bhagwat puran mahatmya most famous shloka
सच्चिदानन्दरूपाय विश्वोत्पत्यादि हेतवे।
तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वयं नुमः।।
मा•1-1
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यं प्रव्रजन्तमनुपेतमपेतकृत्यं द्वैपायनो विरहकातर आजुहाव।
पुत्रेति तन्मयतया तरवोऽभिनेदुस्तं सर्वभूतह्रदयं मुनिमानतोऽस्मि।।
मा•1-2
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नैमिषे सूतमासीनमभिवाद्य महामतिम्।
कथामृतरसास्वादकुशलः शौनकोऽब्रवीत्।।
मा•1-3
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तीरथ परम नैमिष विख्याता | अति पुनीत साधक सिद्धिदाता ||
कालव्यालमुखग्रासत्रासनिर्णाशहेतवे।
श्रीमद्भागवतं शास्त्रं कलौ कीरेण भाषितम्।।
मा•1-11
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जन्मान्तरे भवेत्पुण्यं तदा भागवतं लभेत्।
क्व सुधा क्व कथा लोके क्व काचः क्व मणिर्महान्।
ब्रह्मरातो विचार्यैवं तदा देवाञ्जहास ह।।
मा•1-16
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श्रीमद्भागवती वार्ता सुराणामपि दुर्लभा।
मेनिरे भगवद्रूपं शास्त्रं भागवतं कलौ।
पठनाच्छृवणात्सद्यो वैकुण्ठफलदायकम्।।
मा•1-20
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कथं ब्रह्मन्दीनमुखः कुतश्चिन्तातुरो भवान्।
त्वरितं गम्यते कुत्र कुतश्चागमनं तव।।
मा•1-26
अहं तु प्रथवीं यातो ज्ञात्वा सर्वोत्तमामिति।
पाखण्डनिरताः सन्तो विरक्ताः सपरिग्रहाः।
तपसि धनवंत दरिद्र गृही | कलि कौतुक तात न जात कही ||
भो भो साधो क्षणं तिष्ठ मच्चिन्तामपि नाशय।
अहं भक्तिरिति ख्याता इमौ मे तनयौ मतौ।
ज्ञानवैराग्यनामानौ कालयोगेन जर्जरौ।।
मा•1-45
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उत्पन्ना द्रविणे साहं वृद्धिं कर्णाटके गता।
क्वचित्क्वचिन्महाराष्ट्रे गुर्जरे जीर्णतां गता।।
मा•1-48
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वृन्दावनं पुनः प्राप्य नवीनेव सुरूपिणी।
वृन्दावनस्य संयोगात्पुनस्त्वं तरुणी नवा।
धन्यं वृन्दावनं तेन भक्तिर्नृत्यति यत्र च।।
मा•1-61
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यत्फलं नास्ति तपसा न योगेन समाधिना।
तत्फलं लभते सम्यक्कलौ केशवकीर्तनात्।।
मा•1-68
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अयं तु युगधर्मो हि वर्तते कस्य दूषणम्।
जयति जगति मायां यस्य कायाधवस्ते
वचन रचनमेकं केवलं चाकलय्य।
ध्रुवपदमपि यातो यत्कृपातो ध्रुवोऽयं
सकलकुशलपात्रं ब्रह्मपुत्रं नतास्मि।।
मा•1-80
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उद्यमः सफलस्तेऽयं भविष्यति न संशयः।
तपबल रचे प्रपंच विधाता तपबल विश्व सकल जग त्राता |
तपबल रुद्र करे संघारा तपबल शेष धरे महि भारा ||
श्रीमद्भागवतालापः स तु गीतः शुकादिभिः।
वेदोपनिषदां साराज्जाता भागवती कथा।
गंगाद्वार समीपे तू तटमानन्दनामकम्।
तत्रैव गगां यमुना त्रिवेणी गोदावरी सिन्धु सरस्वती च।
वसन्ति सर्वाणि तीर्थानि तत्र यत्राच्युतो दार कथा प्रसंगः।।
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सदा सेव्या सदा सेव्या श्रीमद्भागवती कथा।
यस्याः श्रवणमात्रेण हरिश्चित्तं समाश्रयेत्।।
मा•3-25
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किं श्रुतैर्बहुभिः शास्त्रैः पुराणैश्च भ्रमावहैः।
एकं भागवतं शास्त्रं मुक्तिदानेन गर्जति।।
मा•3-28
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आजन्ममात्रमपि येन शठेन किंचि
च्चित्तं विधाय शुकशास्त्र कथा न पीता।
चाण्डालवच्च खरवद् बत तेन नीतं
मिथ्या स्वजन्म जननीजनिदुःखभाजा।।
मा•3-42
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भक्तिः सुतौ तौ तरूणौ गृहीत्वा प्रेमैकरूपा सहसाऽविरासीत्।
श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे नाथेति नामानि मुहुर्वदन्ति।।
मा•3-67
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सकलभुवनमध्ये निर्धनास्तेपि धन्या
निवसति ह्रदि येषां श्रीहरेर्भक्तिरेका।
हरिरपि निजलोकं सर्वथातो विहाय
प्रविशति ह्रदि तेषां भक्तिसूत्रोपनद्धः।।
मा•3-73
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के के विशुध्दयन्ति वदन्तु मह्यं।
ये मानवाः पापकृतस्तु सर्वदा सदा दुराचाररता विमार्गगाः।
क्रोधाग्निदग्धाः कुटिलाश्च कामिनः सप्ताहयज्ञेन कलौ पुनन्ति ते।।
मा•4-11
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धुन्धुम अज्ञानं कलहं लाति या सा धुन्धली।
सप्तजन्मावधि तव पुत्रो नैव च नैव च।
गृहस्थः सरसो लोके पुत्रपौत्र समन्वितः।
धुन्धुम कलहं क्लेश करोति कारयति यः सः धुन्धकारी।
गोकर्णः पण्डितो ज्ञानी धुन्धकारी महाखलः।
न चेन्द्रस्य सुखं किंचिन्न सुखं चक्रवर्तिनः।
सुखमस्ति विरक्तस्य मुनेरेकान्तजीविनः।।
मा•4-75
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दीन कहे धनवान सुखी धनवान कहे सुख राजा को भारी
राजा कहे महाराजा सुखी महाराजा कहे सुख इंद्र को भारी |
इंद्र कहे चतुरानन सुखी है चतुरानन कहे सुख शिव को भारी
तुलसी जी जान बिचारी कहे हरि भजन बिना सब जीव दुखारी ||
कोई तन दुखी कोई मन दुखी कोई धन बिन रहत उदास |
थोड़े थोड़े सब दुखी सुखी राम के दास ||
देहेस्थिमांसरूधिरेऽभिमतिं त्यज त्वं
जायासुतादिषु सदा ममतां विमुञ्च।
पश्यानिशं जगदिदं क्षणभङ्गनिष्ठं
वैराग्यरागरसिको भव भक्तिनिष्ठः।।
मा•4-79
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धर्मं भजस्व सततं त्यज लोकधर्मान्
सेवस्व साधुपुरुषाञ्जहि कामतृष्णाम्।
अन्यस्य दोषगुणचिन्तनमाशु मुक्त्वा
सेवाकथारसमहो नितरां पिब त्वम्।।
मा•4-80
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भोगेरोभयं कुले च्युति भयं वित्ते नृपालाद भयं
मौने दैन्य भयं बलेरिपु भयं रूपे जराया भयं |
शास्त्रे वाद भयं गुणे खलभयं काये कृतान्ताद् भयं
सर्वं वस्तु भयावहम् भुविनृणां वैराग्यमेवा भयं ||
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सुधामयं वचो यासां कामिनां रसवर्धनम्।
ह्रदयं क्षुरधाराभं प्रियः को नाम योषिताम्।।
मा•5-15
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अहं भ्राता त्वदीयोऽस्मि धुन्धुकारीति नामतः।
स्वकीयेनैव दोषेण ब्रह्मत्वं नाशितं मया।।
मा•5-27
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अहो बन्धो कृपासिन्धो भ्रातर्मामाशु मोचय।
तुभ्यं नमो जगत्साक्षिन् ब्रूहि मे मुक्तिहेतुकम्।
श्रीमद्भागवतान्मुक्तिः सप्ताहं वाचनं कुरू।
एवं सप्तदिनैश्चैव सप्तगृन्थिविभेदनम्।
धन्या भागवती वार्ता प्रेतपीडाविनाशिनी।
सप्ताहोऽपि तथा धन्यः कृष्णलोकफलप्रदः।।
मा•5-53
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बुद् बुदा इव तोयेषु मशका इव जन्तुषु।
जायन्ते मरणायैव कथाश्रवणवर्जिताः।।
मा•5-63
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पानी केरा बुदबुदा अस मानुस की जात |
देखत ही छिप जाएगा ज्यों तारा प्रभात ||
अत्रैव बहवः सन्ति श्रोतारो मम निर्मलाः।
आनीतानि विमानानि न तेषां युगपत्कुतः।।
मा•5-69
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श्रवणस्य विभेदेन फलभेदोऽत्र संस्थितः।
श्रवणं तु कृतं सर्वैर्न तथा मननं कृतम्।।
मा•5-71
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अयोध्यावासिनः पूर्वं यथा रामेण संगताः।
तथा कृष्णेन ते नीता गोलोकं योगिदुर्लभम्।।
मा•5-85
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दैवज्ञं तु समाहूय मुहूर्तं प्रच्छय यत्नतः।
विवाहे यादृशं वित्तं तादृशं परिकल्पयेत्।।
मा•6-2
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विरक्तो वैष्णवो विप्रो वेदशास्त्रविशुद्धिकृत्।
दृष्टान्तकुशलो धीरो वक्ता कार्योऽतिनिःस्पृहः।।
मा•6-20
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भोजनं तु वरं मन्ये कथाश्रवणकारकम्।
नोपवासो वरः प्रोक्तःकथाविघ्नकरो यदि।।
मा•6-43
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