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panchdev puja mantra पंचदेव पूजा मंत्र

On: March 22, 2026 9:15 AM
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panchdev puja mantra पंचदेव पूजा मंत्र

गृह-मन्दिर में पञ्चदेव-पूजा एवं मानसपूजा विधि

यहाँ सामान्य रूप से पूजा की विधि दी जा रही है। साथ-साथ नाम-मंत्र भी हैं। जो श्लोकों का उच्चारण न कर सकें, वे उपयोगी नाम-मंत्रों से षोडशोपचार पूजन करें।

पूजा प्रवेश एवं प्रारंभिक विधि

यदि गृह का मन्दिर हो तो पूजागृह में प्रवेश करने से पहले बाहर दरवाजे पर ही पूर्वोक्त विधि से आचमन कर लें और तीन तालियाँ बजाएँ, तत्पश्चात् मन्दिर में प्रवेश करें। ताली बजाने वाले पहले निम्नलिखित विनियोग सहित मंत्र पढ़ें:

विनियोग – अपसर्पन्त्विति मन्त्रस्य वामदेव ऋषिःशिवो देवताअनुष्टुप् छन्दःभूतादिविघ्नोत्सादने विनियोगः

भूतोत्सादन मन्त्र –
ॐ अपसर्पन्तु ते भूता ये भूता भूतले स्थिताः ।
ये भूता विघ्नकर्तारस्ते नश्यन्तु शिवाज्ञया ।।

पश्चात् देवताओं का ध्यान करें, साष्टाङ्ग प्रणाम करें। बाद में विनियोग और मंत्र का अनुसरण करते हुए आसन पर बैठें और जल से आसन पवित्र करें।

आसन पवित्र करने का विनियोग एवं मन्त्र –
ॐ पृथ्वीति मन्त्रस्य मेरुपृष्ठ ऋषिःसुतलं छन्दःकूर्मो देवताआसन पवित्रकरणे विनियोगः

ॐ पृथ्वि त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता ।
त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम् ॥


पूजा की बाहरी तैयारी

बैठने के पूर्व पूजा की आवश्यक तैयारी कर लें। ताजे जल को कपड़े से छानकर कलश में भरें। आचमनी से शङ्ख में भी जल डालकर पीठ पर रख दें। शङ्ख को जल में डुबाना मना है। इसी तरह शङ्ख को पृथ्वी पर रखना भी मना है।

  • बासी जल का निषेध है – ‘जलं पर्युषितं त्याज्यम् ।’ (शिवरहस्य)
  • अपवाद – किंतु गङ्गाजल या तीर्थजल में बासी का दोष नहीं होता ‘गाङ्गं वारि न दुष्यति ।’ (शिवरहस्य)

शङ्ख में चन्दन और फूल छोड़ दें। उदकुम्भ (कलश) के जल को भी सुवासित करने के लिए कपूर और केसर के साथ चन्दन घिसकर मिला दें या पवित्र इत्र डाल दें। अक्षत को केसर या रोली से हल्का रंग दें।

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panchdev puja mantra पंचदेव पूजा मंत्र
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पूजा-सामग्री के रखने का प्रकार

पूजन की किस वस्तु को किधर रखना चाहिए, इस बात का भी शास्त्र ने निर्देश दिया है। इसके अनुसार वस्तुओं को यथास्थान सजा देना चाहिए।

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  • बायीं ओर –
    1. सुवासित जल से भरा उदकुम्भ (जलपात्र)
    2. घण्टा
    3. धूपदानी
    4. तेल का दीपक भी बायीं ओर रखें।
  • दायीं ओर –
    1. घृत का दीपक
    2. सुवासित जल से भरा शङ्ख
  • सामने –
    1. कुङ्कुम (केसर) और कपूर के साथ घिसा गाढ़ा चन्दन
    2. पुष्प आदि हाथ में रखें तथा चन्दन ताम्रपात्र में न रखें।

शास्त्रीय निर्देश:

  • १- शङ्ख का पृष्ठभाग शुद्ध नहीं माना गया है। इसलिए शङ्ख को जल में न डुबाएँ, आचमनी से उसमें जल भरें –
    • उद्धरिण्या जलं ग्राह्य जले शङ्ख न मज्जयेत् ।
    • शङ्खस्य पृष्ठसंलग्नं जलं पापकरं ध्रुवम् ।।
  • २-यः शङ्ख भुवि संस्थाप्य पूजयेत् पुरुषोत्तमम् ।
    • तस्य पूजां न गृह्णाति तस्मात् पीठं प्रकल्पयेत् ।।
  • ३- सुवासितजलैः पूर्णं सव्ये कुम्भं प्रपूजयेत् । (पूजाप्रकाश)
  • ४- घण्टां वामदिशि स्थिताम् । (गौलम, आ० सू०)
  • ५- वामतस्तु तथा धूपमग्ने नापि न दक्षिणे । (यामल)
  • ६- घृतदीपो दक्षिणतस्तैलदीपस्तु वामतः । (महोदधि)
  • ७- शङ्खमद्भिः पूरयित्वा प्रणवेन च दक्षिणे ।

भगवान् के आगे – चौकोर जल का घेरा डालकर नैवेद्य की वस्तु रखें।

panchdev puja mantra पंचदेव पूजा मंत्र
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पूजा की भीतरी तैयारी: मानसपूजा का महत्व

शास्त्रों में पूजा को हजार गुना अधिक महत्त्वपूर्ण बनाने के लिए एक उपाय बतलाया गया है। वह उपाय है, मानसपूजा। पूजा से पहले मानसपूजा करके फिर बाह्य वस्तुओं से पूजन करना चाहिए।

पहले पुष्प-प्रकरण में शास्त्र का एक वचन उद्धृत किया गया है, जिसमें बतलाया गया है कि मनःकल्पित यदि एक फूल भी चढ़ा दिया जाए तो करोड़ों बाहरी फूल चढ़ाने के बराबर होता है। इसी प्रकार मानस चन्दन, धूप, दीप, नैवेद्य भी भगवान् को करोड़ गुना अधिक संतोष दे सकेंगे। अतः मानसपूजा अत्यधिक अपेक्षित है।

वस्तुतः भगवान् को किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं, वे तो भाव के भूखे हैं। संसार में ऐसे दिव्य पदार्थ उपलब्ध नहीं हैं, जिनसे परमेश्वर की पूजा की जा सके। इसलिए पुराणों में मानसपूजा का विशेष महत्त्व माना गया है।

मानसपूजा में भक्त अपने इष्टदेव को मुक्तामणियों से मण्डित कर स्वर्ण-सिंहासन पर विराजमान कराता है। स्वर्गलोक की मन्दाकिनी गङ्गा के जल से अपने आराध्य को स्नान कराता है, कामधेनु गौ के दुग्ध से पञ्चामृत का निर्माण करता है। वस्त्राभूषण भी दिव्य अलौकिक होते हैं।

चन्दन चढ़ाने का नियम:

  • १- पतला चन्दन चढ़ाना निषिद्ध है –
    • द्रवीभूतं घृतं चैव द्रवीभूतं च चन्दनम्।
    • नार्पयेन्मम तुष्ट्यर्थं घनीभूतं तदर्पयेत् ।। (वाराहपुराण)
  • २-हस्ते घृतानि पुष्पाणि ताम्रपात्रे च चन्दनम्।
    • गङ्गोदकं चर्मपात्रे निषिद्धं सर्वकर्मसु ।। (आचारेन्दु)
  • ३- कृत्वादौ मानसीं पूजां ततः पूजां समाचरेत् । (मुगलपु०)

मानसपूजा का स्वरूप एवं विधि

पृथ्वीरूपी गन्ध का अनुलेपन करता है। अपने आराध्य के लिए कुबेर की पुष्पवाटिका से स्वर्णकमल-पुष्पों का चयन करता है। भावना से वायुरूपी धूप, अग्निरूपी दीपक तथा अमृतरूपी नैवेद्य भगवान् को अर्पण करने की विधि है। इसके साथ ही त्रिलोक की सम्पूर्ण वस्तु, सभी उपचार सच्चिदानन्दघन परमात्म-प्रभु के चरणों में भावना से भक्त अर्पण करता है। यह है मानसपूजा का स्वरूप।

इसकी एक संक्षिप्त विधि भी पुराणों में वर्णित है, जो नीचे लिखी जा रही है:

१. ॐ लं पृथिव्यात्मकं गन्धं परिकल्पयामि ।
(प्रभो ! मैं पृथ्वीरूप गन्ध (चन्दन) आपको अर्पित करता हूँ।)

२. ॐ हं आकाशात्मकं पुष्पं परिकल्पयामि ।
(प्रभो ! मैं आकाशरूप पुष्प आपको अर्पित करता हूँ।)

३. ॐ यं वाय्वात्मकं धूपं परिकल्पयामि ।
(प्रभो ! मैं वायुदेव के रूप में धूप आपको प्रदान करता हूँ।)

४. ॐ रं वह्न्यात्मकं दीपं दर्शयामि ।
(प्रभो ! मैं अग्निदेव के रूप में दीपक आपको प्रदान करता हूँ।)

५. ॐ वं अमृतात्मकं नैवेद्यं निवेदयामि ।
(प्रभो ! मैं अमृत के समान नैवेद्य आपको निवेदन करता हूँ।)

६. ॐ सौं सर्वात्मकं सर्वोपचारं समर्पयामि ।
(प्रभो ! मैं सर्वात्मा के रूप में संसार के सभी उपचारों को आपके चरणों में समर्पित करता हूँ।)

इन मन्त्रों से भावनापूर्वक मानसपूजा की जा सकती है।


मानसपूजा के लाभ एवं साधना में योगदान

मानसपूजा से चित्त एकाग्र और सरस हो जाता है, इससे बाह्य पूजा में भी रस मिलने लगता है। यद्यपि इसका प्रचार कम है, तथापि इसे अवश्य अपनाना चाहिए।

  • १- मानस-पूजा में आराधक का जितना समय लगता है, उतना भगवान् के सम्पर्क में बीतता है और तब तक संसार उससे दूर हटा रहता है। अपने आराध्यदेव के लिए बढ़िया-से-बढ़िया रत्नजटित आसन, सुगन्ध के बौछार करते दिव्य फूल की वह कल्पना करता है और उसका मन वहाँ से दौड़कर उन्हें जुटाता है। इस तरह मन को दौड़ने की और कल्पनाओं की उड़ान भरने की इस पद्धति में पूरी छूट मिल जाती है।

इसके दौड़ने के लिए क्षेत्र भी बहुत विस्तृत है। इस दायरे में अनन्त ब्रह्माण्ड ही नहीं, अपितु इसकी पहुँच के परे गोलोक, साकेतलोक, सदाशिवलोक भी आ जाते हैं। अपने आराध्यदेव को आसन देना है, वस्त्र और आभूषण पहनाना है, चन्दन लगाना है, मालाएँ पहनानी हैं, धूप-दीप दिखलाना है और नैवेद्य निवेदित करना है। इन्हें जुटाने के लिए उसे इन्द्रलोक से ब्रह्मलोक तक दौड़ लगाना है।

पहुँचे या न पहुँचे, किंतु अप्राकृतिक लोकों के चक्कर लगाने से भी वह नहीं चूकता, ताकि उत्तम साधन जुट जाएँ और भगवान् की अद्भुत सेवा हो जाए। इतनी दौड़-धूप से लाई गई वस्तुओं को आराधक जब अपने भगवान् के सामने रखता है, तब उसे कितना संतोष मिलता होगा? उसका मन तो निहाल ही हो जाता होगा।

इस तरह पूजा-सामग्रियों के जुटाने में और भगवान् के लिए उनका उपयोग करने में साधक जितना भी समय लगा पाता है, उतना समय वह अन्तर्जगत् में बिताता है। इस तरह मानस-पूजा साधक को समाधि की ओर अग्रसर करती रहती है और उसके रसास्वाद का आभास भी कराती रहती है।

जैसे कोई प्रेमी साधक कान्ताभाव से अपने इष्टदेव की मानसी सेवा कर रहा है। चाह रहा है कि अपने पूज्य प्रियतम को जूही, चमेली, चम्पा, गुलाब और बेला की तुरंत गुंथी, गमगमाती हुई बढ़िया-से-बढ़िया माला पहनाएँ। बाहरी पूजा में इसके लिए बहुत ही भाग-दौड़ करनी पड़ेगी। आर्थिक कठिनाई मुँह बाए अलग खड़ी हो जाती है। तब तक भगवान से बना यह मधुर सम्बन्ध भी टूट जाता है। पर मानसपूजा में यह अड़चन नहीं आती।

इसलिए बना हुआ वह सम्पर्क और गाढ़-से-गाढ़तर होता जाता है। मन की कोमल भावनाओं से उत्पन्न की गई वे वनमालाएँ तुरंत तैयार मिलती हैं। पहनाते समय पूज्य प्रियतम की सुरभित साँसों से जब इसकी सुगन्ध टकराती है, तब नस-नस में मादकता व्याप्त हो जाती है।

पूज्य प्रियतम का स्पर्श पाकर वह उद्वेलित हो उठती है और साधक को समरस कर देती है। अब न आराधक है, न आराध्य है और न आराधना ही है। आगे की पूजा कौन करें? धन्य हैं ये, जिनकी पूजा इस तरह अधूरी रह जाती है। मानसपूजा से यह स्थिति शीघ्र आ सकती है।

panchdev puja mantra पंचदेव पूजा मंत्र
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पञ्चदेव-पूजन-विधि

गणेश-स्मरण

हाथ में पुष्प-अक्षत आदि लेकर प्रारम्भ में भगवान् गणेशजी का स्मरण करना चाहिए-

सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः ।
लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः ।।

धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः ।
द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि ।।

विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा ।
संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ॥

श्रीमन्महागणाधिपतये नमः। लक्ष्मीनारायणाभ्यां नमः। उमामहेश्वराभ्यां नमः। वाणीहिरण्यगर्भाभ्यां नमः। शचीपुरन्दराभ्यां नमः। मातृपितृचरण-कमलेभ्यो नमः। इष्टदेवताभ्यो नमः। कुलदेवताभ्यो नमः। ग्रामदेवताभ्यो नमः। वास्तुदेवताभ्यो नमः। स्थानदेवताभ्यो नमः। एतत्कर्मप्रधानदेवताभ्यो नमः। सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः। सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नमः।


पूजनका संकल्प

सर्वप्रथम पूजन का संकल्प करे –

(क) निष्काम संकल्प:-

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः अद्य….. अहं श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं विष्णुशिवगणेशसूर्यदुर्गार्चनं करिष्ये ।

(ख) सकाम संकल्प – ….सर्वाभीष्टस्वर्गापवर्गफलप्राप्तिद्वारा श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं विष्णुशिवगणेशसूर्यदुर्गार्चनं करिष्ये ।


घण्टा-पूजन

घण्टा को चन्दन और फूल से अलङ्कृत कर निम्नलिखित मन्त्र पढ़कर प्रार्थना करे –

आगमार्थं तु देवानां गमनार्थं च रक्षसाम् ।
कुरु घण्टे वरं नादं देवतास्थानसंन्निधौ ।।

प्रार्थना के बाद घण्टा को बजाये और यथास्थान रख दे।

‘घण्टास्थिताय गरुडाय नमः ।’

इस नाममन्त्र से घण्टे में स्थित गरुडदेव का भी पूजन करे।


शङ्खपूजन

शङ्ख में दो दर्भ या दूब, तुलसी और फूल डालकर ‘ओम्’ कहकर उसे सुवासित जल से भर दे। इस जल को गायत्री मन्त्र से अभिमन्त्रित कर दें। फिर निम्नलिखित मन्त्र पढ़कर शङ्ख में तीर्थों का आवाहन करे-

पृथिव्यां यानि तीर्थानि स्थावराणि चराणि च ।
तानि तीर्थानि शङ्खेऽस्मिन् विशन्तु ब्रह्मशासनात् ।।

तब ‘शङ्खाय नमः, चन्दनं समर्पयामि’ कहकर चन्दन लगाये और ‘शङ्खाय नमः, पुष्पं समर्पयामि’ कहकर फूल चढ़ाये। इसके बाद निम्नलिखित मन्त्र पढ़कर शङ्ख को प्रणाम करे-

त्वं पुरा सागरोत्पन्नो विष्णुना विधृतः करे ।
निर्मितः सर्वदेवैश्च पाञ्चजन्य ! नमोऽस्तु ते ।।


प्रोक्षण

शङ्ख में रखी हुई पवित्री से निम्नलिखित मन्त्र पढ़कर अपने ऊपर तथा पूजा की सामग्रियों पर जल छिड़के-

ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा ।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ।।


उदकुम्भ की पूजा

सुवासित जल से भरे हुए उदकुम्भ (कलश) की ‘उदकुम्भाय नमः’ इस मन्त्र से चन्दन, फूल आदि से पूजा कर इसमें तीर्थों का आवाहन करे-

ॐ कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रुद्रः समाश्रितः ।
मूले त्वस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः ।।

कुक्षौ तु सागराः सर्वे सप्तद्वीपा वसुन्धरा ।
ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदः सामवेदो ह्यथर्वणः ।।

अङ्गैश्च सहिताः सर्वे कलशं तु समाश्रिताः ।
अत्र गायत्री सावित्री शान्तिः पुष्टिकरी तथा ॥

सर्वे समुद्राः सरितस्तीर्थानि जलदा नदाः ।
आयान्तु देवपूजार्थं दुरितक्षयकारकाः ।।

गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति !
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् संनिधिं कुरु ॥

इसके बाद निम्नलिखित मन्त्र से उदकुम्भ की प्रार्थना करे-

देवदानवसंवादे मथ्यमाने महोदधौ ।
उत्पन्नोऽसि तदा कुम्भ ! विधृतो विष्णुना स्वयम् ।।

त्वत्तोये सर्वतीर्थानि देवाः सर्वे त्वयि स्थिताः ।
त्वयि तिष्ठन्ति भूतानि त्वयि प्राणाः प्रतिष्ठिताः ।।

शिवः स्वयं त्वमेवासि विष्णुस्त्वं च प्रजापतिः ।
आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवाः सपैतृकाः ॥

त्वयि तिष्ठन्ति सर्वेऽपि यतः कामफलप्रदाः ।
त्वत्प्रसादादिमं यज्ञं कर्तुमीहे जलोद्भव !
सांनिध्यं कुरु मे देव प्रसन्नो भव सर्वदा ॥


अब पञ्चदेवों की पूजा करे। सबसे पहले ध्यान करे –

विष्णु का ध्यान

उद्यत्कोटिदिवाकराभमनिशं शङ्खं गदां पङ्कजं
चक्रं बिभ्रतमिन्दिरावसुमतीसंशोभिपार्श्वद्वयम् ।
कोटीराङ्गदहारकुण्डलधरं पीताम्बरं कौस्तुभै-
र्दीप्तं विश्वधरं स्ववक्षसि लसच्छ्रीवत्सचिह्नं भजे ॥

ध्यानार्थे अक्षतपुष्पाणि समर्पयामि ॐ विष्णवे नमः ।

उदीयमान करोड़ों सूर्य के समान प्रभा से युक्त, अपने चारों हाथों में शङ्ख, गदा, पद्म तथा चक्र धारण किये हुए एवं दोनों भागों में भगवती लक्ष्मी और पृथ्वीदेवी से सुशोभित, किरीट, मुकुट, केयूर, हार और कुण्डलों से समलङ्कृत, कौस्तुभमणि तथा पीताम्बर से देदीप्यमान विग्रहयुक्त एवं वक्षःस्थल पर श्रीवत्सचिह्न धारण किये हुए भगवान् विष्णु का मैं निरन्तर स्मरण-ध्यान करता हूँ।

शिव का ध्यान

ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचन्द्रावतंसं
रत्नाकल्पोज्ज्वलाङ्गं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम् ।
पद्मासीनं समन्तात् स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं
विश्वाद्यं विश्वबीजं निखिलभयहरं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम् ॥

ध्यानार्थे अक्षतपुष्पाणि समर्पयामि ॐ शिवाय नमः ।

चाँदी के पर्वत के समान जिनकी श्वेत कान्ति है, जो सुन्दर चन्द्रमा को आभूषण-रूप से धारण करते हैं, रत्नमय अलङ्कारों से जिनका शरीर उज्ज्वल है, जिनके हाथों में परशु, मृग, वर और अभय मुद्रा है, जो प्रसन्न हैं, पद्म के आसन पर विराजमान हैं, देवतागण जिनके चारों ओर खड़े होकर स्तुति करते हैं, जो बाघ की खाल पहनते हैं, जो विश्व के आदि जगत् की उत्पत्ति के बीज और समस्त भयों को हरने वाले हैं, जिनके पाँच मुख और तीन नेत्र हैं, उन महेश्वर का प्रतिदिन ध्यान करे।

गणेश का ध्यान

खर्वं स्थूलतनुं गजेन्द्रवदनं लम्बोदरं सुन्दरं
प्रस्यन्दन्मदगन्धलुब्धमधुपव्यालोलगण्डस्थलम् ।
दन्ताघातविदारितारिरुधिरैः सिन्दूरशोभाकरं
वन्दे शैलसुतासुतं गणपतिं सिद्धिप्रदं कामदम् ॥

ध्यानार्थे अक्षतपुष्पाणि समर्पयामि ॐ श्रीगणेशाय नमः।

जो नाटे और मोटे शरीर वाले हैं, जिनका गजराज के समान मुख और लम्बा उदर है, जो सुन्दर हैं तथा बहते हुए मद की सुगन्ध के लोभी भौरों के चाटने से जिनका गण्डस्थल चपल हो रहा है, दाँतों की चोट से विदीर्ण हुए शत्रुओं के खून से जो सिन्दूर की-सी शोभा धारण करते हैं, कामनाओं के दाता और सिद्धि देने वाले उन पार्वती के पुत्र गणेशजी की मैं वन्दना करता हूँ।

सूर्य का ध्यान

रक्ताम्बुजासनमशेषगुणैकसिन्धुं
भानुं समस्तजगतामधिपं भजामि ।
पद्मद्वयाभयवरान् दधतं कराब्जै-
र्माणिक्यमौलिमरुणाङ्गरुचिं त्रिनेत्रम् ॥

ध्यानार्थे अक्षतपुष्पाणि समर्पयामि ॐ श्रीसूर्याय नमः ।

लाल कमल के आसन पर समासीन, सम्पूर्ण गुणों के रत्नाकर, अपने दोनों हाथों में कमल और अभयमुद्रा धारण किये हुए, पद्मराग तथा मुक्ताफल के समान सुशोभित शरीर वाले, अखिल जगत् के स्वामी, तीन नेत्रों से युक्त भगवान् सूर्य का मैं ध्यान करता हूँ।

दुर्गा का ध्यान

सिंहस्था शशिशेखरा मरकतप्रख्यैश्चतुर्भिर्भुजैः
शङ्खं चक्रधनुःशरांश्च दधती नेत्रैस्त्रिभिः शोभिता ।
आमुक्ताङ्गदहारकङ्कणरणत्काञ्चीरणन्नूपुरा
दुर्गा दुर्गतिहारिणी भवतु नो रत्नोल्लसत्कुण्डला ॥

ध्यानार्थे अक्षतपुष्पाणि समर्पयामि ॐ श्रीदुर्गायै नमः ।

जो सिंह की पीठ पर विराजमान है, जिनके मस्तक पर चन्द्रमा का मुकुट है, जो मरकतमणि के समान कान्ति वाली अपनी चार भुजाओं में शङ्ख, चक्र, धनुष और बाण धारण करती है, तीन नेत्रों से सुशोभित होती हैं, जिनके भिन्न-भिन्न अङ्ग बाँधे हुए बाजूबंद, हार, कङ्कण, खनखनाती हुई करधनी और रुनझुन करते हुए नूपुरों से विभूषित है तथा जिनके कानों में रत्नजटित कुण्डल झिलमिलाते रहते हैं, वे भगवती दुर्गा हमारी दुर्गति दूर करने वाली हों।


अब हाथ में फूल लेकर आवाहन के लिये पुष्पाञ्जलि दे।

पुष्पाञ्जलि

ॐ विष्णुशिवगणेशसूर्यदुर्गाभ्यो नमः, पुष्पाञ्जलिं समर्पयामि ।

यदि पञ्चदेव की मूर्तियाँ न हों तो अक्षत पर इनका आवाहन करे। मन्त्र नीचे दिया जाता है। निम्न कोष्ठक के अनुसार देवताओं को स्थापित करें।

विष्णु-पञ्चायतन

शिव, गणेश, विष्णु, देवी, सूर्य पंचायतन पूजन विधि

आवाहन (Avahana)

आगच्छन्तु सुरश्रेष्ठा भवन्त्त्वत्र स्थिराः समे ।
यावत् पूजां करिष्यामि तावत् तिष्ठन्तु संनिधौ ॥

ॐ विष्णुशिवगणेशसूर्यदुर्गाभ्यो नमः, आवाहनार्थे पुष्पं समर्पयामि । (पुष्प समर्पण करे)

  • विशेष नियम:
    १. प्रतिष्ठित मूर्ति, शालग्राम, बाणलिङ्ग, अग्नि और जल में आवाहन करना मना है। इसकी जगह पुष्पाञ्जलि दे।
    २. पञ्चायतन-देवताओं के स्थान के नियम है। इसी नियम के अनुसार इन्हें स्थापित करे। इस नियम के उल्लङ्घन से हानि होती है। विष्णु-पञ्चायतन का प्रकार ऊपर दिया जा चुका है। अन्य पञ्चायतनों का प्रकार नीचे लिखे जाते हैं-
    • गणेश-पञ्चायतन
    • शिव-पञ्चायतन
    • देवी-पञ्चायतन
    • सूर्य-पञ्चायतन
    अन्य पञ्चायतनों के नाम-मन्त्र-(१) गणेश-पञ्चायतन – ॐ गणेशविष्णुशिवदुर्गासूर्येभ्यो नमः ।
    (२) शिव-पञ्चायतन – ॐ शिवविष्णुसूर्यदुर्गागणेशेभ्यो नमः ।
    (३) देवी-पञ्चायतन – ॐ दुर्गाविष्णुशिवसूर्यगणेशेभ्यो नमः ।
    (४) सूर्य-पञ्चायतन – ॐ सूर्यशिवगणेशदुर्गाविष्णुभ्यो नमः ।

आसन (Asana)

अनेकरत्नसंयुक्तं नानामणिगणान्वितम् ।
कार्तस्वरमयं दिव्यमासनं परिगृह्यताम् ॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, आसनार्थे तुलसीदलं समर्पयामि । (तुलसीदल समर्पण करे)


पाद्य (Padya)

गङ्गादिसर्वतीर्थेभ्य आनीतं तोयमुत्तमम् ।
पाद्यार्थ सम्प्रदास्यामि गृह्णन्तु परमेश्वराः ॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, पादयोः पाद्यं समर्पयामि । (जल अर्पण करे)


अर्घ्य (Arghya)

गन्धपुष्पाक्षतैर्युक्तमर्घ्य सम्पादितं मया ।
गृह्णन्त्वर्घ्यं महादेवाः प्रसन्नाश्च भवन्तु मे ॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, हस्तयोरर्घ्यै समर्पयामि ।
(गन्ध, पुष्प, अक्षत मिला हुआ अर्घ्य अर्पण करे)


आचमन (Achamana)

कर्पूरेण सुगन्धेन वासितं स्वादु शीतलम् ।
तोयमाचमनीयार्थं गृह्णन्तु परमेश्वराः ॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, आचमनीयं जलं समर्पयामि ।
(कर्पूर से सुवासित, सुगन्धित शीतल जल समर्पण करे)


स्नान (Snana)

मन्दाकिन्याः समानीतैः कर्पूरागुरुवासितैः ।
स्नानं कुर्वन्तु देवेशा जलैरेभिः सुगन्धिभिः ॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, स्नानीयं जलं समर्पयामि । (शुद्ध जल से स्नान कराये)

आचमन: स्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि । (स्नान कराने के बाद आचमन के लिये जल दे)


पञ्चामृत-स्नान (Panchamrita Snana)

पयो दधि घृतं चैव मधु च शर्करान्वितम् ।
पञ्चामृतं मयाऽऽनीतं स्नानार्थ प्रतिगृह्यताम् ॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, पञ्चामृतस्नानं समर्पयामि । (पञ्चामृत से स्नान कराये)


गन्धोदकस्नान (Gandhodaka Snana)

मलयाचलसम्भूतचन्दनेन विमिश्रितम् ।
इदं गन्धोदकं स्नानं कुङ्कुमाक्तं तु गृह्यताम् ॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, गन्धोदकं समर्पयामि । (मलय चन्दन से सुवासित जल से स्नान कराये)

गन्धोदकस्नानान्ते शुद्धोदकस्नानम् (गन्धोदक-स्नान के बाद शुद्ध जल से स्नान कराये)


शुद्धोदकस्नान (Shuddhodaka Snana)

मलयाचलसम्भूतचन्दनाऽगरुमिश्रितम्।
सलिलं देवदेवेश ! शुद्धस्नानाय गृह्यताम् ॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि ।
(शुद्धोदक से स्नान कराने के बाद आचमन करने के लिये पुनः जल चढ़ाये)

आचमन: शुद्धोदकस्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि ।


वस्त्र और उपवस्त्र (Vastra & Upavastra)

शीतवातोष्णसंत्राणे लोकलज्जानिवारणे ।
देहालङ्करणे वस्त्रे भवद्भ्यो वाससी शुभे ॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, वस्त्रमुपवस्त्रं च समर्पयामि ।
(वस्त्र और उपवस्त्र चढ़ाने के बाद आचमन के लिये जल चढ़ाये)

आचमन: वस्त्रोपवस्त्रान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि ।


यज्ञोपवीत (Yajnopavita)

नवभिस्तन्तुभिर्युक्तं त्रिगुणं देवतामयम् ।
उपवीतं मया दत्तं गृह्णन्तु परमेश्वराः ॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, यज्ञोपवीतं समर्पयामि ।
(यज्ञोपवीत चढ़ाने के बाद आचमन के लिये जल चढ़ाये)

आचमन: यज्ञोपवीतान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि ।


चन्दन (Chandana)

श्रीखण्डं चन्दनं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम् ।
विलेपनं सुरश्रेष्ठ चन्दनं प्रतिगृह्यताम् ॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, चन्दनानुलेपनं समर्पयामि । (सुगन्धित मलय चन्दन लगाये)


पुष्पमाला (Pushpamala)

माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि भक्तितः ।
मयाऽऽहतानि पुष्पाणि पूजार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, पुष्पाणि (पुष्पमालाम्) समर्पयामि । (मालती आदिके पुष्प चढ़ाये)


तुलसीदल और मञ्जरी (Tulsi & Manjari)

तुलसीं हेमरूपां च रत्नरूपां च मञ्जरीम् ।
भवमोक्षप्रदां रम्यामर्पयामि हरिप्रियाम् ॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, तुलसीदलं मञ्जरीं च समर्पयामि । (तुलसीदल और तुलसी-मञ्जरी समर्पण करे)

नोट: भगवान्‌ के आगे चौकोर जल का घेरा डालकर उसमें नैवेद्य की वस्तुओं को रखे, तब धूप-दीप-निवेदन करे।


धूप (Dhupa)

वनस्पतिरसोद्भूतो गन्धाढ्यो गन्ध उत्तमः ।
आघ्रेयः सर्वदेवानां धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम् ॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, धूपमाघ्रापयामि । (धूप दिखाये)


दीप (Deepa)

साज्यं च वर्तिसंयुक्तं वह्निना योजितं मया।
दीपं गृह्णन्तु देवेशास्त्रैलोक्यतिमिरापहम् ॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, दीपं दर्शयामि । (दीप दिखाये)

हाथ धोकर नैवेद्य निवेदन करे-


नैवेद्य (Naivedya)

शर्कराखण्डखाद्यानि दधिक्षीरघृतानि च।
आहारं भक्ष्यभोज्यं च नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम् ॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, नैवेद्यं निवेदयामि । (नैवेद्य निवेदित करे)

नैवेद्यान्ते ध्यानं ध्यानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि। उत्तरापोऽशनार्थ, हस्तप्रक्षालनार्थ, मुखप्रक्षालनार्थं च जलं समर्पयामि।
(नैवेद्य देने के बाद भगवान्‌ का ध्यान करे – मानो भगवान भोग लगा रहे हैं। ध्यान के बाद आचमन के लिये जल चढ़ाये और मुख-प्रक्षालन तथा हस्त-प्रक्षालन के लिये जल दे)


ऋतुफल (Rituphala)

इदं फलं मया देव स्थापितं पुरतस्तव ।
तेन मे सफलावाप्तिर्भवेज्जन्मनि जन्मनि ॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, ऋतुफलानि समर्पयामि ।
मध्ये आचमनीयं उत्तरापोऽशनं च जलं समर्पयामि।
(ऋतुफल अर्पण करे, इसके बाद आचमन तथा उत्तरापोऽशन के लिये जल दे)


ताम्बूल (Tambula)

पूगीफलं महद् दिव्यं नागवल्लीदलैर्युतम् ।
एलालवंगसंयुक्तं ताम्बूलं प्रतिगृह्यताम् ॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, मुखवासार्थे ताम्बूलं समर्पयामि । (सुपारी, इलायची, लवंग के साथ पान चढ़ाये)


दक्षिणा (Dakshina)

हिरण्यगर्भगर्भस्थं हेमबीजं विभावसोः ।
अनन्तपुण्यफलदमतः शान्तिं प्रयच्छ से ॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, दक्षिणां समर्पयामि । (दक्षिणा चढ़ाये)


आरती (Aarti)

कदलीगर्भसम्भूतं कर्पूरं तु प्रदीपितम् ।
आरार्तिकमहं कुर्वे पश्य मां वरदो भव ॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, आरार्तिकं समर्पयामि ।
(कर्पूर की आरती करे और आरती के बाद जल गिरा दे)


शङ्ख-भ्रामण (Shankha Bhramana)

शङ्खमध्ये स्थितं तोयं भ्रामितं केशवोपरि ।
अङ्गलग्नं मनुष्याणां ब्रह्महत्यां व्यपोहति ॥

जल से भरे शङ्ख को पाँच बार भगवान्‌ के चारों ओर घुमाकर शङ्ख को यथास्थान रख दे। भगवान्‌ का अँगोछा भी घुमा दे। अब दोनों हथेलियों से आरती ले। हाथ धो ले। शङ्ख के जल को अपने ऊपर तथा उपस्थित लोगों पर छिड़क दे।

निम्नलिखित मन्त्र से चार बार परिक्रमा करे (परिक्रमा का स्थान न हो तो अपने आसन पर ही चार बार घूम जाय):

१-एका चण्ड्या रवेः सप्त तिस्त्रः कार्या विनायके ।
हरेश्चतस्त्रः कर्तव्याः शिवस्यार्धप्रदक्षिणा ॥
(आह्निक सू० देवतीर्थ-विचार)


प्रदक्षिणा (Pradakshina)

यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च ।
तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणपदे पदे ॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, प्रदक्षिणां समर्पयामि । (मन्त्र पढ़कर प्रदक्षिणा करे)


मन्त्रपुष्पाञ्जलि (Mantra Pushpanjali)

श्रद्धया सिक्तया भक्त्या हार्दप्रेम्णा समर्पितः ।
मन्त्रपुष्पाञ्जलिश्चायं कृपया प्रतिगृह्यताम् ॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, मन्त्रपुष्पाञ्जलिं समर्पयामि । (पुष्पाञ्जलि भगवान्‌ के सामने अर्पण कर दे)


नमस्कार (Namaskara)

नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्त्रमूर्तये सहस्रपादाक्षिशिरोरुबाहवे ।
सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते सहस्त्रकोटीयुगधारिणे नमः ॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, प्रार्थनापूर्वकं नमस्कारान्समर्पयामि । (प्रार्थनापूर्वक नमस्कार करे)


भक्तों को शतांश-प्रदान

इसके बाद विष्वक्सेन, शुक आदि महाभागवतों को नैवेद्य का शतांश निर्माल्य जल में दे।

(क) वैष्णव संतों को
विष्वक्सेनोद्धवाक्रूराः सनकाद्याः शुकादयः ।
महाविष्णुप्रसादोऽयं सर्वे गृह्णन्तु वैष्णवाः ॥

(ख) गाणपत्य संतों को
गणेशो गालवो गायों मङ्गलश्च सुधाकरः ।
गणेशस्य प्रसादोऽयं सर्वे गृह्णन्तु भागिनः ॥

(ग) शैव संतों को
बाणरावणचण्डीशनन्दिभृङ्गिरिटादयः।
सदाशिवप्रसादोऽयं सर्वे गृह्णन्तु शाम्भवाः ॥

(घ) शाक्त संतों को
शक्तिरुच्छिष्टचाण्डालीसोमसूर्यहुताशनाः।
महालक्ष्मीप्रसादोऽयं सर्वे गृह्णन्तु शाक्तिकाः ॥

(ङ) सौर संतों को
छायासंज्ञाश्राद्धरेवादण्डमाठरकादयः।
दिवाकरप्रसादोऽयं ब्राध्ना गृह्णन्तु शेषकम् ॥

इन श्लोकों को पढ़कर या बिना पढ़े भी जल में संतों के उद्देश्य से निर्माल्य दे दे। भगवान् और भक्त में अन्तर नहीं होता। अतः उत्तम पक्ष यह है कि इन संतों का नामोच्चारण हो जाय।


चरणामृत-पान (Charanamrita)

अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम् ।
विष्णुपादोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते ॥

(चरणामृत को पात्र में लेकर ग्रहण करे। सिर पर भी चढ़ा ले)


क्षमा-याचना (Kshama Yachana)

मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं जनार्दन ।
यत्पूजितं मया देव ! परिपूर्ण तदस्तु मे ॥

आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम् ।
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर ॥

अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम ।
तस्मात् कारुण्यभावेन रक्ष मां परमेश्वर ॥

(इन मन्त्रों का श्रद्धापूर्वक उच्चारण कर अपनी विवशता एवं त्रुटियों के लिये क्षमा-याचना करे)


प्रसाद-ग्रहण (Prasad Grahana)

भगवान् पर चढ़े फूल को सिर पर धारण करे। पूजा से बचे चन्दन आदि को प्रसाद रूप से ग्रहण करे। अन्त में निम्नलिखित वाक्य पढ़कर समस्त कर्म भगवान्‌ को समर्पित कर दे:

ॐ तत्सद् ब्रह्मार्पणमस्तु ।
ॐ विष्णवे नमः, ॐ विष्णवे नमः, ॐ विष्णवे नमः ।

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