bhagwat puran ki katha श्रीमद्भागवत सप्ताहिक कथा
श्रीमद्भागवत सप्ताहिक कथा 335 अध्यायों का संक्षिप्त विवरण मात्र 15 पार्ट में पढ़ें।
पार्ट-11
[ अथ पंचदशोऽध्यायः ]
धेनुकासुर का उद्धार और ग्वालों को काली विष से बचानाश्रीशुकदेवजी वर्णन करते हैं परीक्षित् ! जब भगवानने पोण्ड्रक अवस्था छठे वर्ष में प्रवेश किया तो उन्हे गायें चराने की अनुमति मिल गई वे ग्वालबालों के साथ गाये चराने लगे एक दिन वे गायें चराते हुए ताल वन में पहुँच गए वहां बड़े-बड़े ताल के वृक्ष थे और भी अनेक फलों के वृक्ष थे जो फलों से लद हुए थे वहां एक धेनुकासुर नाम का दैत्य रहता था जिसके भय से वहां कोई नही जाता था उन्होंने फल खाने के लिए पेडों को हिलाया तो बहुत से फल नीचे गिर गए सब लोग खूब फल खाने लगे जब दैत्य को पता चला वह क्रोधित हो वहां आया वह गधे के रूप में रहता था अत: अपनी दुलत्ती चलाने लगा बल रामजी ने उसके पिछले दोनो पैर पकड़ एक पेड से दे मारा वह गिरते ही समाप्त हो गया उसके गिरने से बहुत से पेड गिर गए सब ने खूब फल खाए और उसके पश्चात् वे सब यमुना किनारे आ गए सबने यमुनाजी का जल पिया और वे सब जल पीते ही बेहोश होकर समाप्त हो गए यहां काली सर्प के रहने से जल विषैला हो गया था भगवान ने अपनी कपा दृष्टि से सबको जीवित कर लिया जिसका किसी को भान ही नही हुआ।
इति पंचदशोऽध्याय:

[ अथ षोडषोऽध्यायः ]
कालिय पर कृपा—
विलोक्य दूषितां कृष्णां कृष्णः कृष्णहिना विभुः
तस्या विशुद्धि मनविच्छन् सर्प तमुदवासयत्
श्रीशुकदेवजी कहते हैं परीक्षित्! जब भगवान ने देखाकि काली के निवास से यमुनाजी का जल विषैला हो गया है उसे वहां से हटा यमुना को शुद्ध करने का विचार किया और ग्वालबालों के सहित गाये चराते हए वहां गए जहां काली रहता था। कालीदह पै खेलन आयो री मेरो बारो सो कन्हैया काहेकी पट गेंद बनाइ काहे को डण्डा लायोरी -मेरो फूलन की पट गेंद बनाइ चन्दन का डंडा लायोरीउछलत गेंद गइ जल माही वातो गेंद के संग सिधायो नाग नाथ कर बाहर आयो फनफन निरत करायोरी पुरुषोत्तम प्रभु की छवि निरखे चरण कमल चितलायो और वहाँ गेद का खेल खेलने लगे भगवान ने एक ही बार मे गेंद को कालीदह में चला दिया और ग्वालबालों से कहा आप चिन्ता न करें मैं अभी गेंद लेकर आ हूं और काली दह में कूद गए ग्वालों मे हाहा कार मच गया नन्द यशोदा तक सूचना पहुँच गई वे रोते विलखते काली दह पर पहुँचे बलरामजी ने सबको धैर्य बंधाया और समझाया कि कन्हैया को कुछ नही होगा वह अभी आ जायेगा वे कन्हैया की महिमा जानते थे उधर कन्हैया ने काली दह में जाकर काली को ललकारा काली सो रहा था नागिनो ने कहा बालक तुम चले जावो तुम्हे देख हमे दया आ रही है यह काली भयंकर है तुम्हे छोडेगा नही भगवान बोले नागिन तुम अपने काली को जगाओ इतने मे काली जग गया और मारे क्रोध के फुफकारने लगा भगवान उछल कर उसके फनों पर चढ गए और नृत्य करने लगे रक्त वमन करने लगा और अन्त मे वह भगवान की शरण हो गया भगवान बोले काली अब तुम्हे यहां नही रहना है। तुम गरुड के भय से यहां रहते हो अब मेरे चरणों के चिह्न तुम्हारे मस्तक पर हैं तुम्हे गरुड़ कुछ नही कहेगा तुम अपने लोक को चले जावो भगवान को प्रणाम कर काली वहां से अपने लोक को चला गया।
इति षोडषोऽध्यायः
[ अथ सप्तदशोऽध्यायः ]
काली की काली दह मे आने की कथा तथा बृजवासियों को दावानल से बचाना-श्रीशुकदेवजीबोले परीक्षित्! पूर्व काल मे गरुडजी को उपहार स्वरूप प्राप्त होने वाले सर्पो ने यह नियम कर लिया था कि प्रत्येक मास मे निर्दिष्ट वृक्ष के नीचे गरुड को एक सर्प की भेंट दी जाय इस नियम के अनुसार अब की बार काली का नम्बर था काली निर्दिष्ट स्थान पर न पहुँचकर यमुना में उस जगह जा छुपा जहां गरुड सौभरी ऋषि के शाप के कारण नही जा सकता था। कली को यमुना से बाहर कर भगवान स्वयं बाहर आ गए जैसे सब के प्राण लौट आए हों यशोदा ने कन्हैया को छाती से लगा लिया उस दिन आधी रात हो जाने से वे सब घर न जाकर वहीं सो गए रात्री में वन में दावानल लग गइ सब ब्रजवासी घबरा गए और वे भगवान की शरण हो गए भगवान उस अग्नि को पी गए।
इति सप्तदशोऽध्यायः
[ अथ अष्टादशोऽध्यायः ]
प्रलमबासुर उद्धार-श्रीशुकदेवजी वर्णन करते है कि परीक्षित काली का उद्वार कर भगवान बृज में आ गए ओर अनेक लीला करने लगे। एक दिन वन में गाएं चराते समय एक प्रलम्बासुर नामक राक्षस ग्वाल वेष में ग्वालों में आकर मिल गया वह कृष्ण बलराम का हरण करना चाहता था सब ग्वालबाल दो दलों में विभक्त होकर एक दल दूसरे दल को पीठ पर ढोता था ऐसा खेल खेलने लगे प्रलम्बासुर ने बल राम जी को अपनी पीठ पर चढ़ा लिया और उसे लेकर दूर निकल गया बलरामजी समझ गए यह कोई दैत्य है उन्होंने अपना वजन इतना बढाया कि वह झेल नहीं सका उसने अपना असली रूप प्रकट कर दिया बलरामजी ने एक ही घूसे मे उसके प्राण हर लिए।
इति अष्टादशोऽध्यायः
[ अथ एकोनविंशोऽध्यायः ]
गौओं और गोपों को दावानल से बचाना-श्रीशुकदेवजी वर्णन करते है कि परीक्षित्! एक दिन भगवान कृष्ण बलराम वन में गायें चराते हए खेल खेलने लगे तो उनकी गाऐ चरती हुई बहुत दूर निकल गई वे रास्ता भूल कर मन्जाटवी वन में चली गई गायें न देख भगवान बड़े चिन्तित हए और उन्हे खोजते हुए आगे बढ़े और देखाकि बहुत दूर गायों के रंभाने की आवाज आ रही है भगवान ने गायों को आवाज लगाई तोवे रंभाने लगी भगवान ग्वालबालों के साथ वहां पहुंच गए और गायों को लेकर लौट रहे थे तभी दावानल ने उन्हें चारों और से घेर लिया सब घबरा गए तब भगवान ने कहा डरो मत सब अपने नेत्र बन्द कर लो सबने नेत्र बन्द कर लिए और भगवान उस समस्त अग्नि को पी गए।
इति एकोनविंशोऽध्यायः
[ अथ विंशोऽध्यायः ]
वर्षा और शरदऋतु का वर्णन-श्रीशुकदेवजी वर्णन करते हैं परीक्षित्! इसके बाद वर्षा ऋतु आ गई सर्वत्र हरियाली छा गई किसानों ने प्रसन्न होकर कृषि कार्य प्रारंभ कर दिए। वर्षा के बाद शरद ऋतु आ गई किसानों की फसलें घर में आ गई सब प्रसन्न हो गए।
इति विंशोऽध्यायः
[ अथ एकविंशोऽध्यायः ]
वेणुगीत-श्रीशुकदेवजी वर्णन करते हैं परीक्षित् वृन्दावन में बृजगोपियां भगवान की लीलाओं को देख-देख भाव विभोर हुई रहती हैं वे सब पागल सी होकर हमेशा भगवान के दर्शनों की अभिलाषा के गीत गाती रहती हैं।
अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः
सख्यं पशुननु विवेशयतोर्वयस्यैः
वक्त्रं ब्रजेशसुतयोरनु वेणु जुष्टं
यैर्वा निपीत मनुरक्त कटाक्ष मोक्ष
गोपियाँ आपस मे बात करती हैं-अरी सखी हमने तो आंखवालों के जीवन की और उनकी आंखों की बस यही इतनी ही सफलता समझी है और तो हमे कुछ मालुम ही नही है वह कौनसा लाभ है वह यही है कि श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण और गोर सुन्दर बलराम ग्वालबालों के साथ गायों को हांक कर ले जा रहे हो अथवा लोटाकर बृज में ला रहे हों उन्होने अपने अधरों पर मुरली रखी हो और प्रेम भरी तिरछी चितवन से हमारी ओर देख रहे हों उस समय उनकी मुखमाधुरी का पान करती रहें। इस प्रकार भगवान के प्रति अपनी अनेक भावनाओं को गोपियों ने जो व्यक्त किया है उसे ही वेणुगीत नाम दिया हैं।
इति एकविंशोऽध्याय:

[ अथ द्वाविंशोअध्यायः ]
चीरहरण–
हेमन्ते प्रथमे मसि नन्दब्रज कुमारिकाः।
चेहविष्यं भुन्जाना: कात्यायन्यर्चन व्रतम्।।
श्रीशुकदेवजी वर्णन करते है परीक्षित् मार्गशीर्ष मास के प्रारंभ होते ही ब्रजकी कुमारियां कात्यायनी देवी का ब्रत और पूजा करने लगी वे उषाकाल में यमुना जाकर स्नान करती तटपर बालू की कात्यायनी की मूर्ति बनाती उसकी पूजा करती और कहती
कात्यायनि महामाये महायोगिन्य धीश्वरि।
नन्दगोपसुतं देवि पति मे कुरुते नमः।।
हे कात्यायनी हे महा माये भगवान श्रीकृष्ण हमें पति रूप में प्राप्त हों प्रतिदिन की भांति एक दिन उन्होंने अपने वस्त्र उतार यमुना में प्रवेश किया उनकी अभिलाषा पूर्ण करने भगवान आए और उनके वस्त्र लेकर कदम पर जा बैठे स्नान के बाद जब उन्हें अपने वस्त्र नहीं मिले तो घबरा गई देखाकि वस्त्र लेकर तो कन्हैया कदम पर बैठा है उन्होने भगवान की प्रार्थना की”’
पद
नन्दजी के लाला चीर हमारो मोहन दीजिए
एक समय ब्रजगोप बालिका मन में कियो विचार
कात्यायनि पूजा की ठानी यमुना कियो विहार -नन्द
वस्त्र खोल तीर पर धर दिए आप गइ जल मांय
काना वस्त्र उठाले टांगे पेड कदम पर जाय – नन्द
पतोचल्यो जब डरी गोपिका विनय करे कर जोर
चीर हमारो देदो मोहन हम दासी हैं तोर – नन्द –
दासी होतो बात मान लो जल से बाहर आवो
हाथ जोड़ कर अपने अपने वस्त्र आप लेजावो-नन्द
जल से बाहर कैसे आवें आप पुरुष हम नारी
वस्त्र हीन जो बाहर आ जावे लाज हमारी-नन्द
हमकोही चाहो हमसे परदा कैसी बुद्धि तिहारी
भेद बुद्धि से तो तुम हमको कबहुन पावो प्यारी-नन्द
हाथ जोडकर बाहर आइ करी कृपा गिरधारी
वस्त्र दिए सब धारण कीने मन प्रसन्न अतिभारी-नन्द
शरद पूनम पर आना प्यारी रास रचेगे भारी
दास भागवत शरण आपकी महिमा जगसे न्यारी-नन्द
चीरहरण लीला बड़ी महत्त्वपूर्ण है यह जीवात्मा और परमात्मा के बीच के परदे को हटाने वाली है स्त्री-पुरुष का भेद शरीर से है आत्मा का कोई लिंग नहीं होता आत्मा नस्त्री लिंग है न पुल्लिंग अपने को शरीर मानना ही भगवान से मिलने में वाधक है।
bhagwat puran ki katha
दशम स्कंध कि कथा

[ अथ त्रयोविंशोऽध्यायः ]
यज्ञपत्नियों पर कृपा-श्रीशुकदेवजी वर्णन करते है एक बार सभी ग्वाल बालों को बडी जोर से भूख लगी वे भगवान से बोले कन्हैया जोर की भूख लगी है तब भगवान उनसे बोले यहां से थोडी दूर पर वेदवादी ब्राहमण आंगि रस नामक यज्ञ कर रहे हैं आप उनके पास जाकर भोजन ले आवो ग्वाल बाल गए और उनसे भोजन की याचना की किंतु उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया फिर भगवान ने उन्हे ब्राह्मण पत्नियों के पास भेजा भगवान का नाम सुनते ही वे दौड़ पडी हाथों में भोजन के थाल ले लेकर भगवान के पास पहुँची बड़े प्रेम से भगवान को जिमाया और कृतकृत्य हो गई,,
इति त्रयोविंशोऽध्यायः
[ अथ चतुर्विंशोऽध्यायः ]
इन्द्र यज्ञ निवारण-श्रीशुकदेवजी वर्णन करते हैं एक दिन सब बृजवासी गोवर्धन पूजा की तैयारी कर रहे थे तभी भगवान ने नन्दादि गोपों से पूछा आप ये सब काहे की तैयारी कर रहे हैं जब वे लोग बोले कन्हैया हम प्रति वर्ष वर्षा करने वाले देवता इन्द्र की पूजा किया करते है इसकी तैयारी हम कर रहे हैं भगवान बोले बाबा गरमी में जल वाष्प बन कर उड़ता है वहीं वर्षा होती है फिर हम बृज वासियों का तो इन्द्र गोवर्धन है इसी की पूजा होनी चाहिए सब बृजवासी इससे सहमत हो । गए और जो सामग्री इन्द्र के लिए बनाई थी उससे गोवर्धन की पूजा की।
इति चतुर्विंशोऽध्यायः
[ अथ पञ्चविंशोऽध्यायः ]
गोवर्धन धारण-श्रीशुकदेवजी कहते हैं जब इन्द्र की पूजा मेट कर गोवर्धन की पूजा की गई है ऐसा ज्ञान जब इन्द्र को हुआ तो वह बड़ा क्रोधित हुआ ओर बज पर भयंकर वर्षा प्रारंभ कर दी बृज डूबने लगा तब घबरा कर बृजवासी भगवान की शरण आये भगवान ने गोवर्धन पर्वत को उठाकर सब बृज को उसके नीचे ले लिया चारों ओर शेषजी घेरा डाल कर बैठ गए न बाहर का पानी आया न ऊपर का सात दिन तक मूसला धार वर्षा होती रही फिर भी बृज को सुरक्षित देख इन्द्र घबराया वह भगवान की शरण आ गया उनकी पूजा कर उनसे क्षमा याचना की।
इति पञ्चविंशोऽध्यायः
[ अथ षड्विंशोऽध्यायः ]
नन्दबाबा से गोपों की कृष्ण के प्रभाव के विषय में बातश्रीशुकदेवजी वर्णन करते हैं भगवान श्री कृष्ण के ऐसे अद्भुत चरित्र देख बजवासी नन्दबाबा से कहने लगे बाबा आपका यह बालक साधारण नहीं है देखो इसने पूतना को मारा शकटासुर तृणावर्त को पछाडा उखल से दोनो वृक्षों को उखाड़ दिया बकासुर, अघासुर को समाप्त किया और अभी विशाल गोवर्धन उठा लिया इस पर नन्दबाबा बोले तुम्हे एक बात बताउं गर्गाचार्य ने कहा था कि यह साक्षात् परमात्मा का अवतार है।
इति षड्विंशोऽध्यायः
[ अथ सप्तविंशोऽध्यायः ]
श्रीकृष्ण का अभिषेक-श्रीशुकदेवजी वर्णन करते हैं इन्द्र भगवान के ऐश्वर्य को समझ स्वर्ग से काम धेनु को लेकर आया और काम धेनु ने भगवान का अभिषेक किया इन्द्र भगवान की प्रार्थना करने लगा प्रभो हम जैसे तुच्छ लोग आप को पहिचान नहीं सकते आप की महिमा अपार है मैं अहन्कार में चूर था आपने मुझे शिक्षा दी मैं धन्य हो गया। भगवान बोले इन्द्र तुम मुझे भूल गए थे अब मुझे कभी नहीं भूलना।
इति सप्तविंशोऽध्यायः
[ अथ अष्टाविंशोऽध्यायः ]
वरुण लोकसे नन्दजी को छुडाकर लाना-श्रीशुकदेवजी वर्णन करते है एक दिन नन्दबाबा ने निराहार एकादशी व्रत किया द्वादशी को प्रात: पूर्व ही यमुना स्नान को चलेगए तो वरुण के दूत उन्हे पकड़ कर ले गए यह वात जब भगवान को मालूम हई वे वरुण लोक पहँच गए वहां वरुणजी ने भगवान की पूजा की और बोले मुझे आपके दर्शनों की अभिलाषा थी इस लिए मेरे दूत बाबा को लेकर यहां आ गए जिसके लिए आप क्षमा करें वरुण का भाव देख भगवान वरुण जी कृतार्थ कर बाबा को लेकर बृज मे आ गए।
इति अष्टाविंशतिऽध्यायः

[ अथ एकोनत्रिंशोऽध्यायः ]
रासलीला का प्रारम्भ—
भगवानपि तारात्री: शरदोत्फुल्ल मल्लिकाः
वीक्ष्य रन्तुं मनश्चक्रे योगमाया मुपाश्रितः
ततोडुराजः ककुभ: करैमुखं
प्राच्या विलिम्पन्नरुणेन शन्तमै
स चर्षणीना मुदगाच्छुचो मृजन
प्रिय: प्रियाया इवदीर्घ दर्शन:
श्रीशुकदेवजी वर्णन करते है कि भगवान ने उस रात्रि में चारों ओर पुष्प खिला दिए वृन्दावन महक उठा अब उन्होंने रास का मन बनाया और अपनी प्रिय गोपियों को बुलाने के लिए बंशी बजाई। भगवान का वंशी वादन सुन कर बृज गोपी जल्दी में लहगा ओढ लिया ओढनी को पहन ली कान में नथ पहन ली नाक में झुमकी डालली उल्टे सीधे भंगार कर भगवान के पास पहुच गई। भगवान बोले गोपियों आपका स्वागत कहिए आपका क्या प्रिय करु कैसे आपका पधारना हआ। तम्हे अपने पतियों को छोड़कर पर पुरुष के पास नहीं आना चाहिए यह सन गोपियां हत प्रभ रह गई देखो भगवान ने एक-एक को वंशी में नाम लेकर बलाया और अब पूछ रहे हैं कैसे आई वे बोली संसार के विषय सुखों को छोड़ हम आपके चरणों की शरण आई है।
उन्होंने कहा हमें अपने पतियों को छोड़ कर नही आना चहिए प्रभो हम आपको एक कहानी सुनाती हैं एक पतिव्रता स्त्री थी वह नित्य अपने पति की पूजा कर उसे भोजन कराकर फिर स्वयं भोजन करती थी एक दिन पति को कहीं बाहर जाना था वह अपने पति से बोली आप कुछ दिनों के लिए बाहर जा रहे हैं ऐसे में मैं आपकी पूजा किए बिना भोजन कैसे करूँगी पति ने कहा हम भगवान की पूजा मूर्ति में कर लेते हैं तुम भी मेरी एक मूर्ति बना लो उसकी पूजा कर भोजन कर लेना स्त्री ने ऐसा ही किया मिट्टी की पति की मूर्ति बना वह पूजा करने लगी एक दिन जब वह पूजा कर रही थी उसका पति आ गया और उसने दरवाजा खट खटाया अब वह पूजा छोड़ दरवाजा खोलने जाती है तो पति पूजा खण्डित होती हैं और नहीं जाती है तो पति आज्ञा भंग होती है।
गोविन्द आप बताएं उसे क्या करना चहिए भगवान बोले जब उसका साक्षात् पति आ गया तो उसे पहले दरवाजा खोलना चहिए। गोपियां बोली ठीक है हम भी आप से यही सुनना चाहती थी हम जिन पतियों को छोड कर आई हैं वे सब मिट्टी के पति हैं आप साक्षात् पति हैं उनका संबंध जब तक शरीर है तब तक है लेकिन आत्मा परमात्मा का संबंध जन्म जन्मान्तर का है। भगवान बोले गोपियों मैं तो तुम्हारी परीक्षा ले रहा था। अब तुम्हारे साथ रास करूंगा सब गोपियां गोलाकार खड़ी हो गई बीच में राधागोविन्द नृत्य करने लगे अनेक हाव-भाव दिखाने लगे करते-करते गोपियों के मन में अहंकार आ गया हम कितनी भाग्यशाली हैं परमात्मा हमारे इशारे पर नाच रहा है इतने में भगवान अन्तर ध्यान हो गए गोपियां बिलख उठी रोने लगी।
इति एकोनत्रिशोऽध्यायः
[ अथ त्रिंशोऽध्यायः ]
श्रीकृष्ण के विरह मे गोपियों की दशा-लता वृक्षों से पूछती हुई ढूढ़ने लगी चरण चिह्नों से पता चला कि राधा महारानी उनके साथ है गोपियां कृष्ण लीला करने लगी एक गोपी पूतना बन गई दूसरी कृष्ण ने पूतना को मार दिया ऐसे लीला करने लगी उधर भगवान राधा महारानी के साथ विहार करते करते राधाजी मानवती हो गई कहने लगी प्रभो अब मुझसे नहीं चला जाता मुझे कंधे पर चढा लें। भगवान बोले ठीक है कहकर वहां से भी अन्तरध्यान हो गए वह सखी भी मूर्च्छित होकर गिर गई जब अन्य गोपियां भगवान को ढूंढती हुई वहां पहुंची तो वहां राधा महारानी भी बेसुध पड़ी है वे समझ गई कि इनके साथ भी वही हुआ है जो हमारे साथ हुआ है।
इति त्रिंशोऽध्यायः

[ अथ एकत्रिंशोऽध्यायः ]
गोपिका गीत—-
दर्शन देवो रास बिहारी प्रभु ढूढ़ रही गोपी सारी
महिमा अधिक बनी बृज की बैकुण्ठ हु ते बनवारी
सुन्दरता मृदुता की देवी लक्ष्मी रमत विहारी-दर्शन
तजि बैकुण्ठ वास बृज कीनो लक्ष्मी दासी तिहारी
नाथ गोपियां ढूढ़ रही है चरणाश्रित प्रभु थारी-दर्शन
प्रेम पूर्ण हिरदा के स्वामी बिनामोल की दासीतिहारी
कमल नयन सों घायल करना क्या वध नही मुरारी-दर्शन
काली दह जल अरु दावानल बृषभासुर व्योमासुर भारी
इन्द्रकोप से रक्षाकीनी बृज की आप असुरारी-दर्शन
यशोदा नन्दन मात्र नही हो जनजन के हितकारी
ब्रह्माजी की विनती सुनकर बृज प्रकटे गिरधारी-दर्शन
शरणागत भवबन्धन मेटत पूरण काम विहारी
हस्त कमल सिर उपर रखदो लक्ष्मीपति वनवारी-दर्शन
बीरशिरोमणि बृज जनरक्षक प्रेमीजन मदहारी
रूठोमत दर्शन दो स्वामी सुन्दरश्याम बिहारी-दर्शन
उरकी ज्वाला शान्त करो प्रभु रख दो चरण मुरारी
कालीफण पर नृत्य कियो जिन नाशक पाप विहारी-दर्शन
मधुर वाणी से मोहित करते ऋषिमुनि तनुधारी
अधरामृत कापान करादो जीवन देवो खरारी। दर्शन
पापताप की मेटनहारी लीला कथा तुम्हारी
ऋषिमुनि जन गान करत हैं लीलामंगलकारी। दर्शन
दर्शन परसन का सुखदीना इकदिन हे गिरधारी।
सुनलो कपटी मित्र आजवे दुखी विरह की मारी। दर्शन
कोमलचरण विचरणबन करते दुखीकरत मनभारी
धूषरधूरिमुख दर्शनदेदो विनती यहीहमारी। दर्शन
तप्त ह्रदय को शान्तकरो उररखदो चरणमुरारी
शरणागत के पूर्णकाम प्रभु जन के कष्टनिवारी। दर्शन
अधरामृत का पान करादो विरह मिटावन हारी
जिनकोनित पीवतबांसुरिया आसक्तिमिटावनहारी। दर्शन
पतिसुतभ्रात कुटुम्ब तजे हम तेरे हित बनवारी
निषाकाल में छोड़ गए विरहवन्त दुखी बृजनारी। दर्शन
हंसीठिठोली करते मोहन प्रेमभरी मुस्कान तिहारी
श्रीनिवास वक्षस्थल उपर सब गोपीजन वारी। दर्शन
दुख संताप मिटाने वाली प्रभु अभिव्यक्ति तुम्हारी
ह्रदयरोग को दूर करो दे दो औषधि बनवारी। दर्शन
स्तन कठोर है चरण कमल सम कोमल कुंजविहारी
कंकडपत्थर कैसे सहेगें मन अधीर गिरधारी। दर्शन
गाती रोती और विलखती गोपी करत पुकारी
दास भागवत दर्शन दीने गोपी भई सुखारी। दर्शन
इति एकत्रिंशोऽध्याय



