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श्रीमद् भागवत सप्ताह पूजन मन्त्र विधि shrimad bhagwat pujan vidhi

On: April 17, 2026 10:47 AM
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भागवत सप्ताह पूजन मन्त्र विधि shrimad bhagwat pujan vidhi

श्रीमद् भागवत सप्ताह पूजन मन्त्र विधि shrimad bhagwat pujan vidhi

यं प्रव्रजन्तमनुपेतमपेतकृत्यं
द्वैपायनो विरहकातर आजुहाव ।
पुत्रेति तन्मयतया तरवोऽभिनेदु-
स्तं सर्वभूतहृदयं मुनिमानतोऽस्मि ।।

(१।२।२)

जिस समय श्रीशुकदेवजीका यज्ञोपवीत-संस्कार भी नहीं हुआ था, सुतरां लौकिक-वैदिक कर्मोंके अनुष्ठानका अवसर भी नहीं आया था, उन्हें अकेले ही संन्यास लेनेके उद्देश्यसे जाते देखकर उनके पिता व्यासजी विरहसे कातर होकर पुकारने लगे- ‘बेटा! बेटा !’ उस समय तन्मय होनेके कारण श्रीशुकदेवजीकी ओरसे वृक्षोंने उत्तर दिया। ऐसे, सबके हृदयमें विराजमान श्रीशुकदेव मुनिको मैं नमस्कार करता हूँ।

यः स्वानुभावमखिलश्रुतिसारमेक-
मध्यात्मदीपमतितितीर्षतां तमोऽन्धम् ।
संसारिणां करुणयाऽऽह पुराणगुह्यं
तं व्याससूनुमुपयामि गुरुं मुनीनाम् ।।

(१।२।३)

यह श्रीम‌द्भागवत अत्यन्त गोपनीय रहस्यात्मक पुराण है। यह भगवत्स्वरूपका अनुभव करानेवाला और समस्त वेदोंका सार है। संसारमें फँसे हुए जो लोग इस घोर अज्ञानान्धकारसे पार जाना चाहते हैं, उनके लिये आध्यात्मिक तत्त्वोंको प्रकाशित करनेवाला यह एक अद्वितीय दीपक है। वास्तवमें उन्हींपर करुणा करके बड़े-बड़े मुनियोंके आचार्य श्रीशुकदेवजीने इसका वर्णन किया है। मैं उनकी शरण ग्रहण करता हूँ।

स्वसुखनिभृतचेतास्तद्व्युदस्तान्यभावो-
ऽप्यजितरुचिरलीलाकृष्टसारस्तदीयम् ।
व्यतनुत कृपया यस्तत्त्वदीपं पुराणं
तमखिलवृजिनघ्नं व्याससूनुं नतोऽस्मि ।।

(१२।१२।६८)

श्रीशुकदेवजी महाराज अपने आत्मानन्दमें ही निमग्न थे। इस अखण्ड अद्वैत स्थितिसे उनकी भेददृ‌ष्टि सर्वथा निवृत्त हो चुकी थी। फिर भी मुरलीमनोहर श्यामसुन्दरकी मधुमयी, मंगलमयी मनोहारिणी लीलाओंने उनकी वृत्तियोंको अपनी ओर आकर्षित कर लिया और उन्होंने जगत्के प्राणियोंपर कृपा करके भगवत्तत्त्वको प्रकाशित करनेवाले इस महापुराणका विस्तार किया। मैं उन्हीं सर्वपापहारी व्यासनन्दन भगवान् श्रीशुकदेवजीके चरणोंमें नमस्कार।

श्रीमद्भागवतकी महिमा मैं क्या लिखूँ? उसके आदिके तीन श्लोकोंमें जो महिमा कह दी गयी है, उसके बराबर कौन कह सकता है? उन तीनों श्लोकोंको कितनी ही बार पढ़ चुकनेपर भी जब उनका स्मरण होता है, मनमें अद्भुत भाव उदित होते हैं। कोई अनुवाद उन श्लोकोंकी गम्भीरता और मधुरताको पा नहीं सकता। उन तीनों श्लोकोंसे मनको निर्मल करके फिर इस प्रकार भगवान्‌का ध्यान कीजिये –

ध्यायतश्चरणाम्भोजं भावनिर्जितचेतसा ।
औत्कण्ठ्याश्रुकलाक्षस्य हृद्यासीन्मे शनैर्हरिः ।।
प्रेमातिभरनिर्भिन्नपुलकाङ्गोऽतिनिर्वृतः ।
आनन्दसम्प्लवे लीनो नापश्यमुभयं मुने ।।
रूपं भगवतो यत्तन्मनः कान्तं शुचापहम् ।
अपश्यन् सहसोत्तस्थे वैक्लव्याद् दुर्मना इव ।।

मुझको श्रीमद्भागवतमें अत्यन्त प्रेम है। मेरा विश्वास और अनुभव है कि इसके पढ़ने और सुननेसे मनुष्यको ईश्वरका सच्चा ज्ञान प्राप्त होता है और उनके चरणकमलोंमें अचल भक्ति होती है। इसके पढ़नेसे मनुष्यको दृढ़ निश्चय हो जाता है कि इस संसारको रचने और पालन करनेवाली कोई सर्वव्यापक शक्ति है-

एक अनन्त त्रिकाल सच, चेतन शक्ति दिखात ।
सिरजत, पालत, हरत, जग, महिमा बरनि न जात ।।

इसी एक शक्तिको लोग ईश्वर, ब्रह्म, परमात्मा इत्यादि अनेक नामोंसे पुकारते हैं। भागवतके पहले ही श्लोकमें वेदव्यासजीने ईश्वरके स्वरूपका वर्णन किया है कि जिससे इस संसारकी सृष्टि, पालन और संहार होते हैं, जो त्रिकालमें सत्य है- अर्थात् जो सदा रहा भी, है भी और रहेगा भी-और जो अपने प्रकाशसे अन्धकारको सदा दूर रखता है, उस परम सत्यका हम ध्यान करते हैं।

उसी स्थानमें श्रीमद्भागवतका स्वरूप भी इस प्रकारसे संक्षेपमें वर्णित है कि इस भागवतमें – जो दूसरोंकी बढ़ती देखकर डाह नहीं करते, ऐसे साधुजनोंका सब प्रकारके स्वार्थसे रहित परम धर्म और वह जाननेके योग्य ज्ञान वर्णित है जो वास्तवमें सब कल्याणका देनेवाला और आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक-इन तीनों प्रकारके तापोंको मिटानेवाला है।

और ग्रन्थोंसे क्या, जिन सुकृतियोंने पुण्यके कर्म कर रखे हैं और जो श्रद्धासे भागवतको पढ़ते या सुनते हैं, वे इसका सेवन करनेके समयसे ही अपनी भक्तिसे ईश्वरको अपने हृदयमें अविचलरूपसे स्थापित कर लेते हैं। ईश्वरका ज्ञान और उनमें भक्तिका परम साधन- ये दो पदार्थ जब किसी प्राणीको प्राप्त हो गये तो कौन-सा पदार्थ रह गया, जिसके लिये मनुष्य कामना करे और ये दोनों पदार्थ श्रीम‌द्भागवतसे पूरी मात्रामें प्राप्त होते हैं।

इसीलिये यह पवित्र ग्रन्थ मनुष्यमात्रका उपकारी है। जबतक मनुष्य भागवतको पढ़े नहीं और उसकी इसमें श्रद्धा न हो, तबतक वह समझ नहीं सकता कि ज्ञान-भक्ति-वैराग्यका यह कितना विशाल समुद्र है। भागवतके पढ़नेसे उसको यह विमल ज्ञान हो जाता है कि एक ही परमात्मा प्राणी-प्राणीमें बैठा हुआ है और जब उसको यह ज्ञान हो जाता है, तब वह अधर्म करनेका मन नहीं करता; क्योंकि दूसरोंको चोट पहुँचाना अपनेको चोट पहुँचानेके समान हो जाता है।

इसका ज्ञान होनेसे मनुष्य सत्य धर्ममें स्थिर हो जाता है, स्वभावहीसे दया-धर्मका पालन करने लगता है और किसी अहिंसक प्राणीके ऊपर वार करनेकी इच्छा नहीं करता। मनुष्योंमें परस्पर प्रेम और प्राणिमात्रके प्रति दयाका भाव स्थापित करनेके लिये इससे बढ़कर कोई साधन नहीं। वर्तमान समयमें, जब संसारके बहुत अधिक भागोंमें भयंकर युद्ध छिड़ा हुआ है, मनुष्यमात्रको इस पवित्र धर्मका उपदेश अत्यन्त कल्याणकारी होगा। जो भगवद्भक्त हैं और श्रीमद्भागवतके महत्त्वको जानते हैं, उनका यह कर्तव्य है कि मनुष्यके लोक और परलोक दोनोंके बनानेवाले इस पवित्र ग्रन्थका सब देशोंकी भाषाओंमें अनुवाद कर इसका प्रचार करें । shrimad bhagwat pujan vidhi

भागवत सप्ताह पूजन मन्त्र विधि shrimad bhagwat pujan vidhi
भागवत सप्ताह पूजन मन्त्र विधि shrimad bhagwat pujan vidhi

प्रातःकाल स्नानके पश्चात् अपना नित्य-नियम समाप्त करके पहले भगवत्-सम्बन्धी स्तोत्रों एवं पदोंके द्वारा मंगलाचरण और वन्दना करे। इसके बाद आचमन और प्राणायाम करके-

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाँसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ।।१।।

  • इत्यादि मन्त्रोंसे शान्तिपाठ करे। इसके पश्चात् भगवान् श्रीकृष्ण, श्रीव्यासजी, शुकदेवजी तथा श्रीम‌द्भागवत-ग्रन्थकी षोडशोपचारसे पूजा करनी चाहिये। यहाँ श्रीम‌द्भागवत-पुस्तकके षोडशोपचार पूजनकी मन्त्रसहित विधि दी जा रही है, इसीके अनुसार श्रीकृष्ण आदिकी भी पूजा करनी चाहिये। निम्नांकित वाक्य पढ़कर पूजनके लिये संकल्प करना चाहिये। संकल्पके समय दाहिने हाथकी अनामिका अंगुलिमें कुशकी पवित्री पहने और हाथमें जल लिये रहे। संकल्पवाक्य इस प्रकार है-

ॐ तत्सत् । ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः ओ३मद्येतस्य ब्रह्मणो द्वितीयपराधे
श्रीश्वेतवाराहकल्पे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्तेकदेशान्तर्गते पुण्यस्थाने कलियुगे
कलिप्रथमचरणे अमुकसंवत्सरे अमुकमासे अमुकपक्षे
अमुकयोगवारांशकलग्नमुहूर्तकरणान्वितायां शुभपुण्यतिथौ अमुकवासरे
अमुकगोत्रोत्पन्नस्य अमुकशर्मणः (वर्मणः गुप्तस्य वा) मम सकुटुम्बस्य सपरिवारस्य
श्रीगोवर्धनधरणचरणारविन्दप्रसादात् सर्वसमृद्धिप्राप्त्यर्थं
भगवदनुग्रहपूर्वक भगवदीयप्रेमोपलब्धये च
श्रीभगवन्नामात्मक भगवत्स्वरूपश्री भागवतस्य पाठेऽधिकारसिद्ध्यर्थ
श्रीमद्भागवतस्य प्रतिष्ठां पूजनं चाहं करिष्ये ।

तदस्तु मित्रावरुणा तदग्ने
शंय्योऽस्मभ्यमिदमस्तु शस्तम् ।
अशीमहि गाधमुत प्रतिष्ठां
नमो दिवे बृहते सादनाय ।।२।।

  • यह मन्त्र पढ़कर श्रीम‌द्भागवतकी सिंहासन या अन्य किसी आसनपर स्थापना करे। तत्पश्चात् पुरुषसूक्तके एक-एक मन्त्रद्वारा क्रमशः षोडश-उपचार अर्पण करते हुए पूजन करे ।

१- देवताओ ! हमें अपने कानोंसे ऐसे ही वचन सुननेको मिलें, जो परिणाममें कल्याणकारी हों। हम यज्ञकर्ममें समर्थ होकर अपनी इन आँखोंसे सदा शुभ-ही-शुभ देखें – अशुभका कभी दर्शन न हो। हमारा शरीर और उसके अवयव स्थिर हों-पुष्ट हों और उनसे परमात्माकी स्तुति – भगवान्‌की सेवा करते हुए हम ऐसी आयुका उपभोग करें, ऐसा जीवन बितायें जो देवताओंके लिये हितकर हो, जिसका देवकार्यमें उपयोग हो सके ।

२- परमात्मन् ! आप सबके मित्र – हितकारी होनेके कारण मित्र नामसे पुकारे जाते हैं, सबसे वर-श्रेष्ठ होनेसे आप वरुण हैं, सबको ग्रहण करनेवाले होनेके कारण अग्नि हैं। हम आपको इन ‘मित्र’, ‘वरुण’ एवं ‘अग्नि’ नामोंसे सम्बोधित करके प्रार्थना करते हैं कि यह सूक्त (आपके सुयशसे पूर्ण यह श्रीम‌द्भागवतरूप सुन्दर उक्ति) अत्यन्त प्रशस्त हो – सर्वोत्तम होनेके साथ ही इसकी ख्याति एवं प्रसार हो तथा यह सूक्त हमलोगोंके लिये ऐसा सुख, ऐसी शान्ति प्रदान करे, जिसमें दुःख या अशान्तिका मेल न हो, अर्थात् इससे नित्य सुख, नित्य शान्ति प्राप्त हो। हम चाहते हैं अविचल स्थिति, हम चाहते हैं शाश्वत प्रतिष्ठा, इसे इस सूक्तके द्वारा हम प्राप्त कर सकें। देवदेव! यह जो आपका अत्यन्त प्रकाशमान परम महान् समस्त लोकोंका आश्रयभूत ‘सूर्य’ नामक स्वरूप है, इसे हम सदा ही नमस्कार करते हैं।

यहाँ आपका पूरा लेख जैसा का तैसा रखा गया है, केवल संस्कृत श्लोकों को बोल्ड करके और पाठ को व्यवस्थित किया गया है—किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं किया गया है:


ॐ सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् ।
स भूमिं सर्वतस्पृत्वात्यतिष्ठद्द‌शाङ्गुलम् ।।१।।

श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः । आवाहयामि ।

  • इस मन्त्रसे भगवान्‌के नामस्वरूप भागवतको नमस्कार करके आवाहन करे ।

ॐ पुरुष एवेदं सर्वं यद् भूतं यच्च भाव्यम् ।
उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ।।२।।

श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः। आसनं समर्पयामि ।

  • इस मन्त्रसे आसन समर्पित करे ।

ॐ एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पूरुषः ।
पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ।।३।।

श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः । पाद्यं समर्पयामि ।

  • इस मन्त्रसे पैर पखारनेके लिये गंगाजल समर्पित करे ।

ॐ त्रिपादूर्ध्व उदैत् पुरुषः पादोऽस्येहाभवत् पुनः ।
ततो विष्वङ् व्यक्रामत् साशनानशने अभि ।।४।।

श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः । अर्घ्यं समर्पयामि ।

  • इस मन्त्रसे अर्घ्य (गन्ध-पुष्पादिसहित गंगाजल) निवेदित करे ।

ॐ ततो विराडजायत विराजो अधि पूरुषः ।
स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद् भूमिमथो पुरः ।।५।।

श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः । आचमनं समर्पयामि ।

  • इस मन्त्रसे आचमनके लिये गंगाजल अर्पित करे ।

ॐ तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः संभृतं पृषदाज्यम् ।
पशून् ताँश्चक्रे वायव्यानारण्यान् ग्राम्याश्च ये ।।६।।

श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः। स्नानं समर्पयामि ।

  • इस मन्त्रसे स्नानके लिये गंगाजल अथवा शुद्ध जल अर्पित करे ।

ॐ तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे ।
छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद् यजुस्तमादजायत ।।७।।

श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः। वस्त्रं समर्पयामि ।
इस मन्त्रसे वस्त्र समर्पित करे ।


ॐ तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः ।
गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः ।।८।।

श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः । यज्ञोपवीतं समर्पयामि ।

  • इस मन्त्रसे यज्ञोपवीत अर्पित करे ।

ॐ तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रतः ।
तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये ।।९।।

श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः । गन्धं समर्पयामि ।

  • इस मन्त्रसे गन्ध-चन्दनादि चढ़ाये ।

ॐ यत् पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन् ।
मुखं किमस्यासीत् किम्बाहू किमूरू पादा उच्येते ।।१०।।

श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः । तुलसीदलं च पुष्पाणि समर्पयामि ।

  • इस मन्त्रसे तुलसीदल एवं पुष्प चढ़ावे ।

ॐ ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्बाहू राजन्यः कृतः ।
ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत ।।११।।

श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः । धूपमाघ्रापयामि ।

  • इस मन्त्रसे धूप सुँघाये ।

ॐ चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत ।
श्रोत्राद्वायुश्च प्राणश्च मुखादग्निरजायत ।।१२।।

श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः । दीपं दर्शयामि।

  • इस मन्त्रसे घीका दीप जलाकर दिखाये। (उसके बाद हाथ धो ले।)

ॐ नाभ्या आसीदन्तरिक्षंशीष्र्णोद्यौः समवर्तत ।
पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ अकल्पयन् ।।१३।।

श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः। नैवेद्यं निवेदयामि ।

  • इस मन्त्रसे नैवेद्य अर्पित करे। नैवेद्यके बाद “मध्ये पानीयं समर्पयामि” एवम्
    ‘उत्तरापोशनं समर्पयामि’ कहकर तीन-तीन बार जल छोड़े (प्रसाद) ।

ॐ यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत ।
वसन्तोऽस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः ।।१४।।

श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः । एलालवङ्गपूगीफलकर्पूरसहितं ताम्बूलं
समर्पयामि ।

  • इस मन्त्रसे ताम्बूल समर्पण करे ।

****** ॐ सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः ।
देवा यद्यज्ञं तन्वाना अवध्नन् पुरुषं पशुम् ।।१५।।

श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः । दक्षिणां समर्पयामि ।

  • इस मन्त्रसे दक्षिणा समर्पित करे ।

ॐ वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम्
आदित्यवर्णं तमसस्तु पारे ।
सर्वाणि भूतानि विचिन्त्य धीरः
नामानि कृत्वाभिवदन् यदास्ते ।।१६।।

श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः । नमस्कारं समर्पयामि ।


ॐ धाता पुरस्ताद्यमुदाजहार
शक्रः प्रविद्वान् प्ररिशश्चतस्रः ।
तमेवं विद्वानमृत इह भवति
नान्यः पन्था अयनाय विद्यते ।।१७।।

श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः । प्रदक्षिणां समर्पयामि ।

  • इस मन्त्रसे प्रदक्षिणा समर्पण करे ।

ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवा-
स्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् ।
ते ह नाकं महिमानः सचन्त
यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ।।१८।।

श्रीभगवन्नामस्वरूपिणे भागवताय नमः । मन्त्रपुष्पं समर्पयामि ।

  • इस मन्त्रसे पुष्पांजलि समर्पित करे ।

panchdev puja mantra पंचदेव पूजा मंत्र
panchdev puja mantra पंचदेव पूजा मंत्र

१- सर्वान्तर्यामी परमात्मा इस समस्त ब्रह्माण्डकी भूमिको सब ओरसे व्याप्त करके
स्थित हैं और इससे दस अंगुल ऊपर भी हैं। अर्थात् ब्रह्माण्डमें व्यापक होते हुए वे इससे परे
भी हैं। उन परमात्माके मस्तक, नेत्र आदि ज्ञानेन्द्रियाँ और चरण आदि कर्मेन्द्रियाँ हजारों हैं-
असंख्य हैं।

२- यह जो कुछ इस समय वर्तमान है, सब परमात्माका ही स्वरूप है, भूत और
भविष्य जगत् भी परमात्मा ही है। इतना ही नहीं, वह परमात्मा मुक्तिका स्वामी है, तथापि ये
जो अन्नसे उत्पन्न होनेवाले जीव हैं, उन सबका भी शासन- सबको नियमके अंदर रखनेवाला
वह परमात्मा ही है।

३-भूत, भविष्य और वर्तमान कालसे सम्बन्ध रखनेवाला जितना भी जगत् है- यह सब इस पुरुषकी महिमा है, इस परमात्माका विभूति-विस्तार है। उसका पारमार्थिक स्वरूप
इतना ही नहीं है, वह पुरुष इस ब्रह्माण्डमय विराट्स्वरूपसे भी बहुत बड़ा है। यह सारा विश्व
(ये तीनों लोक) तो उसके एक पादमें है, उसकी एक चौथाईमें समाप्त हो जाते हैं। अभी
उसके तीन पाद और शेष हैं। यह त्रिपादस्वरूप अमृत है- अविनाशी है और परम प्रकाशमय
द्युलोक अर्थात् अपने स्वरूपमें ही स्थित है।

४- यह त्रिपाद पुरुष ऊपर उठा हुआ है अर्थात् वह परमात्मा अज्ञानके कार्यभूत इस
संसारसे पृथक् तथा यहाँके गुण-दोषोंसे अछूता रहकर ऊँची स्थितिमें विराजमान है। उसका
एक अंशमात्र मायाके सम्पर्कमें आकर यहाँ जगत्‌के रूपमें उत्पन्न हुआ, फिर वह मायावश
जड-चेतनमयी नाना प्रकारकी सृष्टिके रूपमें स्वयं ही फैलकर सब ओर व्याप्त हो गया ।

५-उस आदिपुरुष परमात्मासे विराट्की उत्पत्ति हुई- यह ब्रह्माण्ड उत्पन्न हुआ। इस
ब्रह्माण्डके ऊपर इसका अभिमानी एक पुरुष प्रकट हुआ। तात्पर्य यह कि परमात्माने अपनी
मायासे विराट् ब्रह्माण्डकी रचना कर स्वयं ही उसमें जीवरूपसे प्रवेश किया। वे ही जीव
ब्रह्माण्डका अभिमानी देवता (हिरण्यगर्भ) हुआ। इस प्रकार उत्पन्न होकर वह विराट् पुरुष
पुनः देव, तिर्यक् और मनुष्य आदि अनेकों रूपोंमें प्रकट हुआ। इसके बाद उसने भूमिको
उत्पन्न किया, फिर जीवोंके शरीरोंकी रचना की।

६- जिसमें सब कुछ हवन किया गया, उस पुरुषरूप यज्ञसे दही-घी आदि सामग्री
उत्पन्न हुई। पुरुषने वनमें उत्पन्न होनेवाले हिरन आदि और गाँवोंमें होनेवाले गाय, घोड़े आदि,
वायु-देवता-सम्बधी प्रसिद्ध पशुओंको भी उत्पन्न किया ।

७- जिसमें सब कुछ हवन किया गया है उस यज्ञपुरुषसे ऋग्वेद और सामवेद प्रकट
हुए, उसीसे गायत्री आदि छन्दोंकी उत्पत्ति हुई तथा उसीसे यजुर्वेदका भी प्रादुर्भाव हुआ ।

८- उस यज्ञपुरुषसे घोड़े उत्पन्न हुए, इनके अतिरिक्त भी जो नीचे-ऊपर दोनों ओर दाँत
रखनेवाले खच्चर, गदहे आदि प्राणी हैं, ये भी उत्पन्न हुए। उसीसे गौएँ उत्पन्न हुईं और उसीसे
भेड़ों तथा बकरोंकी उत्पत्ति हुई ।

९- सबसे पहले उत्पन्न हुआ वह पुरुष ही उस समय यज्ञका साधन था, देवताओंने उसे
संकल्पद्वारा यूपमें बँधा हुआ पशु माना और उस मानसिक यज्ञमें उस संकल्पित पशुका
भावनाद्वारा ही प्रोक्षण आदि संस्कार भी किया। इस प्रकार संस्कार किये हुए उस पुरुषरूपी
पशुके द्वारा देवताओं, साध्यों और ऋषियोंने उस मानसिक यज्ञको पूर्ण किया ।

१०-जब प्राणमय देवताओंने उस यज्ञपुरुष (प्रजापति) को प्रकट किया, उस समय
उसके अवयवोंके रूपमें कितने विभाग किये। इस पुरुषका मुख क्या था, दोनों बाहें क्या थीं।
दोनों जाँचें और दोनों पैर कौन थे ।

११- ब्राह्मण इसका मुख था अर्थात् मुखसे ब्राह्मणकी उत्पत्ति हुई। दोनों भुजाएँ क्षत्रिय
जाति बनीं, अर्थात् उनसे क्षत्रियोंका प्राकट्य हुआ। इस पुरुषकी दोनों जंघाएँ वैश्य हुईं –
जंघाओंसे वैश्य जातिकी उत्पत्ति हुई और दोनों पैरोंसे शूद्र जाति प्रकट हुई ।

१२- इसके मनसे चन्द्रमा उत्पन्न हुए, नेत्रोंसे सूर्यकी उत्पत्ति हुई। श्रोत्र (कान)-से वायु
****** और प्राणकी उत्पत्ति हुई और मुखसे अग्निका प्रादुर्भाव हुआ।

१३-नाभिसे अन्तरिक्ष-लोककी उत्पत्ति हुई, मस्तकसे स्वर्गलोक प्रकट हुआ, पैरोंसे
पृथिवी हुई और कानसे दिशाएँ प्रकट हुईं। इस प्रकार उन्होंने समस्त लोकोंकी कल्पना की।

१४- उस समय देवताओंने यज्ञ करना चाहा, परन्तु यज्ञकी कोई सामग्री उपलब्ध न
हुई, तब उन्होंने पुरुषस्वरूपमें ही हविष्यकी भावना की। जब पुरुषरूप हविष्यसे ही
देवताओंने यज्ञका विस्तार किया, उस समय उनके संकल्पानुसार वसन्त ऋतु घी हुई, ग्रीष्म
ऋतुने समिधाका काम दिया और शरद् ऋतुसे विशेष प्रकारके चरु-पुरोडाशादि हविष्यकी
आवश्यकता पूर्ण हुई ।

१५-प्रजापतिके प्राणरूपी देवताओंने जब मानसिक यज्ञका अनुष्ठान करते समय
संकल्पद्वारा पुरुषरूपी पशुका बन्धन किया था, उस समय सात समुद्र इस यज्ञकी परिधि थे
और इक्कीस प्रकारके छन्दोंकी समिधा हुई। (गायत्री आदि ७, श्रुति जगती आदि ७ और
कृति आदि ७-ये ही २१ छन्द हैं।)

१६-धीर पुरुष समग्र रूपोंको परमात्माके ही स्वरूप विचारकर, उनके भिन्न-भिन्न
नाम रखकर जिस एक तत्त्वका ही उच्चारण और अभिवन्दन करता है, उसको ज्ञानी पुरुष
इस प्रकार जानते हैं- अविद्यारूपी अन्धकारसे परे आदित्यके समान स्वप्रकाश इस महान्
पुरुषको मैं अपने ‘आत्मा’ रूपसे जानता हूँ।

१७-ब्रह्माजीने पूर्वकालमें जिसका स्तवन किया था, इन्द्रने सब दिशा-विदिशाओंमें
जिसे व्याप्त जाना था, उस परमात्माको जो इस प्रकार जानता है, वह इस जीवनमें ही अमृत
(मुक्त) हो जाता है। मोक्ष अथवा भगवत्प्राप्तिके लिये इसके सिवा दूसरा मार्ग नहीं है।

१८-देवताओंने पूर्वोक्त मानसिक यज्ञद्वारा यज्ञस्वरूप पुरुष-प्रजापतिकी आराधना
की। इस आराधनासे समस्त जगत्‌को धारण करनेवाले वे पृथ्वी आदि मुख्य भूत प्रकट हुए।
इस यज्ञकी उपासना करनेवाले महात्मालोग उस स्वर्गलोकको प्राप्त होते हैं, जहाँ प्राचीन
साध्यदेवता निवास करते हैं।

प्रार्थना

वन्दे श्रीकृष्णदेवं मुरनरकभिदं वेदवेदान्तवेद्यं
लोके भक्तिप्रसिद्धं यदुकुलजलधौ प्रादुरासीदपारे ।
यस्यासीद् रूपमेवं त्रिभुवनतरणे भक्तिवच्च स्वतन्त्रं
शास्त्रं रूपं च लोके प्रकटयति मुदा यः स नो भूतिहेतुः ।।

जो इस जगत्में भक्तिसे ही प्राप्त होते हैं, जिनका तत्त्व वेद और वेदान्तके द्वारा ही
जाननेयोग्य है, जो अपार यादवरूपी समुद्रमें प्रकट हुए थे, मुर और नरकासुरको मारनेवाले
उन भगवान् श्रीकृष्णको मैं सादर सप्रेम प्रणाम करता हूँ। जो इस संसारमें अपने स्वरूप तथा
शास्त्रको प्रसन्नतापूर्वक प्रकट किया करते हैं तथा सचमुच ही जिनका स्वरूप इस त्रिभुवनको
तारनेके लिये भक्तिके समान स्वतन्त्र नौकारूप है, वे भगवान् श्रीकृष्ण हमलोगोंका कल्याण
करें।

नमः कृष्णपदाब्जाय भक्ताभीष्टप्रदायिने ।
आरक्तं रोचयेच्छश्वन्मामके हृदयाम्बुजे ।।

कुछ-कुछ लालिमा लिये हुए श्रीकृष्णका जो चरणकमल मेरे हृदयकमलमें सदा दिव्य
प्रकाश फैलाता रहता है और भक्तजनोंकी मनोवांछित कामनाएँ पूर्ण किया करता है, उसे मैं
बारम्बार नमस्कार करता हूँ।

श्रीभागवतरूपं तत् पूजयेद् भक्तिपूर्वकम् ।
अर्चकायाखिलान् कामान् प्रयच्छति न संशयः ।।

श्रीमद्भागवत भगवान्‌का स्वरूप है, इसका भक्तिपूर्वक पूजन करना चाहिये। यह
पूजन करनेवालेकी सारी कामनाएँ पूर्ण करता है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।

विनियोग

दाहिने हाथकी अनामिकामें कुशकी पवित्री पहन ले। फिर हाथमें जल लेकर नीचे लिखे
वाक्यको पढ़कर भूमिपर गिरा दे-

ॐ अस्य श्रीम‌द्भागवताख्यस्तोत्रमन्त्रस्य नारद ऋषिः । बृहती छन्दः । श्रीकृष्णः
परमात्मा देवता । ब्रह्म बीजम् । भक्तिः शक्तिः । ज्ञानवैराग्ये कीलकम् । मम
श्रीमद्भगवत्प्रसादसिद्ध्यर्थे पाठे विनियोगः ।

‘इस श्रीम‌द्भागवतस्तोत्र-मन्त्रके देवर्षि नारदजी ऋषि हैं, बृहती छन्द है, परमात्मा
श्रीकृष्णचन्द्र देवता हैं, ब्रह्ह बीज है, भक्ति शक्ति है, ज्ञान और वैराग्य कीलक है। अपने ऊपर
भगवान्‌की प्रसन्नता हो, उनकी कृपा बराबर बनी रहे- इस उद्देश्यकी सिद्धिके लिये पाठ
करनेमें इस भागवतका विनियोग (उपयोग) किया जाता है।’

यह रहा आपका पूरा लेख जैसा है वैसा ही, केवल संस्कृत श्लोकों को bold करके और पूरे पाठ को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया गया है—किसी भी शब्द या संरचना में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है:


न्यास

विनियोगमें आये हुए ऋषि आदिका तथा प्रधान देवताके मन्त्राक्षरोंका अपने शरीरके विभिन्न अंगोंमें जो स्थापन किया जाता है, उसे ‘न्यास’ कहते हैं। मन्त्रका एक-एक अक्षर चिन्मय होता है, उसे मूर्तिमान् देवताके रूपमें देखना चाहिये। इन अक्षरोंके स्थापनसे साधव स्वयं मन्त्रमय हो जाता है, उसके हृदयमें दिव्य चेतनाका प्रकाश फैलता है, मन्त्रके देवता उसके स्वरूप होकर उसकी सर्वथा रक्षा करते हैं। इस प्रकार वह ‘देवो भूत्वा देवं यजेत्’ इस श्रुतिके अनुसार स्वयं देवस्वरूप होकर देवताओंका पूजन करता है। ऋषि आदिका न्यास सिर आदि कतिपय अंगोंमें होता है। मन्त्रपदों अथवा अक्षरोंका न्यास प्रायः हाथकी अँगुलियों और हृदयादि अंगोंमें होता है। इन्हें क्रमशः ‘करन्यास’ और ‘अंगन्यास’ कहते हैं। किन्हीं-किन्हीं मन्त्रोंका न्यास सर्वांगमें होता है। न्याससे बाहर भीतरकी शुद्धि, दिव्यबलकी प्राप्ति और साधनाकी निर्विघ्न पूर्ति होती है। यहाँ क्रमशः ऋष्यादिन्यास, करन्यास और अंगन्यास दिये जा रहे हैं-


ऋष्यादिन्यास

नारदर्षये नमः शिरसि ।।१।।
बृहतीच्छन्दसे नमो मुखे ।।२।।
श्रीकृष्णपरमात्मदेवतायै नमो हृदये ।।३।।
ब्रह्मबीजाय नमो गुह्ये ।।४।।
भक्तिशक्तये नमः पादयोः ।।५।।
ज्ञानवैराग्यकीलकाभ्यां नमो नाभौ ।। ६ ।।
विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे ।।७।।

ऊपर न्यासके सात वाक्य उद्धृत किये गये हैं। इनमें पहला वाक्य पढ़कर दाहिने हाथकी अँगुलियोंसे सिरका स्पर्श करे, दूसरा वाक्य पढ़कर मुखका, तीसरे वाक्यसे हृदयका, चौथेसे गुदाका, पाँचवेंसे दोनों पैरोंका, छठेसे नाभिका और सातवें वाक्यसे सम्पूर्ण अंगोंका स्पर्श करना चाहिये ।


करन्यास

इसमें ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ इस द्वादशाक्षरमन्त्रके एक-एक अक्षरको प्रणवसे सम्पुटित करके दोनों हाथोंकी अंगुलियोंमें स्थापित करना है। मन्त्र नीचे दिये जा रहे हैं-

‘ॐ ॐ ॐ नमो दक्षिणतर्जन्याम्’ ऐसा उच्चारण करके दाहिने हाथके अँगूठेसे दाहिने हाथकी तर्जनीका स्पर्श करे।
‘ॐ नं ॐ नमो दक्षिणमध्यमायाम्’ – यह उच्चारण कर दाहिने हाथके अँगूठेसे दाहिने हाथकी मध्यमा अंगुलिका स्पर्श करे।
‘ॐ मों ॐ नमो दक्षिणानामिकायाम्’ – यह पढ़कर दाहिने हाथके अँगूठेसे दाहिने हाथकी अनामिका अंगुलिका स्पर्श करे।
‘ॐ भं ॐ नमो दक्षिणकनिष्ठिकायाम्’ – इससे दाहिने हाथके अँगूठेसे दाहिने हाथकी कनिष्ठिका अंगुलिका स्पर्श करे।
‘ॐ गं ॐ नमो वामकनिष्ठिकायाम्’ – इससे बायें हाथके अँगूठेसे बायें हाथकी कनिष्ठिका अंगुलिका स्पर्श करे।
‘ॐ वं ॐ नमो वामानामिकायाम्’ – इससे बायें हाथके अँगूठेसे बायें हाथकी ****** अनामिका अंगुलिका स्पर्श करे।
‘ॐ तें ॐ नमो वाममध्यमायाम्’ – इससे बायें हाथके अँगूठेसे बायें हाथकी मध्यमा अंगुलिका स्पर्श करे।
‘ॐ वां ॐ नमो वामतर्जन्याम्’ – इससे बायें हाथके अँगूठेसे बायें हाथकी तर्जनी अंगुलिका स्पर्श करे।
‘ॐ सुं ॐ नमः ॐ दें ॐ नमो दक्षिणाङ्गुष्ठपर्वणोः’ – इसको पढ़कर दाहिने हाथकी तर्जनी अंगुलिसे दाहिने हाथके अँगूठेकी दोनों गाँठोंका स्पर्श करे।
‘ॐ वां ॐ नमः ॐ यं ॐ नमो वामाङ्गुष्ठपर्वणोः’ – इसका उच्चारण करके बायें हाथकी तर्जनी अंगुलिसे बायें हाथके अँगूठेकी दोनों गाँठोंका स्पर्श करे ।


अङ्गन्यास

यहाँ द्वादशाक्षरमन्त्रके पदोंका हृदयादि अंगोंमें न्यास करना है-

‘ॐ नमो नमो हृदयाय नमः’ इसको पढ़कर दाहिने हाथकी पाँचों अंगुलियोंसे हृदयका स्पर्श करे ।

‘ॐ भगवते नमः शिरसे स्वाहा’ – इसका उच्चारण करके दाहिने हाथकी सभी अंगुलियोंसे सिरका स्पर्श करे।

‘ॐ वासुदेवाय नमः शिखायै वषट्’ – इसके द्वारा दाहिने हाथसे शिखाका स्पर्श करे।

‘ॐ नमो नमः कवचाय हुम्’ – इसको पढ़कर दायें हाथकी अंगुलियोंसे बायें कंधेका और बायें हाथकी अंगुलियोंसे दायें कंधेका स्पर्श करे।

‘ॐ भगवते नमः नेत्रत्रयाय वौषट्’ – इसको पढ़कर दाहिने हाथकी अंगुलियोंके अग्रभागसे दोनों नेत्रोंका तथा ललाटके मध्यभागमें गुप्तरूपसे स्थित तृतीय नेत्र (ज्ञानचक्षु) का स्पर्श करे।

‘ॐ वासुदेवाय नमः अस्त्राय फट्’ – इसका उच्चारण करके दाहिने हाथको सिरके ऊपरसे उलटा अर्थात् बायीं ओरसे पीछेकी ओर ले जाकर दाहिनी ओरसे आगेकी ओर ले जाये और तर्जनी तथा मध्यमा अंगुलियोंसे बायें हाथकी हथेलीपर ताली बजाये ।

अंगन्यासमें आये हुए ‘स्वाहा’, ‘वषट्’, ‘हुम्’, ‘वौषट्’ और ‘फट्’- ये पाँच शब्द देवताओंके उद्देश्यसे किये जानेवाले हवनसे सम्बन्ध रखनेवाले हैं। यहाँ इनका आत्मशुद्धिके लिये ही उच्चारण किया जाता है।


ध्यान

इस प्रकार न्यास करके बाहर-भीतरसे शुद्ध हो मनको सब ओरसे हटाकर एकाग्रभावसे भगवान्‌का ध्यान करे –

किरीटकेयूरमहार्हनिष्कै-
र्मण्युत्तमालङ्कृतसर्वगात्रम् ।
पीताम्बरं काञ्चनचित्रनद्ध-
मालाधरं केशवमभ्युपैमि ।।

‘जिनके मस्तकपर किरीट, बाहुओंमें भुजबन्ध और गलेमें बहुमूल्य हार शोभा पा रहे हैं, मणियोंके सुन्दर गहनोंसे सारे अंग सुशोभित हो रहे हैं और शरीरपर पीताम्बर फहरा रहा है- सोनेके तारद्वारा विचित्र रीतिसे बँधी हुई वनमाला धारण किये, उन भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रका मैं मन-ही-मन चिन्तन करता हूँ।’

आसन पवित्रीकरण: विनियोग एवं मंत्र asan shuddhi viniyoga mantra
आसन पवित्रीकरण: विनियोग एवं मंत्र asan shuddhi viniyoga mantra

श्रीमद्भागवत-सप्ताहकी आवश्यक विधि

पुराणोंमें श्रीम‌द्भागवतके सप्ताहपारायण तथा श्रवणकी बड़ी भारी महिमा बतलायी गयी है, अतः यहाँ श्रीमद्भागवत-प्रेमियोंके लिये संक्षेपसे सप्ताह-यज्ञकी आवश्यक विधिका दिग्दर्शन कराया जाता है।

मुहूर्तविचार

पहले विद्वान् ज्योतिषीको बुलाकर उनके द्वारा कथा-प्रारम्भके लिये शुभ मुहूर्तका विचार करा लेना चाहिये। नक्षत्रोंमें हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा, पुनर्वसु, पुष्य, रेवती, अश्विनी, मृगशिरा, श्रवण, धनिष्ठा तथा पूर्वाभाद्रपदा उत्तम हैं। तिथियोंमें द्वितीया, तृतीया, पञ्चमी, षष्ठी, दशमी, एकादशी तथा द्वादशीको इस कार्यके लिये श्रेष्ठ बतलाया गया है। सोम, बुध, गुरु एवं शुक्र- ये वार सर्वोत्तम हैं। तिथि, वार और नक्षत्रका विचार करनेके साथ ही यह भी देख लेना चाहिये कि शुक्र या गुरु अस्त, बाल अथवा वृद्ध तो नहीं हैं। कथारम्भका मुहूर्त भद्रादि दोषोंसे रहित होना चाहिये। उस दिन पृथ्वी जागती हो, वक्ता और श्रोताका चन्द्रबल ठीक हो। लग्नमें शुभ ग्रहोंका योग अथवा उनकी दृष्टि हो। शुभ ग्रहोंकी स्थिति केन्द्र या त्रिकोणमें हो तो उत्तम है। आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक और मार्गशीर्ष (अगहन) – ये मास कथा आरम्भ करनेके लिये श्रेष्ठ बतलाये गये हैं। किन्हीं विद्वानोंके मतसे चैत्र और पौषको छोड़कर सभी मास ग्राह्य हैं।


कथाके लिये स्थान

सप्ताहकथाके लिये उत्तम एवं पवित्र स्थानकी व्यवस्था हो। जहाँ अधिक लोग सुविधासे बैठ सकें, ऐसे स्थानमें कथाका आयोजन उत्तम है। नदीका तट, उपवन (बगीचा), देवमन्दिर अथवा अपना निवास-स्थान- ये सभी कथाके लिये उपयोगी स्थल हैं, स्थान लिपा-पुता स्वच्छ हो। नीचेकी भूमि गोबर और पीली मिट्टीसे लीपी गयी हो। अथवा पक्का आँगन हो तो उसे धो दिया गया हो। उसपर पवित्र एवं सुन्दर आसन बिछे हों। ऊपरसे चंदोवा तना हो। चंदोवा आदि किसी भी कार्यमें नीले रंगके वस्त्रका उपयोग न किया जाय। यजमानके हाथसे सोलह हाथ लम्बा और उतना ही चौड़ा कथा-मण्डप बने। उसे केलेके खम्भोंसे सजाया जाय। हरे बाँसके खंभे लगाये जायँ। नूतन पल्लवोंकी बंदनवारों, पुष्पमालाओं और ध्वजा-पताकाओंसे मण्डपको भलीभाँति सुसज्जित किया जाय। उसपर ऊपरसे सुन्दर चंदोवा तान दिया जाय। उस मण्डपके दक्षिण-पश्चिम भागमें कथावाचक और मुख्य श्रोताके बैठनेके लिये स्थान हो। शेष भागमें देवताओं और कलश आदिका स्थापन किया जाय।

कथावाचकके बैठनेके लिये ऊँची चौकी रखी जाय। उसपर शुद्ध आसन (नया गद्दा) बिछाया जाय। पीछे तथा पार्श्वभागमें मसनद एवं तकिये रख दिये जायें। श्रीमद्भागवतको स्थापित करनेके लिये एक छोटी-सी चौकी या आधारपीठ बनवाकर उसपर पवित्र वस्त्र बिछा दिया जाय। उसपर आगे बतायी जानेवाली विधिके अनुसार अष्टदल कमल बनाकर पूजन करके श्रीमद्भागवतकी पुस्तक स्थापित की जाय।

कथावाचक विद्वान्, सर्वशास्त्रकुशल, दृष्टान्त देकर श्रोताओंको समझानेमें समर्थ,
सदाचारी एवं सद्‌गुणसम्पन्न ब्राह्मण हों। उनमें सुशीलता, कुलीनता, गम्भीरता तथा
श्रीकृष्णभक्तिका होना भी परमावश्यक है। वक्ताको असूया तथा परनिन्दा आदि दोषसे
सर्वथा रहित निःस्पृह होना चाहिये। श्रीमद्भागवतकी पुस्तकको रेशमी वस्त्रसे
आच्छादित करके छत्र चॅवरके साथ डोलीमें अथवा अपने मस्तकपर रखकर
कथामण्डपमें लाना और स्थापित करना चाहिये। उस समय गीत-वाद्य आदिके द्वारा
उत्सव मनाना चाहिये। कथामण्डपसे अनुपयोगी वस्तुएँ हटा देनी चाहिये। इधर-उधर
दीवालोंमें भगवान् और उनकी लीलाओंके स्मारक चित्र लगा देने चाहिये। वक्ताका मुँह
यदि उत्तरकी ओर हो तो मुख्य श्रोताका मुख पूर्वकी ओर होना चाहिये। यदि वक्ता
पूर्वाभिमुख हो तो श्रोताको उत्तराभिमुख होना चाहिये ।

सप्ताह-कथा एक महान् यज्ञ है। इसे सुसम्पन्न करनेके लिये अन्य सुहृद्-
सम्बन्धियोंको भी सहायक बना लेना चाहिये। अर्थकी भी समुचित व्यवस्था पहलेसे ही
कर लेना उत्तम है। पाँच-सात दिन पहलेसे ही दूर-दूरतक कथाका समाचार भेज देना
चाहिये और सबसे यह अनुरोध करना चाहिये कि वे स्वयं उपस्थित होकर सप्ताह-कथा
श्रवण करें। अधिक समय न दे सकें तो भी एक दिन अवश्य पधारकर कथाश्रवणका
लाभ लें। दूरसे आये हुए अतिथियोंके ठहरने और भोजनादिकी व्यवस्था भी करनी
चाहिये। वक्ताको व्रत ग्रहण करनेके लिये एक दिन पहले ही क्षौर करा लेना चाहिये।
सप्ताह-प्रारम्भ होनेके एक दिन पूर्व ही देवस्थापन, पूजनादि कर लेना उत्तम है। वक्ता
प्रतिदिन सूर्योदयसे पूर्व ही स्नानादि करके संक्षेपसे सन्ध्या वन्दनादिका नियम पूरा कर
ले और कथामें कोई विघ्न न आये, इसके लिये नित्यप्रति गणेशजीका पूजन कर लिया
करे ।

सप्ताहके प्रथम दिन यजमान स्नान आदिसे शुद्ध हो नित्यकर्म करके आभ्युदयिक
श्राद्ध करे। आभ्युदयिक श्राद्ध और पहले भी किया जा सकता है। यज्ञमें इक्कीस दिन
पहले भी आभ्युदयिक श्राद्ध करनेका विधान है। उसके बाद गणेश, ब्रह्मा आदि
देवताओंसहित नवग्रह, षोडशमातृका, सप्त चिरजीवी (अश्वत्थामा, बलि, व्यास,
हनुमान्, विभीषण, कृपाचार्य तथा परशुरामजी) एवं कलशकी स्थापना तथा पूजा करे।
एक चौकीपर सर्वतोभद्र-मण्डल बनाकर उसके मध्यभागमें ताम्रकलश स्थापित करे।
कलशके ऊपर भगवान् लक्ष्मीनारायणकी प्रतिमा स्थापित करनी चाहिये। कलशके ही
बगलमें भगवान् शालग्रामका सिंहासन विराजमान कर देना चाहिये। सर्वतोभद्र-
मण्डलमें स्थित समस्त देवताओंका पूजन करनेके पश्चात् भगवान् नर-नारायण, गुरु,
वायु, सरस्वती, शेष, सनकादि कुमार, सांख्यायन, पराशर, बृहस्पति, मैत्रेय तथा
उद्धवका भी आवाहन, स्थापन एवं पूजन करना चाहिये। फिर त्रय्यारुणि आदि छः
पौराणिकोंका भी स्थापन-पूजन करके एक अलग पीठपर उसे सुन्दर वस्त्रसे आवृत
करके, श्रीनारदजीकी स्थापना एवं अर्चना करनी चाहिये। तदनन्तर आधारपीठ, पुस्तक
एवं व्यास (वक्ता आचार्य) का भी यथाप्राप्त उपचारोंसे पूजन करना चाहिये। कथा
****** निर्विघ्न पूर्ण हो-इसके लिये गणेशमन्त्र, द्वादशाक्षरमन्त्र तथा गायत्री मन्त्रका जप
और विष्णुसहस्रनाम एवं गीताका पाठ करनेके लिये अपनी शक्तिके अनुसार सात, पाँच
या तीन ब्राह्मणोंका वरण करे। श्रीमद्भागवतका भी एक पाठ अलग ब्राह्मणद्वारा
कराये। देवताओंकी स्थापना और पूजाके पहले स्वस्तिवाचनपूर्वक हाथमें पवित्री,
अक्षत, फूल, जल और द्रव्य लेकर एक महासंकल्प कर लेना चाहिये। संकल्प इस
प्रकार है-

ॐ तत्सदद्य श्रीमहाभगवतो विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणो द्वितीये
परार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्ते विष्णुप्रजापतिक्षेत्रे
वैवस्वतमनुभोग्यैकसप्ततियुगचतुष्टयान्तर्गताष्टाविंशति-तमकलिप्रथमचरणे
बौद्धावतारे अमुकसंवत्सरे अमुकायने अमुकर्तों अमुकराशिस्थिते भगवति
सवितरि अमुकामुकराशिस्थितेषु चान्येषु ग्रहेषु महामाङ्गल्यप्रदे मासानामुत्तमे
अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकवासरे अमुकनक्षत्रे अमुकमुहूर्तकरणादियुतायाम्
अमुकतिथौ अमुकगोत्रः अमुकप्रवरः अमुकशर्मा (वर्मा, गुप्तः) अहं
पूर्वातीतानेकजन्मसंचिताखिलदुष्कृतनिवृत्तिपुरस्सरैहि-
काध्यात्मिकादिविविधतापपापापनोदार्थं
दशाश्वमेध-
यज्ञजन्यसम्यगिष्टराजसूययज्ञसहस्रपुण्यसमपुण्यचन्द्रसूर्यग्रहणकालिकबहुब्राह्मणस
सर्वरत्नोपशोभितमहीदानपुण्यप्राप्तये श्रीगोविन्द-चरणारविन्दयुगले च
निरन्तरमुत्तरोत्तरमेधमाननिस्सीम प्रेमोपलब्धये तदीयपरमानन्दमयगोलोकधाम्नि
नित्यनिवासपूर्वकतत्परिचर्यारसास्वादनसौभाग्यसिद्धये
अमुकगोत्रामुकप्रवरामुकशर्मब्राह्मणवदना-रविन्दाच्छ्रीकृष्णवाङ्मयमूर्तीभूतं
श्रीम‌द्भागवतमष्टादशपुराणप्रकृति भूतमनेक श्रोतृश्रवणपूर्वकममुकदिनादारभ्यामुर्का
सप्ताहयज्ञरूपतया श्रोष्यामि * प्राप्स्यमानेऽस्मिन् सप्ताहयज्ञे
विघ्नपूगनिवारणपूर्वकं यज्ञरक्षाकरणार्थं गणपतिब्रह्मादिसहितनवग्रह-
षोडशमातृकासप्तचिरजीविपुरुषसर्वतोभद्रमण्डलस्थ-देवकलशाद्यर्चनपुरस्सरं
श्रीलक्ष्मीनारायण-प्रतिमाशालग्रामनरनारायणगुरुवायुसरस्वतीशेषसनत्कुमार-
सांख्यायनपराशरबृहस्पतिमैत्रेयोद्धवत्रय्यारुणिकश्यप-
रामशिष्याकृतव्रणवैशम्पायनहारीतनारदपूजनमाधारपीठ-पुस्तकव्यासपूजनं च
यथालब्धोपचारैः करिष्ये ।

संकल्पके पश्चात् पूर्वोक्त देवताओंके चित्रपटमें अथवा अक्षत-पुंजपर उनका
आवाहन-स्थापन करके वैदिक-पूजा-पद्धतिके अनुसार उन सबकी पूजा करनी चाहिये।
सप्तचिरजीविपुरुषों तथा सनत्कुमार आदिका पूजन नाम-मन्त्रद्वारा करना चाहिये ।

कथामण्डपमें चारों दिशाओं या कोणोंमें एक-एक कलश और मध्यभागमें एक
कलश- इस प्रकार पाँच कलश स्थापित करने चाहिये। चारों ओरके चार कलशोंमेंसे
पूर्वके कलशपर ऋग्वेदकी, दक्षिण कलशपर यजुर्वेदकी, पश्चिम कलशपर सामवेदकी
और उत्तर कलशपर अथर्ववेदकी स्थापना एवं पूजा करनी चाहिये। कोई-कोई मध्यमें
****** सर्वतोभद्र-मण्डलके मध्यभागमें एक ही ताम्रकलश स्थापित करके उसीके चारों
दिशाओंमें सर्वतोभद्रमण्डलकी चौकीके चारों ओर चारों वेदोंकी स्थापनाका विधान
करते हैं। इसी कलशके ऊपर भगवान् लक्ष्मी-नारायणकी प्रतिमा स्थापित करे और
षोडशोपचार-विधिसे उसकी पूजा करे। देवपूजाका क्रम प्रारम्भसे इस प्रकार रखना
चाहिये-

पहले रक्षादीप प्रज्वलित करे। एक पात्रमें घी भरकर रूईकी फूलबत्ती जलाये
और उसे सुरक्षित स्थानपर अक्षतके ऊपर स्थापित कर दे। वह वायु आदिके झोंकेसे
बुझ न जाय, इसकी सावधानीके साथ व्यवस्था करे। फिर स्वस्तिवाचनपूर्वक मंगलपाठ
एवं सर्वदेव-नमस्कार करके पूर्वोक्त महासंकल्प पढ़े। उसके बाद एक पात्रमें चावल
भरकर उसपर मोलीमें लपेटी हुई एक सुपारी रख दे और उसीमें गणेशजीका आवाहन
करे –

ॐ भूर्भुवः स्वः गणपते इहागच्छ इह तिष्ठ मम पूजां गृहाण ।

इस प्रकार आवाहन करके ‘गणानां त्वा०’ इत्यादि मन्त्रोंको पढ़े। फिर ‘गजाननं भूत०’ इत्यादि
श्लोकोंको पढ़ते हुए तदनुरूप ध्यान करे। ‘ॐ मनो जूतिः०’ इत्यादि मन्त्रसे प्रतिष्ठा
करके विभिन्न उपचारसमर्पणसम्बन्धी मन्त्र पढ़ते हुए अथवा ‘श्रीगणपतये नमः’ इस
मन्त्रका उच्चारण करते हुए गणेशजीको क्रमशः पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय, स्नानीय,
पुनराचमनीय, पंचामृतस्नान, शुद्धोदकस्नान, वस्त्र, रक्षासूत्र, यज्ञोपवीत, चन्दन, रोली,
सिन्दूर, अबीर, गुलाल, अक्षत, फूल, माला, दूर्वादल, आभूषण, सुगन्ध (इत्रका फाहा),
धूप, दीप, नैवेद्य (मिष्टान्न एवं गुड़, मेवा आदि) तथा ऋतुफल अर्पण करे। गंगाजलसे
आचमन कराकर मुखशुद्धिके लिये सुपारी, लवंग, इलायची और कर्पूरसहित ताम्बूल
अर्पण करे। अन्तमें दक्षिणा द्रव्य एवं विशेषार्घ्य, प्रदक्षिणा एवं साष्टांग प्रणाम निवेदन
करके प्रार्थना करे ।

ॐ लम्बोदरं परमसुन्दरमेकदन्तं
रक्ताम्बरं त्रिनयनं परमं पवित्रम् ।
उद्यद्दिवाकरकरोज्ज्वलकायकान्तं
विघ्नेश्वरं सकलविघ्नहरं नमामि ।।

त्वां देव विघ्नदलनेति च सुन्दरेति
भक्तप्रियेति सुखदेति फलप्रदेति ।
विद्याप्रदेत्यघहरेति च ये स्तुवन्ति
तेभ्यो गणेश वरदो भव नित्यमेव ।।

  • ‘अनया पूजया गणपतिः प्रीयतां न मम ।’
    यों कहकर गणेशजीको पुष्पांजलि दे ।

इसके बाद ‘ॐ भूर्भुवः स्वः भो ब्रह्मविष्णुशिवसहितसूर्यादिनवग्रहा
इहागच्छतेह तिष्ठत मम पूजां गृह्णीत’ इस प्रकार या वैदिक मन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक
ब्रह्मादिसहित नवग्रहोंका आवाहन करे। फिर पूर्ववत् उपचार मन्त्रोंसे अथवा ॐ ब्रह्मणे नमः, ॐ विष्णवे नमः, ॐ शिवाय नमः, ॐ सूर्याय नमः, ॐ चन्द्रमसे नमः, ॐ भौमाय नमः, ॐ बुधाय नमः, ॐ बृहस्पतये नमः, ॐ भार्गवाय नमः, ॐ
शनैश्चराय नमः, ॐ राहवे नमः, ॐ केतवे नमः- इन नाम-मन्त्रोंसे पाद्य, अर्घ्य आदि
सब उपचार समर्पण करके निम्नांकित मन्त्र पढ़कर प्रार्थना करे –

ॐ ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी
भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्च ।
गुरुश्च शुक्रः शनिराहुकेतवः
सर्वे ग्रहाः शान्तिकरा भवन्तु ।।

  • ‘अनया पूजया ब्रह्मविष्णुशिवसहित सूर्यादिनवग्रहाः प्रीयन्तां न मम ।’
    यों कहकर पुष्पांजलि चढ़ाये ।

तत्पश्चात् ‘ॐ भूर्भुवः स्वः भो गौर्यादिषोडशमातर इहागच्छत मम पूजां
गृह्णीत’ इस प्रकार आवाहन करके नाम-मन्त्रोंद्वारा पाद्य-अर्घ्य आदि निवेदन करे- १
ॐ गौर्यै नमः । २ ॐ पद्मायै नमः । ३ ॐ शच्यै नमः । ४ ॐ मेधायै नमः । ५ ॐ
सावित्र्यै नमः । ६ ॐ विजयायै नमः । ७ ॐ जयायै नमः । ८ ॐ देवसेनायै नमः ।
९ ॐ स्वधायै नमः । १० ॐ स्वाहायै नमः । ११ ॐ मातृभ्यो नमः । १२ ॐ
लोकमातृभ्यो नमः । १३ ॐ हृष्ट्यै नमः । १४ ॐ पुष्ट्यै नमः । १५ ॐ तुष्ट्यै नमः
। १६ ॐ आत्मकुलदेवतायै नमः ।। पूजनके पश्चात् प्रार्थना करे –

गौरी पद्मा शची मेधा सावित्री विजया जया ।
देवसेना स्वधा स्वाहा मातरो लोकमातरः ।।
हृष्टिः पुष्टिस्तथा तुष्टिरात्मनः कुलदेवता ।
इत्येता मातरः सर्वा वृद्धिं कुर्वन्तु मे सदा ।।

  • ‘अनया पूजया गौर्यादिषोडशमातरः प्रीयन्तां न मम ।’ इस प्रकार
    समर्पणपूर्वक पुष्पांजलि निवेदन करे ।

तदनन्तर ‘भो अश्वत्थामादिसप्तचिरजीविन इहागत्य मम पूजां गृह्णीत’ इस
प्रकार आवाहन करके पूर्ववत् नाममन्त्रसे पूजा करे-

१ ॐ अश्वत्थाम्ने नमः । २ ॐ बलये नमः । ३ ॐ व्यासाय नमः । ४ ॐ
हनुमते नमः । ५ ॐ विभीषणाय नमः । ६ ॐ कृपाय नमः । ७ ॐ परशुरामाय
नमः ।

पूजाके पश्चात् हाथमें फूल लेकर निम्नांकित रूपसे प्रार्थना करे –

अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः ।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविनः ।।
यजमानगृहे नित्यं सुखदाः सिद्धिदाः सदा ।।

  • ‘अनया पूजया अश्वत्थामादिसप्तचिरजीविनः प्रीयन्तां न मम ।’ यह
  • कहकर फूल चढ़ा दे।

इसके अनन्तर सर्वतोभद्रमण्डलस्थ देवताओंका आवाहन-पूजन
(देवपूजापद्धतियोंके अनुसार) करके मध्यमें ताम्रकलश स्थापित करे। उसकी संक्षिप्त
विधि यह है- ‘ॐ भूरसि०’ इत्यादि मन्त्रसे भूमिकी प्रार्थना करके हाथसे (कलशके
नीचेकी) भूमिका स्पर्श करे। उस समय ‘ॐ मही द्यौः पृथ्वी च न इमं यज्ञं
मिमिक्षताम् । पितृतान्नौ वरीमभिः ।।’ इस मन्त्रको पढ़ना चाहिये। उसी भूमिपर
कुंकुम आदिसे अष्टदल कमल बनाकर उसके ऊपर ‘ॐ धान्यमसि०’ इत्यादि मन्त्रसे
सप्तधान्य स्थापित करे। फिर उस सप्तधान्यपर कलश स्थापित करे; उस समय ‘ॐ
आजिघ्र कलश०’ इत्यादि मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये। इसके बाद ‘ॐ
वरुणस्योत्तम्भनमसि०’ इत्यादि मन्त्र पढ़ते हुए कलशको शुद्ध जलसे भर दे।
तत्पश्चात् ‘ॐ स्थिरो भव०’ इत्यादि मन्त्र पढ़कर कलशको ऐसा सुस्थिर कर दे,
जिससे वह हिलने-डुलने या गिरने लायक न रह जाय। फिर उस कलशके पूर्व भागमें
‘ॐ अग्निमीळे ०’ इत्यादि मन्त्रसे ऋग्वेदका, दक्षिण भागमें ‘ॐ इषे त्वोर्जेत्वा०’
इत्यादि मन्त्रसे यजुर्वेदका, पश्चिम भागमें ‘ॐ अग्न आयाहि वीतये०’ इत्यादि मन्त्रसे
सामवेदका तथा ‘ॐ शन्नो देवी०’ इत्यादि मन्त्रसे उत्तर भागमें अथर्ववेदका स्थापन
करे। पाँच कलश हों तो पृथक् पृथक् कलशोंपर वेदोंकी स्थापना करनी चाहिये। इसके
अनन्तर आम, बड़, पीपल, पाकर और गूलरके पल्लवोंको कलशमें डाले और ‘ॐ
अश्वत्थे०’ इत्यादि मन्त्रका पाठ करे। फिर ‘ॐ काण्डात्काण्डात् प्ररोहन्ती०’
इत्यादि मन्त्रसे कलशमें दूर्वादल छोड़े, ‘ॐ पवित्रे स्थो०’ इत्यादि मन्त्रसे कुशा, ‘ॐ
याः फलिनी०’ इत्यादि मन्त्रसे पूगीफल, ‘ॐ हिरण्यगर्भः०’ इत्यादि मन्त्रसे दक्षिणा,
‘ॐ परिवाजपतिः ०’ से पंचरत्न, ‘ॐ या ओषधीः ०’ इत्यादिसे सर्वोषधी, ‘ॐ
गन्धद्वारां०’ इत्यादिसे गन्ध और ‘ॐ अक्षन्नमीमदन्त०’ इत्यादिसे अक्षतको कलशमें
छोड़े। तदनन्तर ‘ॐ श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च०’ इत्यादिसे फूल छोड़े। ‘ॐ धूरसि०’
इत्यादिसे धूपकी आहुति अग्निमें छोड़े। ‘ॐ अग्निज्योतिः ०’ इत्यादि मन्त्रसे अलग
दीप जलाकर रख दे। उसके बाद कलशमें तीर्थोदक डाले और ‘ॐ पञ्चनद्यः०’
इत्यादि मन्त्रको पढ़े। फिर ‘ॐ उपह्वरे०’ इत्यादि मन्त्रसे नदी-संगमका जल डाले।
तत्पश्चात् ‘ॐ समुद्राय त्वा०’ इत्यादि मन्त्रसे समुद्रका जल कलशमें डाले। फिर ‘ॐ
स्योना पृथिवि०’ इत्यादिसे सप्तमृत्तिका डालकर ‘ॐ वसोः पवित्रमसि०’ इत्यादि
मन्त्रको पढ़ते हुए लाल वस्त्रसे कलशको आच्छादित करे। तदनन्तर ‘ॐ पूर्णादर्वि०’
इत्यादि मन्त्रसे एक पूर्णपात्र (चावलसे भरा हुआ काँसी या ताँबेका पात्र) कलशके
ऊपर रखे। इसके बाद ‘ॐ श्रीश्च ते०’ इत्यादि मन्त्रसे उस पूर्णपात्रपर लाल कपड़ेमें
लपेटा हुआ श्रीफल (गरीका गोला या नारियल) रखे। फिर हाथमें अक्षत ले ‘ॐ मनो
जूतिः०’ इत्यादि मन्त्र पढ़ते हुए कलशपर अक्षत छोड़े और इस प्रकार कलशकी
प्रतिष्ठा सम्पन्न करे। तदनन्तर ‘सर्वे समुद्राः सरितः ०’ इत्यादि श्लोकोंका पाठ करते
हुए कलशमें तीर्थोंका आवाहन करे। फिर गन्ध आदि उपचारोंसे तीर्थोंका पूजन करके
***** कलशकी प्रार्थना करे –

देवदानवसंवादे मथ्यमाने जलार्णवे ।
उत्पन्नोऽसि तदा कुम्भ विधृतो विष्णुना स्वयम् ।।
त्वत्तोये सर्वतीर्थानि देवाः सर्वे त्वयि स्थिताः ।
त्वयि तिष्ठन्ति भूतानि त्वयि प्राणाः प्रतिष्ठिताः ।।
शिवः स्वयं त्वमेवासि विष्णुस्त्वं च प्रजापतिः ।
आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवाः सपैतृकाः ।।
त्वयि तिष्ठन्ति सर्वेऽपि यतः कामफलप्रदाः ।
त्वत्प्रसादादिमं यज्ञं कर्तुमीहे जलोद्भव ।।
सान्निध्यं कुरु मे देव प्रसन्नो भव सर्वदा ।
ब्रह्मणैर्निर्मितस्त्वं हि मन्त्रैरेवामृतोद्भवैः ।।
प्रार्थयामि च कुम्भ त्वां वाञ्छितार्थं ददस्व मे ।
पुरा हि सृष्टश्च पितामहेन
महोत्सवानां प्रथमो वरिष्ठः ।
दूर्वाग्रसाश्वत्थसुपल्लवैर्युक्
करोतु शान्तिं कलशः सुवासाः ।।

इस प्रार्थनाके अनन्तर कलशमें ‘ॐ गणानां त्वा०’ इत्यादिसे गणेशका तथा ‘ॐ
तत्त्वायामि’ इत्यादि मन्त्रसे वरुणदेवताका आवाहन करके इनका षोडशोपचारसे
पूजन करे। पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय, स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, गन्ध, अक्षत, पुष्प, धूप,
दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, दक्षिणा, प्रदक्षिणा और पुष्पांजलि – ये ही षोडश उपचार कहे गये
हैं। पूजनके पश्चात् ‘अनया पूजया वरुणाद्यावाहितदेवताः प्रीयन्ताम्’ कहकर फूल
छोड़ दे ।

तदनन्तर कलशके ऊपर लक्ष्मीनारायणप्रतिमाको संस्कार करके स्थापित करे।
पुरुषसूक्तके षोडश मन्त्रोंसे षोडश-उपचार चढ़ाकर पूजन करे। साथ ही
शालग्रामजीकी भी पूजा करे। (षोडशोपचार पूजनविधि अन्यत्र इसीमें
‘श्रीम‌द्भागवतकी पूजनविधि’ शीर्षक लेखमें दी गयी है) पूजाके पश्चात् इस प्रकार
भगवान्से प्रार्थना करे-

ब्रह्मसत्रं, करिष्यामि तवानुग्रहतो विभो ।
तन्निर्विघ्नं भवेद्देव रमानाथ क्षमस्व मे ।।

  • ‘अनया पूजया लक्ष्मीसहितो भगवन्नारायणः प्रीयतां न मम ।’ यों कहकर
    पुष्पांजलि चढ़ाये। ऐसा ही सर्वत्र करे ।

इसके बाद ‘ॐ नरनारायणाभ्यां नमः’ इस मन्त्रसे भगवान् नर-नारायणका

आवाहन और पूजन करके इस प्रकार प्रार्थना करे –

यो मायया विरचितं निजमात्मनीदं
खे रूपभेदमिव तत्प्रतिचक्षणाय ।
एतेन धर्मसदने ऋषिमूर्तिनाद्य
प्रादुश्चकार पुरुषाय नमः परस्मै ।।

सोऽयं स्थितिव्यतिकरोपशमाय सृष्टान्
सत्त्वेन नः सुरगणाननुमेयतत्त्वः ।
दृश्याददभ्रकरुणेन विलोकनेन
यच्छ्रीनिकेतममलं क्षिपतारविन्दम् ।।

  • ‘अनया पूजया भगवन्तौ नरनारायणौ प्रीयेतां न मम ।’

तत्पश्चात् वक्ता और श्रोताओंके सब विकारोंको दूर करनेके लिये वायुदेवताका
आवाहन एवं पूजन करे- ‘ॐ वायवे सर्वकल्याणकर्ते नमः ।’ इस मन्त्रसे पाद्य आदि
निवेदन करके निम्नांकित रूपसे प्रार्थना करे –

करे-

अन्तः प्रविश्य भूतानि यो विभर्त्यात्मकेतुभिः ।
अन्तर्यामीश्वरः साक्षात् पातु नो यद्वशे स्फुटम् ।।

  • ‘अनया पूजया सर्वकल्याणकर्ता वायुः प्रीयतां न मम ।’

वायुकी पूजाके पश्चात् गुरुका ‘ॐ गुरवे नमः ।’ इस मन्त्रसे पूजन करके प्रार्थना

ब्रह्मस्थानसरोजमध्यविलसच्छीतांशुपीठस्थितं
स्फूर्जत्सूर्यरुचिं वराभयकरं कर्पूरकुन्दोज्ज्वलम् ।
श्वेतस्रग्वसनानुलेपनयुतं विद्युद्रुचा कान्तया
संश्लिष्टार्धतनुं प्रसन्नवदनं वन्दे गुरुं सादरम् ।।

  • ‘अनया पूजया गुरुदेवः प्रीयतां न मम।’

तदनन्तर श्वेतपुष्प आदिसे ‘ॐ सरस्वत्यै नमः ।’ इस मन्त्रद्वारा सरस्वतीका
पूर्ववत् पूजन करके प्रार्थना करे –

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना ।
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ।।

  • ‘अनया पूजया भगवती सरस्वती प्रीयतां न मम ।’

सरस्वतीपूजनके पश्चात् ‘ॐ शेषाय नमः’, ‘ॐ सनत्कुमाराय नमः’, ‘ॐ
सांख्यायनाय नमः,’ ‘ॐ पराशराय नमः’, ‘ॐ बृहस्पतये नमः,’ ‘ॐ मैत्रेयाय
****** नमः,’ ‘ॐ उद्धवाय नमः’ इन मन्त्रोंसे शेष आदिकी पूजा करके प्रार्थना करे-

शेषः सनत्कुमारश्च सांख्यायनपराशरौ ।
बृहस्पतिश्च मैत्रेय उद्धवश्चात्र कर्मणि ।।
प्रत्यूहवृन्दं सततं हरन्तां पूजिता मया ।

  • ‘अनया पूजया शेषसनत्कुमारसांख्यायनपराशरबृहस्पतिमैत्रेयोद्धवाः
    प्रीयन्तां न मम ।’

इसके बाद ‘ॐ त्रय्यारुणये नमः’, ‘ॐ कश्यपाय नमः,’ ‘ॐ रामशिष्याय
नमः,’ ‘ॐ अकृतव्रणाय नमः,’ ‘ॐ वैशम्पायनाय नमः’ ‘ॐ हारीताय नमः’ – इन
मन्त्रोंसे त्रय्यारुणि आदि छः पौराणिकोंकी पूर्ववत् पूजा करके प्रार्थना करे-

त्रय्यारुणिः कश्यपश्च रामशिष्योऽकृतव्रणः ।
वैशम्पायनहारीतौ षड् वै पौराणिका इमे ।।
सुखदाः सन्तु मे नित्यमनया पूजयार्चिताः ।

  • ‘अनया पूजया त्रय्यारुणिप्रभृतयः षट् पौराणिकाः प्रीयन्तां न मम ।’

तत्पश्चात् ‘ॐ भगवते व्यासाय नमः’ इस मन्त्रसे भगवान् व्यासदेवकी स्थापना
और पूजा करके इस प्रकार प्रार्थना करे –

नमस्तस्मै भगवते व्यासायामिततेजसे ।
पपुर्ज्ञानमयं सौम्या यन्मुखाम्बुरुहासवम् ।।

  • ‘अनया पूजया भगवान् व्यासः प्रीयतां न मम ।’

इसके बाद सप्ताहयज्ञके उपदेशक भगवान् सूर्यकी स्थापना करके प्रतिदिन
उनकी भी पूजा करे। उनकी पूजाका मन्त्र ‘ॐ सूर्याय नमः’ है। पूजनके पश्चात् इस
प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये ।

लोकेश त्वं जगच्चक्षुः सत्कर्म तव भाषितम् ।
करोमि तच्च निर्विघ्नं पूर्णमस्तु त्वदर्चनात् ।।

  • ‘अनया पूजया सप्ताहयज्ञोपदेष्टा भगवान् सूर्यः प्रीयतां न मम ।’

इसके बाद दशावतारोंकी तथा शुकदेवजीकी भी यथास्थान स्थापना करके पूजा
करनी चाहिये ।

तदनन्तर नारदपीठ और पुस्तकपीठ दोनोंकी एक ही साथ पूजा करे। पहले उन
दोनों पीठोंका जलसे अभिषेक करके उनपर चन्दनादिसे अष्टदल कमल बनावे। फिर
‘ॐ आधारशक्तये नमः’, ‘ॐ मूलप्रकृतये नमः’, ‘ॐ क्षीरसमुद्राय नमः’, ‘ॐ
श्वेतद्वीपाय नमः,’ ‘ॐ कल्पवृक्षाय नमः,’ ‘ॐ रत्नमण्डपाय नमः,’ ‘ॐ
रत्नसिंहासनाय नमः’ इन मन्त्रोंसे दोनों पीठोंमें आधारशक्ति आदिकी भावना करके
पूजा करे। फिर चारों दिशाओंमें पूर्वादिके क्रमसे ‘ॐ धर्माय नमः,’ ‘ॐ ज्ञानाय नमः,’
**** ‘ॐ वैराग्याय नमः,’ ‘ॐ ऐश्वर्याय नमः’ – इन मन्त्रोंद्वारा धर्मादिकी भावना एवं पूजा
करे। फिर पीठोंके मध्यभागमें ‘ॐ अनन्ताय नमः’ से अनन्तकी और ‘ॐ महापद्माय
नमः’ से महापद्मकी पूजा करे। फिर यह चिन्तन करे-उस महापद्मका कन्द
(मूलभाग) आनन्दमय है। उसकी नाल संवित्स्वरूप है, उसके दल प्रकृतिमय हैं, उसके
केसर विकृतिरूप हैं, उसके बीज पंचाशत् वर्णस्वरूप हैं- और उन्हींसे उस महापद्मकी
कर्णिका (गद्दी) विभूषित है। उस कर्णिकामें अर्कमण्डल, सोममण्डल और
वह्निमण्डलकी स्थिति है। वहीं प्रबोधात्मक सत्त्व, रज एवं तम भी विराजमान हैं। ऐसी
भावनाके पश्चात् उन सबकी पंचोपचारसे पूजा करे। मन्त्र इस प्रकार हैं- ‘ॐ
आनन्दमयकन्दाय नमः’, ‘ॐ संविन्नालाय नमः,’ ‘ॐ प्रकृतिमयपत्रेभ्यो नमः,’
‘ॐ विकृतिमयकेसरेभ्यो नमः,’ ‘ॐ पञ्चाशद्वर्णबीजभूषितायै कर्णिकायै
नमः’, ‘ॐ अं अर्कमण्डलाय नमः,’ ‘ॐ सं सोममण्डलाय नमः,’ ‘ॐ वं
वह्निमण्डलाय नमः,’ ‘ॐ सं प्रबोधात्मने सत्त्वाय नमः,’ ‘ॐ रं रजसे नमः,’ ‘ॐ
तं तमसे नमः’ । इन सबकी पूजाके पश्चात् कमलके सब ओर पूर्वादि आठों दिशाओंमें
क्रमशः ‘ॐ विमलायै नमः,’ ‘ॐ उत्कर्षिण्यै नमः,’ ‘ॐ ज्ञानायै नमः,’ ‘ॐ
क्रियाये नमः,’ ‘ॐ योगायै नमः,’ ‘ॐ प्रह्वयैनमः’, ‘ॐ सत्यायै नमः,’ ‘ॐ
ईशानायै नमः’ – इन मन्त्रोंद्वारा विमला आदि आठ शक्तियोंकी पूजा करे और
कमलके मध्यभागमें ‘ॐ अनुग्रहायै नमः’ से अनुग्रहा नामकी शक्तिकी पूजा करे।

तदनन्तर ‘ॐ नमो भगवते विष्णवे सर्वभूतात्मने वासुदेवाय पद्मपीठात्मने नमः’
इस मन्त्रसे सम्पूर्ण पद्मपीठका पूजन करके उसपर सुन्दर वस्त्र डाल दे और उसीके
ऊपर स्थापित करनेके लिये श्रीम‌द्भागवतकी पुस्तकको हाथमें लेकर ‘ॐ ध्रुवा
द्यौर्भुवा पृथिवी ध्रुवा सा पर्वता इमे । ध्रुवं विश्वमिदं जगत् ध्रुवो राजा विशामसि’
इस मन्त्रको पढ़ते हुए उक्त पीठपर स्थापित करे। फिर ‘ॐ मनो जूतिः०’ इस मन्त्रसे
पुस्तककी प्रतिष्ठा करके पुरुषसूक्तके षोडश मन्त्रोंद्वारा षोडशोपचार-विधिसे पूजा करे।
(यह विधि पहले ‘श्रीमद्भागवतकी पूजन विधि’ शीर्षक लेखमें दी गयी है।) तत्पश्चात्
द्वितीय पीठको श्वेत वस्त्रसे आच्छादित करके उसपर देवर्षि नारदको स्थापित करे और
‘ॐ सुरर्षिवरनारदाय नमः’ इस मन्त्रसे उनकी विधिवत् पूजा करके निम्नांकितरूपसे
प्रार्थना करे –

ॐ नमस्तुभ्यं भगवते ज्ञानवैराग्यशालिने ।
नारदाय सर्वलोकपूजिताय सुरर्षये ।।

  • ‘अनया पूजया देवर्षिनारदः प्रीयतां न मम ।’

इस प्रकार पूजनके पश्चात् यजमान पुष्प, चन्दन, ताम्बूल, वस्त्र, दक्षिणा, सुपारी
तथा रक्षासूत्र हाथमें लेकर ‘ॐ अद्यामुकगोत्रममुकप्रवरममुकशर्माणं
ब्राह्मणमेभिर्वरणद्रव्यैः सर्वेष्टदश्रीम‌द्भागवतवक्तृत्वेन भवन्तमहं वृणे’ – इस
प्रकार कहते हुए कथावाचक आचार्यका वरण करे। हाथमें ली हुई सब सामग्री उनको दे
दे। वह सब लेकर कथावाचक व्यास ‘वृतोऽस्मि’ यों कहें। इसके बाद पुनः उन्हीं सब

सामग्रियोंको हाथमें लेकर जप और पाठ करनेवाले ब्राह्मणोंका वरण करे। इसके लिये
संकल्पवाक्य इस प्रकार है- ‘अद्याहममुकगोत्रानमुकप्रवरानमुकशर्मणो
यथासंख्याकान् ब्राह्मणानेभिर्वरणद्रव्यैर्गाथाविघ्नापनोदार्थं
गणेशगायत्रीवासुदेवमन्त्रजपकर्तृत्वेन गीताविष्णुसहस्रनामपाठकर्तृत्वेन च वो
विभज्य वृणे ।’ इस प्रकार संकल्प करके प्रत्येक ब्राह्मणको वरण-सामग्री अर्पित करे।

सामग्री लेकर वे ब्राह्मण कहें ‘वृताः स्मः’ । इसके बाद पहले कथावाचक आचार्यके
हाथमें दिये हुए रक्षासूत्रको लेकर उन्हींके हाथमें बाँध दे। उस समय आचार्य निम्नांकित
मन्त्रका पाठ करें-

व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाऽऽप्नोति दक्षिणाम् ।
दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते ।।

रक्षा बाँधनेके अनन्तर यजमान उनके ललाटमें कुंकुम (रोली) और अक्षतसे
तिलक करे। इसी प्रकार जपकर्ता ब्राह्मणोंके हाथोंमें भी रक्षा बाँधकर तिलक करे।

तदनन्तर पीले अक्षत लेकर यजमान चारों दिशाओंमें रक्षाके लिये बिखेरे। उस समय
निम्नांकित मन्त्रोंका पाठ भी करे –

पूर्वे नारायणः पातु वारिजाक्षश्च दक्षिणे ।
पश्चिमे पातु गोविन्द उत्तरे मधुसूदनः ।।

ऐशान्यां वामनः पातु चाग्नेय्यां च जनार्दनः ।
नैर्ऋत्यां पद्मनाभश्च वायव्यां माधवस्तथा ।।

ऊर्ध्वं गोवर्धनधरो ह्यधस्ताच्च त्रिविक्रमः ।
रक्षाहीनं तु यत्स्थानं तत्सर्वं रक्षतां हरिः ।।

इसके बाद वक्ता आचार्य यजमानके हाथमें –

येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः ।
तेन त्वां प्रतिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल ।।

इस मन्त्रको पढ़कर रक्षा बाँधे और –

आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवा मरुद्गणाः ।
तिलकं ते प्रयच्छन्तु धर्मकामार्थसिद्धये ।।

  • इस मन्त्रसे उसके ललाटमें तिलक कर दे। फिर यजमान व्यासासनकी चन्दन-
    पुष्प आदिसे पूजा करे। पूजनका मन्त्र इस प्रकार है- ‘ॐ व्यासासनाय नमः’ ।

तदनन्तर कथावाचक आचार्य ब्राह्मणों और वृद्ध पुरुषोंकी आज्ञा लेकर विप्रवर्गको
नमस्कार और गुरु-चरणोंका ध्यान करके व्यासासनपर बैठे। मन-ही-मन गणेश और
नारदादिका स्मरण एवं पूजन करें। इसके बाद यजमान ‘ॐ नमः पुराणपुरुषोत्तमाय’
इस मन्त्रसे पुनः पुस्तककी गन्ध, पुष्प, तुलसीदल एवं दक्षिणा आदिके द्वारा पूजा करे।

फिर गन्ध, पुष्प आदिसे वक्ताका पूजन करते हुए निम्नांकित श्लोकका पाठ करे-

**** जयति पराशरसूनुः सत्यवतीहृदयनन्दनो व्यासः ।
यस्यास्यकमलगलितं वाड्मयममृतं जगत्पिबति ।।

तत्पश्चात् नीचे लिखे हुए श्लोकोंको पढ़कर प्रार्थना करे-

शुकरूप प्रबोधज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ।
एतत्कथाप्रकाशेन मदज्ञानं विनाशय ।।

संसारसागरे मग्नं दीनं मां करुणानिधे ।
कर्ममोहगृहीताङ्गं मामुद्धर भवार्णवात् ।।

इस प्रकार प्रार्थना करनेके पश्चात् निम्नांकित श्लोक पढ़कर श्रीमद्भागवतपर
पुष्प, चन्दन और नारियल आदि चढ़ाये-

श्रीमद्भागवताख्योऽयं प्रत्यक्षः कृष्ण एव हि ।
स्वीकृतोऽसि मया नाथ मुक्त्यर्थं भवसागरे ।।

मनोरथो मदीयोऽयं सफलः सर्वथा त्वया ।
निर्विघ्नेनैव कर्तव्यो दासोऽहं तव केशव ।।

कथा-मण्डपमें वायुरूपधारी आतिवाहिक शरीरवाले जीवविशेषके लिये सात
गाँठके एक बाँसको भी स्थापित कर देना चाहिये ।

तत्पश्चात् वक्ता भगवान्‌का स्मरण करके उस दिन श्रीमद्भागवतमाहात्म्यकी
कथा सब श्रोताओंको सुनाये और दूसरे दिनसे प्रतिदिन देवपूजा, पुस्तक तथा व्यासकी
पूजा एवं आरती हो जानेके पश्चात् वक्ता कथा प्रारम्भ करे। सन्ध्याको कथाकी समाप्ति
होनेपर भी नित्यप्रति पुस्तक तथा वक्ताकी पूजा तथा आरती, प्रसाद एवं तुलसीदलका
वितरण, भगवन्नामकीर्तन एवं शङ्खध्वनि करनी चाहिये। कथाके प्रारम्भमें और बीच-
बीचमें भी जब कथाका विराम हो तो समयानुसार भगवन्नामकीर्तन करना चाहिये ।

वक्ताको चाहिये कि प्रतिदिन पाठ प्रारम्भ करनेसे पूर्व एक सौ आठ बार ‘ॐ नमो
भगवते वासुदेवाय’ इस द्वादशाक्षरमन्त्रका अथवा ‘ॐ क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय
गोपीजनवल्लभाय स्वाहा’ इस गोपालमन्त्रका जप करे। इसके बाद निम्नांकित वाक्य
पढ़कर विनियोग करे-

ॐ अस्य श्रीमद्भागवताख्यस्तोत्रमन्त्रस्य नारदऋषिः बृहतीच्छन्दः
श्रीकृष्णपरमात्मा देवता ब्रह्मबीजं भक्तिः शक्तिः ज्ञानवैराग्यकीलकं मम
श्रीमद्भगवत्प्रसादसिद्ध्यर्थे पाठे विनियोगः ।

विनियोगके पश्चात् निम्नांकित रूपसे न्यास करे-

ऋष्यादिन्यासः – नारदर्षये नमः शिरसि । बृहतीच्छन्दसे नमः मुखे ।
श्रीकृष्णपरमात्मदेवतायै नमः हृदि । ब्रह्मबीजाय नमः गुह्ये । भक्तिशक्तये नमः
पादयोः 1 ज्ञानवैराग्यकीलकाभ्यां नमः
श्रीमद्भगवत्प्रसादसिद्ध्यर्थकपाठविनियोगाय नमः सर्वांगे ।

****** द्वादशाक्षरमन्त्रसे करन्यास और अंगन्यास करना चाहिये अथवा नीचे लिखे
अनुसार उसका सम्पादन करना चाहिये –

करन्यासः – ॐ क्लां अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । ॐ क्लीं तर्जनीभ्यां नमः । ॐ क्लूं
मध्यमाभ्यां नमः । ॐ क्लें अनामिकाभ्यां नमः । ॐ क्लौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
ॐ क्लः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।

अङ्गन्यासः – ॐ क्लां हृदयाय नमः । ॐ क्लीं शिरसे स्वाहा । ॐ क्लूं
शिखायै वषट् । ॐ क्लै कवचाय हुम् । ॐ क्लौं नेत्रत्रयाय वौषट् । ॐ क्लः
अस्त्राय फट् ।

इसके बाद निम्नांकित रूपसे ध्यान करे-

कस्तूरीतिलकं ललाटपटले वक्षःस्थले कौस्तुभं
नासाग्रे वरमौक्तिकं करतले वेणुः करे कङ्कणम् ।
सर्वाङ्गे हरिचन्दनं सुललितं कण्ठे च मुक्तावली
गोपस्त्रीपरिवेष्टितो विजयते गोपालचूडामणिः ।।

अस्ति स्वस्तरुणीकराग्रविगलत्कल्पप्रसूनाप्लुतं
वस्तु प्रस्तुतवेणुनादलहरीनिर्वाणनिर्व्याकुलम् ।
स्रस्तस्रस्तनिबद्धनीविविलसद्‌गोपीसहस्रावृतं
हस्तन्यस्तनतापवर्गमखिलोदारं किशोराकृतिः ।।

इस प्रकार ध्यानके पश्चात् कथा प्रारम्भ करनी चाहिये। सूर्योदयसे आरम्भ करके
प्रतिदिन साढ़े तीन प्रहरतक कथा बाँचनी चाहिये। मध्याह्नमें दो घड़ी कथा बंद रखनी
चाहिये। प्रातःकालसे मध्याह्नतक मूलका पाठ होना चाहिये और मध्याह्नसे सन्ध्यातक
उसका संक्षिप्त भावार्थ अपनी भाषामें कहना चाहिये। मध्याह्नमें विश्रामके समय तथा
रात्रिके समय भगवन्नाम-कीर्तनकी व्यवस्था होनी चाहिये ।

श्रोताओंके स्थान – वक्ताके सामने श्रोताओंके बैठनेके लिये आगे-पीछे सात
पंक्तियाँ बना लेनी चाहिये। पहली पंक्तिका नाम सत्यलोक है, इसमें साधु-संन्यासी,
विरक्त, वैष्णव आदिको बैठाना चाहिये। दूसरी पंक्ति तपोलोक कहलाती है, इसमें
वानप्रस्थ श्रोताओंको बैठाना चाहिये। तीसरी पंक्तिको जनलोक नाम दिया गया है,
इसमें ब्रह्मचारी श्रोता बैठाये जाने चाहिये। चौथी पंक्ति महर्लोक कही गयी है, यह
ब्राह्मण श्रोताओंका स्थान है। पाँचवीं पंक्तिको स्वर्लोक कहते हैं। इसमें क्षत्रिय
श्रोताओंको बैठाना चाहिये। छठी पंक्तिका नाम भुवर्लोक है, जो वैश्य श्रोताओंका स्थान
है। सातवीं पंक्ति भूर्लोक मानी गयी है, उसमें शूद्रजातीय श्रोताओंको बैठाना चाहिये।
स्त्रियाँ वक्ताके वामभागकी भूमिपर कथा सुनें। ये स्थान उन लोगोंके लिये नियत किये
गये हैं, जो प्रतिदिन नियमपूर्वक कथा सुनते हैं। जो श्रोता कथा प्रारम्भ होनेपर कुछ
समयके लिये अनियमितरूपसे आते हैं, उनके लिये वक्त्ताके दक्षिण भागमें स्थान रहना

श्रोताओंके नियम – श्रोता प्रतिदिन एक बार हविष्यान्न भोजन करें। पतित,
दुर्जन आदिका संग तो दूर रहा, उनसे वार्तालाप भी न करें। ब्रह्मचर्यपालन, भूमिशयन
(नीचे आसन बिछाकर या तख्तपर सोना) सबके लिये अनिवार्य है। एकाग्रचित्त होकर
कथा सुननी चाहिये। जितने दिन कथा सुनें- धन, स्त्री, पुत्र, घर एवं लौकिक लाभकी
समस्त चिन्ताएँ त्याग दें। मल-मूत्रपर काबू रखनेके लिये हलका आहार सुखद होता है।
यदि शक्ति हो तो सात दिनतक उपवास करके कथा सुनें। अन्यथा दूध पीकर सुखपूर्वक
कथा सुनें। इससे भी काम न चले तो फलाहार या एक समय अन्न-भोजन करें। जिस
तरह भी सुखपूर्वक कथा सुननेकी सुविधा हो, वैसे कर लें। प्रतिदिन कथा समाप्त
होनेपर ही भोजन करना उचित है। दाल, शहद, तेल, गरिष्ठ अन्न, भावदूषित अन्न तथा
बासी अन्नका परित्याग करें। काम, क्रोध, मद, मान, ईर्ष्या, लोभ, दम्भ, मोह तथा द्वेषसे
दूर रहें। वेद, वैष्णव, ब्राह्मण, गुरु, गौ, व्रती, स्त्री, राजा तथा महापुरुषोंकी कभी
भूलकर भी निन्दा न करें। रजस्वला, चाण्डाल, म्लेच्छ, पतित, व्रतहीन, ब्राह्मणद्रोही
तथा वेद-बहिष्कृत मनुष्योंसे वार्तालाप न करें। मनमें सत्य, शौच, दया, मौन, सरलता,
विनय तथा उदारताको स्थान दें। श्रोताओंको वक्तासे ऊँचे आसनपर कभी नहीं बैठना
चाहिये ।

कुछ विशेष बातें – प्रत्येक स्कन्धकी समाप्ति होनेपर चन्दन, पुष्प, नैवेद्य
आदिसे पुस्तककी पूजा करके आरती उतारनी चाहिये। शुकदेवजीके आगमन तथा
श्रीकृष्णके प्राकट्यका प्रसंग आनेपर भी आरती करनी चाहिये। बारहवें स्कन्धकी
समाप्ति होनेपर पुस्तक और वक्ताका भक्तिपूर्वक पूजन करना चाहिये। वक्ता गृहस्थ हों
तो, उन्हें अपनी शक्तिके अनुसार उदारतापूर्वक वस्त्राभूषण तथा नकद रुपये भेंट देने
चाहिये। मृदंग आदि बजाकर जोर-जोरसे कीर्तन करना चाहिये। जय-जयकार,
नमस्कार और शंखनाद करने चाहिये। ब्राह्मणों और याचकोंको अन्न एवं धन देना
चाहिये। वक्ताके हाथोंसे श्रोताओंको प्रसाद एवं तुलसीदल मिलने चाहिये। प्रतिदिन
कथाके प्रारम्भ और अन्तमें आरती होनी आवश्यक है। (श्रीमद्भागवतकी आरती
इसीमें अन्यत्र दी गयी है।)

कथाका विश्राम प्रतिदिन नियत स्थलपर ही करना चाहिये। प्रथम दिन मनु-कर्दम-
संवादतक। दूसरे दिन भरत-चरित्रतक। तीसरे दिन सातवें स्कन्धकी समाप्तितक। चौथे
दिन श्रीकृष्णके प्राकट्यतक। पाँचवें दिन रुक्मिणी-विवाहतक और छठे दिन
हंसोपाख्यानतककी कथा बाँचकर, सातवें दिन अवशिष्ट भागको पूर्ण कर देना
चाहिये।* स्कन्धके आदि और अन्तिम श्लोकको कई बार उच्च स्वरसे पढ़ना चाहिये।
कथा-समाप्तिके दूसरे दिन वहाँ स्थापित हुए सम्पूर्ण देवताओंका पूजन करके हवनकी
वेदीपर पंचभूसंस्कार, अग्निस्थापन एवं कुशकण्डिका करे। फिर विधिपूर्वक वृत
ब्राह्मणोंद्वारा हवन, तर्पण एवं मार्जन कराकर श्रीम‌द्भागवतकी शोभायात्रा निकाले
और ब्राह्मण-भोजन कराये। मधु-मिश्रित खीर और तिल आदिसे भागवतके श्लोकोंका
*** दशांश (अर्थात् १,८००) आहुति देनी चाहिये। खीरके अभावमें तिल, चावल, जौ, मेवा,
शुद्ध घी और चीनीको मिलाकर हवनीय पदार्थ तैयार कर लेना चाहिये। इसमें सुगन्धित
पदार्थ (कपूर-काचरी, नागरमोथा, छड़छड़ीला, अगर-तगर, चन्दनचूर्ण आदि) भी
मिलाने चाहिये। पूर्वोक्त अठारह सौ आहुति गायत्री मन्त्र अथवा दशम-स्कन्धके प्रति
श्लोकसे देनी चाहिये। हवनके अन्तमें दिक्पाल आदिके लिये बलि, क्षेत्रपाल-पूजन,
छायापात्र-दान, हवनका दशांश तर्पण एवं तर्पणका दशांश मार्जन करना चाहिये। फिर
आरतीके पश्चात् किसी नदी, सरोवर या कूपादिपर जाकर अवभृथस्नान (यज्ञान्त-स्नान)
भी करना चाहिये। इसके लिये समूहके साथ शोभायात्रा निकालकर गाजे-बाजेके साथ
कीर्तन करते हुए जाना चाहिये। यजमान श्रीम‌द्भागवतग्रन्थको अपने मस्तकपर
रखकर उसकी शोभायात्रा निकाले, जिसमें वक्ता तथा सब श्रोता सम्मिलित हों।
हरिकीर्तन होता चले। भागवत ग्रन्थपर चॅवर डुलते रहें। घड़ियाल, घण्टा, झाँझ, शंख
आदि बाजे बजते रहें। जो पूर्ण हवन करनेमें असमर्थ हो, वह यथाशक्ति हवनीय पदार्थ
दान करे। अन्तमें कम-से-कम बारह ब्राह्मणोंको मधुयुक्त खीरका भोजन कराना
चाहिये। व्रतकी पूर्तिके लिये सुवर्ण-दान और गोदान करना चाहिये। सिंहासनपर
विराजित सुन्दर अक्षरोंमें लिखित श्रीमद्भागवतकी पूजा करके उसे दक्षिणासहित
कथावाचक आचार्यको दान कर देना चाहिये। अन्तमें सब प्रकारकी त्रुटियोंकी पूर्तिके
लिये विष्णुसहस्रनामका पाठ कथावाचक आचार्यके द्वारा सुनना चाहिये। विरक्त
श्रोताओंको ‘गीता’ सुननी चाहिये ।

संतानकी इच्छासे प्रयोग करना हो तो संकल्पके उद्देश्यमें इस प्रकार
योजना कर लेनी चाहिये।

‘अतीतानन्तजन्मसम्पादितदुष्कृतपरिपाकवशप्राप्तजन्माङ्गक्रूरग्रहसूचितपत्नीवन्ध्य
सद्‌गुणसम्पन्नचिरञ्जीविस्वस्थसुन्दरसुपुत्रप्राप्तये च….. ।’

यदि किसी मृत व्यक्तिकी सद्गतिके उद्देश्यसे भागवत सप्ताह करना हो तो
संकल्पके उद्देश्यमें इस प्रकार योजना कर ले-

पितृणाम्

‘स्वीयानन्तदुष्कृतपरिपाकवशान्नानाविधदुःखक्षेत्रयोनिनाम्
अमुकामुकशर्मणाम् (योनेः पितुः अमुकशर्मणः अन्यस्य वा कस्यचित्)
प्रेतत्वनिवृत्तिपूर्वकमुत्तमवैकुण्ठधामोपलब्धये………… ।’

इसी प्रकार आवश्यकताके अनुसार अन्यान्य उद्देश्यकी भी योजना कर लेनी
चाहिये।

मनुकर्दमसंवादपर्यन्तं प्रथमेऽहनि । भरताख्यानपर्यन्तं द्वितीयेऽहनि
वाचयेत् ।।

*** तृतीये दिवसे कुर्यात् सप्तमस्कन्धपूरणम् । कृष्णाविर्भावपर्यन्तं चतुर्थे दिवसे
वदेत् ।।

रुक्मिण्युद्वाहपर्यन्तं पञ्चमेऽहनि शस्यते । श्रीहंसाख्यानपर्यन्तं षष्ठेऽहनि
वदेत् सुधीः ।।

सप्तमे तु दिने कुर्यात् पूर्ति भागवतस्य वै। एवं निर्विघ्नतासिद्धिर्विपर्यय
इतोऽन्यथा ।।

सप्ताह-कथाके प्रारम्भमें संग्रहणीय सामग्रीकी सूची

पूजन-सामग्री
गंगाजल, रोली (कुंकुम), मोली (रक्षासूत्र), चन्दन, शुद्ध केसर, कपूर, पुष्प, पुष्पमाला,
तुलसीदल, बिल्वपत्र, दूर्वादल, धूप, शुद्ध अगरबत्ती, पंचामृत (दूध ऽ ।, दही ऽ =, मधु दो पैसे
भर, चीनी ऽ =, घी छटाँक भर), दीप (यथासम्भव शुद्ध, गोघृत और रूई), पानका पत्ता
पचास, सुपारी पचीस, यज्ञोपवीत पचीस, इलायची, लौंग, पेड़ा ऽ ।।, मेवा ऽ ।।, गुड़ ऽ ।,
चावल ऽ ।, गेहूँ ९५, कुण्डे मिट्टीके दो गेहूँ बोनेके लिये, पीली सरसों, अबीर, गुलाल, ऋतुफल

  • केला-संतरा आदि, कपड़ा सफेद ५ गज, कपड़ा लाल ५ गज, कपड़ा पीला ५ गज, कपड़ा
    शुद्ध रेशमी १३ गज, सर्वतोभद्रकी रचनाके लिये हरा, लाल, काला, पीला और गुलाबी रंग,
    गोबर, नारियल दो या सात, शुद्ध इत्र, कुशा, सिन्दूर, रुपये-रेजगी-पैसे, आरतीका पात्र,
    घण्टा, घड़ियाल, शंख झाँझ आदि, कोसा पचास, दियासलाई, चौकी एक सर्वतोभद्रके लिये,
    चौकी एक नारदजीके लिये, चौकी एक नवग्रह, षोडशमातृका और गणेशके लिये, चौकी एक
    व्यास, शुकदेव, सप्त-चिरजीवी तथा पौराणिकोंके लिये, पाटा एक शेष-सनत्कुमारादिके
    लिये ।

कलशस्थापनकी सामग्री
कलश ताँबेका एक, ताँबे या काँसीका पात्र एक, कलश मिट्टीके पाँच, सप्तधान्य (जौ,
गेहूँ, धान, तिल, कँगनी, साँवा, चना), पंचपल्लव (आम, पीपल, पाकर, गूलर और बड़के
पत्ते) दूर्वा, कुशा, सुपारी, दक्षिणा, चन्दन, अक्षत, फूल, तीर्थोदक, समुद्रजल, सप्तमृत्तिका
(घुड़सालकी, हाथीशालाकी, दीमककी, नदी-संगमकी, राजद्वारकी, गोशालाकी, तालाबकी),
सर्वोषधि (कूट, जटामाशी, हल्दी गाँठ २, राभट, मुरा, शैलेभ, चन्दन, बचा, चम्पक और
नागरमोथा – अभावमें केवल हल्दी), नदीसंगमका जल, श्रीलक्ष्मी-नारायणकी प्रतिमा ।

कथामण्डपके लिये सामग्री
चंदोवेका कपड़ा, चौकोर मण्डप, केलेके खम्भे चार, बाँसके खम्भे, मण्डपको चारों
ओरसे माला, फूल और पत्तोंसे सजाना, चारों दिशाओंमें झंडी लगाना, वस्त्र और गोटे आदिसे
सजाना, चौकी व्यासके लिये, गद्दी, मसनद, तकिये, कम्बल, चद्दर, पाँच झंडियाँ, पुस्तकका
वेष्टन, पुस्तकके लिये चौकी, आमके पत्तोंके बंदनवार ।

गणेशजी, देवता, श्रीम‌द्भागवत और आचार्यकी पूजाके लिये प्रतिदिन चन्दन, पुष्प,
पुष्पमाला, धूप, दीपादि सामग्री ।

वरणकी सामग्री
वक्ताके लिये चादर, धोती, गमछा, आसन, दक्षिणा, तुलसीमाला, जलपात्र आदि, जप
*** करनेवालोंके लिये भी यथासम्भव वस्त्र-द्रव्य आदि।

पाठके लिये पुस्तक
भागवत, रामायण, गीता, सहस्रनाम आदि ।

हवनके लिये सामग्री
वेदीके लिये स्वच्छ बालू एक बोरा, सूखी आमकी लकड़ी दो मन, कुशकण्डिकाके लिये
कुशा, दूर्वा, अग्नि लानेके लिये दो कांस्यपात्र, एक पूर्णपात्र पीतलका बड़ा-सा, यज्ञपात्र-
प्रणीता, प्रोक्षणी, सुवा, सुक्, पूर्णाहुतिपात्र, चरुस्थाली, आज्यस्थाली (काँसीका बड़ा-सा
कटोरा), हवनीय पदार्थ – मधुमिश्रित खीर, छायापात्र-दानके लिये काँसेकी छोटी एक कटोरी
तथा उसके लिये घी ।

तिल १० सेर, चावल ५ सेर, जौ १३ सेर शुद्ध घी ४ सेर, शुद्ध चीनी १३ सेर, पंचमेवा २
सेर (पिश्ता, बादाम, किशमिश अखरोट और काँजू) – इन सबको मिलाकर हवनसामग्री
बनायी जाती है। फिर इसमें सुगन्धित द्रव्य (कपूरकाचरी, छड़छड़ीला, नागरमोथा, अगर-
तगर, चन्दनचूर्ण आदि) आवश्यकतानुसार मिला देने चाहिये। बलिके लिये पापड़, उड़द,
दही, चावल, रूईकी बत्ती, दक्षिणा, क्षेत्रपाल बलिके लिये हँड़िया, काजल, सिंदूर, दीपक,
दक्षिणा आदि। पूर्णाहुतिके लिये नारियलका गोला इत्यादि, वितरणके लिये प्रसाद। ब्राह्मण-
भोजनके लिये मधुमिश्रित खीर तथा अन्यान्य मधुर पकवान, पूरी-साग आदि। हवनकर्ता
ब्राह्मणोंके लिये वरण और दक्षिणा आदि ।

कथा-समाप्तिके पश्चात् कथावाचकको भेंट देनेके लिये वस्त्र, आभूषण, नकद रुपये
आदि ।

*** वन्दनम्

सर्गस्थितिनिरोधार्थं कामाकाममयो हि यः ।
तं कामं कामकामघ्नं कामाभावाय कामये ।।

यत्कामिनीकेलिकलापकुण्ठितः कामोऽप्यकामा विमदो बभूव ह ।
तं मानिनीमानदमानदं सदा श्रीमोहनं मोहनमानतोऽस्म्यहम् ।।

यस्याङ्घ्रिपङ्कजपरागपरप्रभावाद् भूत्वा कृती कृतिमतां सृतिमाचरामि ।
तं सद्‌गुरुं सततसर्वसुखं सदग्रयं वन्दे सदा विमलबोधघनं विचित्रम् ।।

व्यासं व्यासकरं वन्दे मुनिं नारायणं स्वयम् ।
यतः प्राप्तकृपालोका लोका मुक्ताः कलेग्रहात् ।।

यस्य तुण्डाच्च्युतश्रूतो राजतेऽयं रसात्मकः ।
तमच्युतकथाकुञ्ज सुकूजन्तं शुकं भजे ।।

श्रीधरं श्रीधरं वन्दे श्रीधरैकपरायणम् ।
यस्यैव श्रीप्रसादेन श्रीधरेयं कृतिः कृता ।।

राधा भक्तिर्हरिर्ज्ञानं ताभ्यां या च समन्विता ।
तां श्रीभागवतीं गाथां वन्दे युगलरूपिणीम् ।।

***** ।। श्रीहरिः ।।

श्रीम‌द्भागवतकी आरती

आरति अतिपावन पुरानकी ।
धर्म-भक्ति-विज्ञान-खानकी ।। टेक ।।

महापुरान भागवत निरमल ।
शुक-मुख-विगलित निगम-कल्प-फल ।
परमानन्द-सुधा-रसमय कल ।
लीला-रति-रस रसनिधानकी ।। आरति० ।।

कलि-मल-मथनि त्रिताप-निवारिनि ।
जन्म-मृत्युमय भव-भय-हारिनि ।
सेवत सतत सकल सुख-कारिनि ।
सुमहौषधि हरि-चरित-गानकी ।। आरति ० ।।

विषय-विलास-विमोह-विनाशिनि ।
विमल विराग विवेक विकाशिनि ।
भगवत्-तत्त्व-रहस्य-प्रकाशिनि ।
परम ज्योति परमात्म-ज्ञानकी ।। आरति०।।

परमहंस-मुनि-मन उल्लासिनि ।
रसिक-हृदय रस-रास विलासिनि ।
भुक्ति मुक्ति रति प्रेम सुदासिनि ।
कथा अकिञ्चनप्रिय सुजानकी ।। आरति ० ।।

भागवत सप्ताह पूजन मन्त्र विधि shrimad bhagwat pujan vidhi
भागवत सप्ताह पूजन मन्त्र विधि shrimad bhagwat pujan vidhi

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