वभाव को तो कोई ईश्वर को दुःख का कारण मानता है।”
परीक्षित ताड़ गए और बोले— “आप साक्षात धर्म हैं! क्योंकि अधर्म करने वाले और उसका दोष दूसरों पर मढ़ने वाले में कोई अंतर नहीं होता।”
सुख-दुःख का वास्तविक सिद्धांत:
सुखस्य दुःखस्य न कोऽपि दाता, परो ददातीति कुबुद्धिरेषा।
कोउ न काहू सुख दुख कर दाता, निज कृत कर्म भोग सब भ्राता॥
महाराज परीक्षित ने धर्म के चार चरणों का रहस्य प्रकट किया:
तपः शौचं दया सत्यमिति पादाः कृते कृताः।
अधर्मांशैस्त्रयो भग्नाः स्मयसङ्गमदैस्तव।। (भा•1-17-24)
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सतयुग के चार चरण: तपस्या, पवित्रता (शौच), दया और सत्य।
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तीन चरणों का विनाश: अहंकार (स्मय) से तपस्या नष्ट हुई, आसक्ति (संग) से पवित्रता नष्ट हुई, और मद (गर्व) से दया का नाश हो गया।
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केवल चौथा चरण (सत्य) शेष है: कलियुग इसे भी झूठ से नष्ट करना चाहता है, किंतु परीक्षित ने धर्म को पुनः प्रतिष्ठित करने का संकल्प लिया।
🌸 कलियुग के ५ निवास स्थान (कलि-निग्रह) 🌸
जब राजा परीक्षित कलियुग का वध करने लगे, तो कलियुग हाथ जोड़कर उनके चरणों में गिर पड़ा।
“शरणागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमान।
ते नर पावत पाप भय तिनहिं बिलोकत हानि॥”
शरणागत-रक्षक परीक्षित ने उसका वध न करके अपने राज्य से बाहर निकल जाने का आदेश दिया। कलियुग बोला— “महाराज! संपूर्ण पृथ्वी पर आपका ही साम्राज्य है, मैं कहाँ जाऊँ? मुझे रहने के लिए स्थान दीजिए।”
तब महाराज परीक्षित ने कलियुग को रहने के लिए चार स्थान प्रदान किए:
द्यूतं पानं स्त्रियः सूना यत्राधर्मश्चतुर्विधः।
पुनश्च याचमानाय जातरूपमदात्प्रभुः।
ततोऽनृतं मदं कामं रजो वैरंच पञ्चमम्।। (भा•1-17-39)
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द्यूत (जुआ/सट्टा): जहाँ झूठ (असत्य) का वास होता है।
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पान (मदिरापान/नशा): जहाँ मद और विवेकहीनता का वास होता है।
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स्त्री (व्यभिचार/परस्त्री गमन): जहाँ काम वासना का वास होता है।
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सूना (हिंसा/पशु-हत्या/मांस भक्षण): जहाँ निर्दयता और रजो-तमोगुण का वास होता है।
जब कलियुग ने प्रार्थना की कि “महाराज! ये चारों स्थान धर्मनिष्ठ राज्य में दुर्लभ हैं, मुझे कोई एक मुख्य स्थान और दें”, तब सम्राट परीक्षित ने उसे पाँचवाँ स्थान: जातरूप (अधर्मपूर्वक अर्जित स्वर्ण/धन) प्रदान किया।
स्वर्ण का रहस्य:
अधर्म, अनीति, छल और चोरी से कमाए गए स्वर्ण (धन) में कलियुग का वास होता है (जहाँ असत्य, मद, काम, हिंसा और आपस में वैर-शत्रुता होती है)। किंतु जो स्वर्ण धर्मपूर्वक मेहनत से कमाया गया हो और प्रभु चरणों में समर्पित हो, वहाँ स्वयं नारायण विराजते हैं (“धातूनामस्मि काञ्चनम्”)।
इस पाँचवें स्थान को पाते ही कलियुग मुस्कुराया और उसने सूक्ष्म रूप से अपना प्रभाव फैलाना प्रारंभ कर दिया।
[क्रमशः… अगले भाग (Part 22) में हम शमीक ऋषि के आश्रम में परीक्षित का गमन, गले में मृत सर्प डालना, शृंगी ऋषि का भयंकर शाप, राजा परीक्षित का शुकताल तट गमन एवं श्रीशुकदेव जी महाराज के दिव्य प्राकट्य का प्रसंग सुनेंगे।]
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हे कथा रसिकों! श्रीमद्भागवत का यह दिव्य प्रसंग सिखाता है कि अनधर्मपूर्वक अर्जित धन मनुष्य की मति भ्रष्ट कर देता है और उसमें कलियुग का वास हो जाता है। यदि आप भी व्यास पीठ से प्रामाणिक कथा वाचन की शैली सीखना चाहते हैं, श्लोकों व पदों की व्याख्या तथा ‘हस्तलिखित कथा नोट्स’ (Katha Notes) प्राप्त करना चाहते हैं, तो ‘श्री राम देशिक प्रशिक्षण संस्थान’ आपके उज्ज्वल भविष्य के लिए सदैव तत्पर है।
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🚩 व्यास पीठ एवं कथा वाचन प्रशिक्षण (Katha Training)
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🚩 श्रीमद्भागवत महापुराण के सरल, प्रामाणिक एवं क्रमबद्ध नोट्स
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॥ जय श्री राधे! जय श्री कृष्ण! ॥
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