chatuh shloki bhagwat shlok arth sahit चतुःश्लोकी भागवत: आत्मा और ब्रह्म का सार (श्लोक एवं अर्थ सहित)
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प्रस्तावना
श्रीमद्भागवत महापुराण के द्वितीय स्कंध (अध्याय 9, श्लोक 32-35) में चार अत्यंत महत्वपूर्ण श्लोक आते हैं, जिन्हें “चतुःश्लोकी भागवत” कहा जाता है। ये चार श्लोक संपूर्ण भागवत का निचोड़ और ब्रह्म-तत्त्व के रहस्य को उद्घाटित करने वाले हैं। इनमें भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रह्माजी को आत्मा, माया, सृष्टि और परमात्मा के स्वरूप का उपदेश दिया है।
प्रस्तुत हैं चतुःश्लोकी भागवत के श्लोक और उनका अर्थ:
श्लोक १
अहमेवासमेवाग्रे नान्यद् यत् सदसत् परम् ।
पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ।।१।।
अर्थ:
सृष्टिके पूर्व केवल मैं-ही-मैं था। मेरे अतिरिक्त न स्थूल था न सूक्ष्म और न तो दोनोंका कारण अज्ञान। जहाँ यह सृष्टि नहीं है, वहाँ मैं-ही-मैं हूँ और इस सृष्टिके रूपमें जो कुछ प्रतीत हो रहा है, वह भी मैं हूँ; और जो कुछ बच रहेगा, वह भी मैं ही हूँ ।।१।।
श्लोक २
ऋतेऽर्थं यत् प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि ।
तद्विद्यादात्मनो मायां यथाऽऽभासो यथा तमः ।।२।।
अर्थ:
वास्तवमें न होनेपर भी जो कुछ अनिर्वचनीय वस्तु मेरे अतिरिक्त मुझ परमात्मामें दो चन्द्रमाओंकी तरह मिथ्या ही प्रतीत हो रही है, अथवा विद्यमान होनेपर भी आकाश-मण्डलके नक्षत्रोंमें राहुकी भाँति जो मेरी प्रतीति नहीं होती, इसे मेरी माया समझनी चाहिये ।।२।।
श्लोक ३
यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु ।
प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम् ।।३।।
अर्थ:
जैसे प्राणियोंके पंचभूतरचित छोटे-बड़े शरीरोंमें आकाशादि पंचमहाभूत उन शरीरोंके कार्यरूपसे निर्मित होनेके कारण प्रवेश करते भी हैं और पहलेसे ही उन स्थानों और रूपोंमें कारणरूपसे विद्यमान रहनेके कारण प्रवेश नहीं भी करते, वैसे ही उन प्राणियोंके शरीरकी दृष्टिसे मैं उनमें आत्माके रूपसे प्रवेश किये हुए हूँ और आत्मदृष्टिसे अपने अतिरिक्त और कोई वस्तु न होनेके कारण उनमें प्रविष्ट नहीं भी हूँ ।।३।।
श्लोक ४
एतावदेव जिज्ञास्यं तत्त्व जिज्ञासुनाऽऽत्मनः ।
अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत् स्यात् सर्वत्र सर्वदा ।।४।।
अर्थ:
यह ब्रह्म नहीं, यह ब्रह्म नहीं – इस प्रकार निषेधकी पद्धतिसे और यह ब्रह्म है, यह ब्रह्म है- इस अन्वयकी पद्धतिसे यही सिद्ध होता है कि सर्वातीत एवं सर्वस्वरूप भगवान् ही सर्वदा और सर्वत्र स्थित हैं, वे ही वास्तविक तत्त्व हैं। जो आत्मा अथवा परमात्माका तत्त्व जानना चाहते हैं, उन्हें केवल इतना ही जाननेकी आवश्यकता है ।।४।।
(श्रीमद्भा० २।९।३२-३५)




